भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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पृष्ठ 682, कुल 1167 में से

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गुडूच्यादिवर्गः ६३१ इसी प्रजाति की एक दूसरी लता लुफा ग्रॅविओलेन्स राक्स. (Luffa graveolens. Roxb.) होती है, जिसमें पुष्प पीले रंग के, तन्तु ३-५ शाखाओं वाले, पुंपुष्प गुच्छबद्ध, पुंकेशर पाँच (देवदाली में केवल ३) किन्तु फल देवदाली की तरह काँटेदार होते हैं। काँटे कुछ मुलायम होते हैं। पीले, लाल और सफेद फूलों के भेद से देवदाली तीन प्रकार की मानी जाती है। इसमें सफेद फूल की देवदाली अधिक मिलती है, पीले फूल की कहीं-कहीं देखने में आती है और लाल फूल की देवदाली कम देखने में आती है। परन्तु गुणों में सब समान ही हैं। रक्त एवं पीत का रसायन के लिये उपयोग होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक एचिनेटिन् (Echinatin) नामक कड़वा पदार्थ तथा सॅपोनिन् होता है। बीजों में तेल होता है जो कड़वा नहीं होता। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, कड़वा, मूत्रजनन, विरेचन, शिरोविरेचन, व्रणशोधक एवं व्रणरोपक है। अधिक मात्रा से हैजे की तरह वमन एवं विरेचन होता है। गर्भिणी में गर्भपात हो जाता है। इसका प्रभाव कड़वी तरोई की तरह होता है। इसका प्रयोग कामला, जलोदर, हिक्का, कास, श्वास, क्षय, कृमि, यकृत् प्लीहावृद्धि एवं आन्त्रशूल में किया जाता है। (१) इसके एक फल को कूटकर रात में जल में भिंगो दें। सुबह इसे मसल, कपड़े से छान ५-१० बूँद शिरोविरेचन के लिये नाक में डालें। इससे दिनभर पानी बहता है। कफज शिरोरोग तथा कामला में इसका प्रयोग करते हैं। कामला में इसके फल को मट्ठे के साथ खिलाते हैं तथा इसके पंचांग के क्वाथ से नहलाते हैं। नस्य के लिये १ रत्ती चूर्ण का भी नस्य कराते हैं। (२) इसका फांट या टिंक्चर (१ में २०), १०-२० बूँद की मात्रा में यकृत्-प्लीहावृद्धि, बाल यकृत् की प्रारंभिक अवस्था तथा इनसे उत्पन्न जलोदर में लाभदायक है। इससे मूत्र की मात्रा बढ़ती है तथा विरेचन भी होता है। (३) इसके फांट से व्रण, दूषित व्रण आदि धोये जाते हैं। (४) कफज्वर में अन्य कफनिःसारक द्रव्यों के साथ इसका प्रयोग लाभदायक है। (५) चूहे के विष में दही के साथ इसको देने से लाभ होता है। (सुश्रुत) मात्रा-१-२ रत्ती। अथ जलपिप्पली । तस्या नामानि गुणाँश्चाह जलपिप्पल्याभिहिता शारदी शकुलादनी । मत्स्यादनी मत्स्यगन्धा लाङ्गलीयपि कीर्त्तिता ।।२९४।। जलपिप्पलिका हृद्या चक्षुष्या शुक्रला लघुः ।।२९५।। संग्राहिणी हिमा रूक्षा रक्तदाहव्रणापहा । कटुपाकरसा रुच्या कषाया वह्निवर्द्धिनी ।।२९६।। जलपीपल के नाम तथा गुण-जलपिप्पली, शारदी, शकुलादनी, मत्स्यादनी, मत्स्यगन्धा और लाङ्गली ये नाम जलपीपल के हैं। जलपीपल-हृदय तथा नेत्रों के लिये हितकर, शुक्रजनक, लघु, मलसंग्राहक, शीतवीर्य, रूक्ष, रक्तविकार, दाह और व्रण, को नष्ट करने वाली, विपाक में कटुरस युक्त, रुचिकारक, कटु तथा कषाय रसयुक्त एवं अग्निवर्धक होती है। [२९४-२९६] १७८. जलपीपल हिं०-जलपीपल, पनिसि(स)गा, भुईओकरा, बुक्कन बूटी। बं०-बुक्कन, कांचड़ा। म०-जलपिप्पली, रतवेल। गु०-रतवेलीयौ। अं०-Purple Lippia (पर्पल लिपिआ)। ले०-Lippia nodiflora Mich. (लिप्पिआ नोडिफ्लोरा मिक्.)। Fam. Verbe-naceae (वर्बिनेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

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