भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३२ भावप्रकाशनिघण्टुः
यह प्रायः सब प्रान्तों की गीली भूमि में अधिक पाई जाती है तथा बलूचिस्तान में भी होता है। यह प्रसर-(प्रसरी क्षुप) जाति की वनौषधि भूमि पर फैली हुई रहती है। पत्ते-अभिमुख, अभिलट्वाकार, आरावत् दन्तुर, कुंठिताग्र तथा .५-१ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-श्वेत रंग के छोटे पुष्प आते हैं, जो कोणपुष्पकों से युक्त, पत्रकोणीय, सदण्ड मुण्डकाकार व्यूह में आते हैं। फल-यही बाद में फल में परिवर्तित हो जाते हैं, जो पिप्पली की तरह दिखलाई पड़ते हैं। इसके स्वरस का उपयोग करते हैं। चरक में शाकवर्ग में इसका उल्लेख मिलता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक कड़वा पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह कटु, स्नेहन, मूत्रजनन, संग्राही एवं ज्वरहर है। (१) सूजन पर इसका पोल्टिस बाँधने से जलन कम होती है तथा जल्दी पकती है। (२) इसके पत्तों का फांट बच्चों के अजीर्ण, अतिसार, साधारण सरदी तथा प्रसूति ज्वर में दिया जाता है। मात्रा-स्वरस १/२-२ चम्मच।
अथ गोजिह्वा। तस्या नामानि गुणांश्चाह गोजिह्वा गोजिका गोभी दार्विका खरपर्णिनी। गोजिह्वा वातला शीता ग्राहिणी कफपित्तनुत् ।।२९७।। हृद्या प्रमेहकासास्रव्रणज्वरहरी लघुः। कोमला तुवरा तिक्ता स्वादुपाकरसा स्मृता ।।२९८।। गोजिह्वा के नाम तथा गुण-गोजिह्वा, गोजिका, गोभी, दार्विका और खरपर्णिनी ये नाम गोभी के हैं। गोजिह्वा- वातकारक, शीतवीर्य, ग्राही, कफ-पित्तनाशक, हृदय के लिये हितकर, प्रमेह-कास-रक्तविकार, व्रण तथा ज्वर को दूर करने वाली एवं लघु, कोमल, कषाय, तिक्त तथा मधुर रसयुक्त और विपाक में मधुर होती है। [२९७-२९८] नोट-गोजिह्वा के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद देखा जाता है। कुछ ने एलिफण्टोपस् स्केबर (Elephantopus scaber) को गोजिह्वा माना है किन्तु श्री ठा० बलवन्तसिंहजी ने इसके स्थानिक नामों के आधार पर इसे गोजिह्वा न मानकर 'मयूरशिखा' माना है। कुछ ने यूनानी में प्रचलित द्रव्य गावजबान इसे माना है, जिसका ले० नाम ओनोस्मा ब्रॅक्टिएटम् है। कुछ इसे गावजबान से भिन्न मानते हैं। कुछ ने कॅकसीनिया ग्लॉका (Caccinia glauca, Savi) को गावजबान माना है जो बलूचिस्तान में होता है तथ गुण में बल्य, मूत्रल एवं स्नेहन है तथा इसका आमवात एवं फिरंग में प्रयोग किया जाता है। चरक के दशेमानि में गोजिह्वा का उल्लेख नहीं है। शाक में इसका उल्लेख मिलता है तथा विसर्प के लेपों में भी वर्णन है। चरक, सुश्रुत दोनों इसे व्रणरोपण मानते हैं। सुश्रुत में उपदंश, व्रण एवं ग्रन्थिविसर्प में तथा शाक के रूप में इसका प्रयोग मिलता है। यहाँ पर दोनों का वर्णन किया गया है।
१७९. गोजिह्वा (१) सं०-मयूरशिखा ? हिं०-गोभी । बं०-लता, गोजिया । म०-गोजोभ, हस्तिपत । गु०-भोंपाथरी, गलजीभी । बि०-मयूरजूटी, माराचूड़ा, मयूरचुटिया, मयूरशिखार। ले०-Elephantopus scaber Linn. (एलिफॅण्टोपस् स्केबर लिन.) । Fam. Compositae (कम्पोजिटी) । यह भारत के सभी उष्ण भागों में होती है। इसका क्षुप-स्वावलम्बी तथा ८-१८ इञ्च ऊँचा होता है। मूलीय पत्ते- पत्र गुच्छों के रूप में, ४-६ इञ्च लम्बे एवं अभिलट्वाकार या अभिप्र्रासवत् होते हैं। काण्ड पतला, द्विविभक्त तथा रोमयुक्त होता है, जिस पर पत्ते १-३ इञ्च लम्बे, अवृन्त एवं काण्डसंसक्त तथा दूर-दूर होते हैं। पुष्पव्यूह-मुण्डक के रूप में