भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६३८ भावप्रकाशनिघण्टुः की अपेक्षा चौड़ाई में अधिक, दन्तुर एवं गोल गोल होते हैं। फूल-छोटे तथा पीले रंग के आते हैं। फल-दो-दो बीज वाले होते हैं। चिकित्सा में इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शोधन, मूत्रल, रसायन, कृमिघ्न, त्वक्-दोषहर एवं आनुलोमिक है। इसकी क्रिया मण्डूकपर्णी की तरह होती है तथा अनन्तमूल की तरह या उसके साथ इसका प्रयोग किया जाता है। (१) इसका प्रयोग त्वचा के रोगों में किया जाता है। इससे पाखाना साफ होता है तथा शारीरिक शिथिलता दूर होती है। (२) कृमि के लिये इसके स्वरस एवं रक्त शालि (लाल चावल) की पीठी के साथ बनी पूपलिका (पुआ) निर्धूम अंगारे पर पका कर, विडङ्ग तैल एवं लवण के साथ देने का विधान है। (चरक वि० ७-२६, सु० उ० ५४-२७) मात्रा-५-१० रत्ती फांट बनाकर। अथ मयूरशिखा (मोरशिखा) । तस्या नामगुणानाह मयूराह्वशिखा प्रोक्ता सहस्राहिर्मधुच्छदा। नीलकण्ठशिखा लघ्वी पित्तश्लेष्मातिसारजित् ।।३०९।। मोरशिखा के नाम तथा गुण-मयूराह्वशिखा ('मयूर' के पर्यायवाची शब्दों के अन्त में 'शिखा' जोड़ देने से जो शब्द बनते हैं वे सब; जैसे-नीलकण्ठशिखा आदि), सहस्रादि और मधुच्छदा ये नाम मोरशिखा के हैं। मोरशिखा- लघु एवं पित्त, कफ तथा अतिसार को नष्ट करने वाली होती है। [३०९] नोट-अनेक वनस्पतियों को जो मयूरशिखा की आकृति की तरह दिखलाई देती हैं, मयूरशिखा के नाम से विभिन्न स्थानों पर प्रयुक्त किया जा रहा है। चरक-सुश्रुत में इसका वर्णन देखा नहीं जाता। भा० प्र० में इसे लघु एवं पित्त- कफनाशक तथा अतिसार में उपयोगी लिखा है। गोजिह्वा के अन्तर्गत वर्णित एलिफैण्टोपस् स्केवर लिन. (Elephantopus scaber Linn.) को श्री ठा० बलवन्त सिंह जी उसके स्थानिक नामों के आधार पर मयूरशिखा मानते हैं। सेलोसिआ क्रिस्टैटा (Celosia cristata) को कुछ ने मयूरशिखा माना है। कुछ ने एडिएण्टम् कॉडेटम् (Adiantum caudatum) को तथा कुछ ने अॅक्टिनोप्टेरिस् डाइकोटोमा (Actinopteris dichotoma) को मयूरशिखा लिखा है। यहाँ संक्षेप में इनका वर्णन किया गया है। १८७. मयूरशिखा (१) ले०-Actinopteris dichotoma, Bedd. (अॅक्टिनोप्टेरिस् डाइकोटोमा बेड.); Fam. Polypodiaceae (पॉलिपोडिएसी)। यह सभी स्थानों पर विशेषतया पेनिनसुला, शुष्क पहाड़ी स्थानों में ४००० फीट तक एवं नीलगिरी पर २००० फीट तक एवं कुमाऊँ में होती है। इसका क्षुप बहुत सुन्दर, ३-७ इञ्च ऊँचा एवं छोटे ताड़ की तरह दिखलाई देता है। बरसात में सूखी पहाड़ियों में पत्थरों के बीच में कहीं-कहीं यह दिखलाई देता है। पत्ते-व्यास में १-१.५ इञ्च, तालपत्र की तरह लम्बे पतले पत्रदण्ड पर रहते हैं जो मयूरशिखा की तरह दिखलाई देते हैं। गुण और प्रयोग-इसका रक्तस्तम्भक एवं कृमिघ्न रूप में प्रयोग किया जाता है। १८८. मयूरशिखा (२) ले०-Adiantum caudatum Linn. (एडिएण्टम् कॉडेटम् लिन.)। Fam. Polypoliaceae (पॉलिपोडिएसी)।