भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 688, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ६३७ (Tinospora malabarica (Lam.) Miers.) जो पद्मगुडूची है, उसको सुदर्शन लिखा है। क्राइनम् की ३ जातियाँ पाई जाती हैं जिनमें से कुछ बागों में भी लगाई हुई मिलती हैं। यहाँ क्राइनम् का वर्णन किया गया है। १८५. सुदर्शन हि०-सुदर्शन, सुखदर्शन। बं०-सुखदर्शन। म०-गदाभी कंद, गदनीचा कांदा। ता०-विषमुंगिल। ले०- Crinum latifolium Linn. (क्राइनम् लैटिफोलियम् लिन.)। Fam. Amaryllidaceae (एमेरिलिडेसी)। यह समस्त भारत में होता है तथा बागों में लगाया हुआ भी पाया जाता है। इसका क्षुप-बहुवर्षायु तथा २, ३ हाथ ऊँचा होता है। पत्ते-भूमि से निकलते मालूम पड़ते हैं, जो २॥-४ फीट तक लम्बे होते हैं एवं जिनकी चौड़ाई मध्य भाग में ३-४॥ इञ्च तक होती है। पुष्प-बैंगनीपन लिये हुये सफेद रंग के सुगंधित सुन्दर फूल बीच में से निकलते हैं। कन्द-गोलाकार, व्यास में ५ इञ्च तक एवं उसकी मोटी गर्दन ३-५ इञ्च तक लम्बी होती है। हर साल पत्ते सूखकर नये आते हैं तथा पत्ते बड़े होने से पहले ही फूल आ जाते हैं। इसकी अन्य जातियाँ क्रा० एशियाटिकम् लिन. (C. asiaticum Linn.) एवं क्रा. डेफिक्सम् केर (C. defixum Ker-Gawl) भी पाई जाती हैं। इसके पत्र एवं कन्द का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, मधुर, तीक्ष्ण, जंतुघ्न, कुष्ठघ्न, शोथहर, वामक, कफनाशक एवं ज्वरहर है। (१) कर्णशूल में इसके पत्तियों को गरम करके उसका स्वरस निकाल कर डालते हैं। (२) इसके पत्तों को गरम कर तथा एरण्ड तैल लगाकर बाँधने से सभी प्रकार की सूजन, फोड़े, बवासीर आदि कम होती है। संधिशोथ पर यह उपयोगी है। त्वचा के रोगों में इसका स्वरस या इससे सिद्ध तैल लगाते हैं। (३) कंद का प्रयोग कफज विकारों में वामक द्रव्य के रूप में किया जाता है। शुष्क द्रव्य (क्रा. एशियाटिकम्) की मात्रा दुगनी देनी पड़ती है। मात्रा-कंदस्वरस १-२ तोला वमनार्थ। अथाखुकर्णी (मूसाकर्णी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह आखुपर्णी त्वाखुपर्णी पर्णिका भूदरीभवा। आखुकर्णी कटुस्तिक्ता कषाया शीतला लघुः। विपाके कटुका मूत्रकफामयकृमिप्रणुत्।।३०८।। मूसाकर्णी के नाम तथा गुण-आखुकर्णी, आखुपर्णी, पर्णिका और भूदरीभवा ये नाम मूसाकर्णी के हैं। मूसाकर्णी-कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शीतल, लघु, विपाक में कटुरसयुक्त एवं मूत्र तथा कफ-सम्बन्धी रोग और कृमि को दूर करने वाली होती है। [३०८] १८६. मूसाकर्णी हिं०-मूसाकानी, चूहाकानी, मूसाकर्णी। बं०-इन्दुरकाणीपाना। म०-उन्दिरकानी। गु०-उन्दरकानी। ले०- Ipomoea reniformis, Chois (आईपोमिया रेनीफॉर्म्मिस् को०.)। Fam. Convolvulaceae (कन्हॉलह्युलेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाई जाती है, विशेष कर उड़ीसा, बंगाल तथा दक्षिण हिन्दुस्तान में उत्पन्न होती है। यह प्रसरी क्षुप जाति की वनस्पति प्रायः वर्षा में उत्पन्न होती है तथा सितम्बर से दिसम्बर तक फूलती-फलती है। इसकी प्रायः प्रत्येक गाँठ से जड़ निकल कर यह फैलती जाती है। पत्ते-वृक्काकार, आध से १॥ इञ्च घेरे में लम्बाई CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA