भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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गुडूच्यादिवर्गः ६३३ आते हैं जो सूक्ष्म तथा समूहबद्ध होकर प्रायः ३, पत्रवत् एवं हृद्वत् कोणपुष्पकों के बीच में रहते हैं । प्रत्येक मुण्डक में पुष्पसंख्या प्रायः २-५ तक होती है । मुण्डकगुच्छ कोणपुष्पकों के साथ मयूर की शिखा के सदृश दिखलाई देते हैं । इसके आदिवासियों में प्रचलित नाम मयूरशिखा के समानार्थक हैं, जिससे इसे श्री ठा० बलवन्त सिंह जी ने शास्त्रीय मयूरशिखा माना है । रासायनिक संगठन-इसके पत्ते एवं काण्ड के सुरासारीय सत्त्व में प्रति जैविकीय क्रिया (Antibiotic activity) पाई गई है । गुण और प्रयोग-यह स्नेहन, शीतल, मूत्रजनन, बल्य एवं ज्वरनाशक है । (१) इसके पंचांग का क्वाथ मूत्रकृच्छ्र में पिलाते हैं । (२) ज्वर में इसके पंचांग को चावल की पेया में पका कर देते हैं । इससे पेट का दर्द भी दूर होता है । (३) रक्तातिसार तथा बच्चों के अतिसार में इसका मूल उपयोगी होता है । (४) इसको गरी के तेल में पका कर व्रण एवं छाजन पर लगाते हैं । (५) इसकी जड़ को वमन रोकने के लिये देते हैं तथा मिरिच के साथ चूर्ण बनाकर दन्तशूल में लगाते हैं । १८०. गोजिह्वा (२) गावजबान सं०-गोजिह्वा, दर्वीपत्रा, वृषजिह्वा, खरपत्रा । हिं०-म०-गु०-फा०-गाजवाँ, गावजबान । अ०-लिसानुस्सौर । ले०-Onosma bracteatum Wall. (ओनोस्मा ब्रॅक्टिएटम् वाल्,) । Fam. Boraginaceae (बोरैजिनेसी) । यह ईरान, अफगानिस्तान तथा पश्चिमी हिमालय में काश्मीर से कुमाऊँ तक ११५०० फीट तक पाया जाता है । इसका क्षुप-१५ इञ्च ऊँचा तथा रोमश होता है । पत्र-मूलीय, ६" x १" बड़े, सवृन्त, भालाकार एवं ऊपर के २" x २/३", लम्बाय्र, अंडाकार, मालाकार एवं ऊपरी सतह, रोम के कारण खुरदरी होती हैं । रोम का आधार दानेदार होता है । नीचे की सतह मृदु दबे हुये रोम से युक्त होती है । पुष्प-बैंगनी रंग के गुच्छों में आते हैं जो २-३ इञ्च व्यास के तथा रोमश होते हैं । फल-१-६ इञ्च बड़े, अंडाकार तथा नोकदार होते हैं । इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है । यूनानी वाले इसके पत्तों को वर्ग गावजबान एवं पुष्पों को गुलेगावजबान के नाम से व्यवहार करते हैं । रासायनिक संगठन-इसके पत्तों को जल में भिंगोने से काफी लुआब निकलता है, जिसका स्वाद नमकीन होता है। इसकी राख में सोडियम् ९ १/२%, पोटैशियम् १४ १/२%, कॅल्शियम् २७%) मॅग्नेशियम् २ ३/४% एवं लौहं १% आदि के लवण पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-यह बल्य, हृद्य, मूत्रल, रसायन, स्नेहन एवं सौमनस्यजनन है । इसका प्रयोग फिरंग, आमवात, हृदय की धड़कन, मूत्रकृच्छ्र, आमाशय एवं बस्तिपक्षोभ एवं ज्वर में किया जाता है । (१) विषमज्वर में जब ठंड लगती है तब इसे आसव के साथ देने से प्यास कम होती है तथा बेचैनी दूर होती है। (२) फिरंग तथा सोजाक से उत्पन्न संधिशोथ में चोपचीनी के साथ इसका क्वाथ उपयोगी है । (३) हृदय की धड़कन तथा मूत्रकृच्छ्र में इसके फांट का प्रयोग किया जाता है । मात्रा-४-६ माशा दूध के साथ; पुष्प ३-६ माशा । अथ नागदमनी । तस्या नामगुणानाह विज्ञेया नागदमनी बलामोटा विषापहा । नागपुष्पी नागपत्रा महायोगेश्वरीति च ।।२९९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA