भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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६३० भावप्रकाशनिघण्टुः (३) आवेष्टन युक्त विबन्ध (Spastic constipation) या प्रक्षोभयुक्त बृहदांत्र (Irritable colon) एवं बृहदांत्र शोथ (Colitis) में इसका प्रयोग निषिद्ध है। मात्रा-५.१५ रत्ती। अथ देवदाली पीतदेवदाली च । खेखसावत्फलव्रततिः । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह देवदाली तु वेणी स्यात्कर्कटी च गरागरी । देवताडो वृत्तकोशस्तथा जीमूत इत्यपि ।।२९१।। पीता परा खरस्पर्शा विषघ्नी गरनाशिनी । देवदाली रसे तिक्ता कफार्शःशोफपाण्डुताः । नाशयेद्वमनी तीक्ष्णा क्षयहिक्काकृमिज्वरान् ।।२९२।। देवदाली के नाम तथा गुण-देवदाली, वेणी, कर्कटी, गरागरी, देवताड, वृत्तकोश और जीमूत ये नाम देवदाली के हैं। दूसरी पीतदेवदाली के नाम-खरस्पर्शा, विषघ्नी और गरनाशिनी ये सब हैं। देवदाली-तिक्तरसयुक्त, वमन कराने वाली, तीक्ष्ण एवं कफ, अर्श (बवासीर), शोथ, पाण्डुरोग, क्षय, हिचकी, कृमि तथा ज्वर को नष्ट करने वाली होती है। [२९१-२९२] अथ तत्फलगुणानाह देवदालीफलं तिक्तं कृमिश्लेष्मविनाशनम् । स्रंसनं गुल्मशूलघ्नमशोंघ्नं वातजित्परम् ।।२९३।। देवदाली घघरवेल के फल का गुण-यह तिक्तरसयुक्त, स्रंसन एवं कृमि, कफ, गुल्म, शूल, अर्श तथा वायु को दूर करने वाला होता है। [२९३] १७७ देवदाली हिं०-देवदाली, सोनैया, बन्दाल, घघरवेल, घुसरान। बं०-बिंदाल, घोषालता, देवताड़, देयात्पड़। म०- देवडांगरी, कुकरवेल। गु०-कुकड़वेल। ते०-पनिबिर। क०-देवडंगर। अं०-Bristly Luffa (ब्रिस्टलि लफा)। ले०-Luffa echinata Roxb. (लुफा एचिनॅटा राक्स.) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । यह-सिन्ध, गुजरात, बिहार, देहरादून, उत्तरी अवध, बुन्देलखंड, उत्तर प्रदेश और बंगाल आदि स्थानों में अधिक उत्पन्न होती है। इसकी लता-खेखसा (कर्कोटकी) के समान होती है, कर्कोटकी का विस्तार अधिक सघन होता है, परन्तु देवदाली का विस्तार बहुत कम होता है। इसके काण्ड पतले एवं पाँच कोन वाले होते हैं। तन्तु द्विशाख शाखाओं वाले होते हैं। पत्ते-१-२ १/२ इञ्च के घेरे में गोलाकार, वृक्काकार, लट्वाकार, पञ्च कोणाकार अथवा पाँच भागवाले एवं गहरे कटे किनारे वाले तथा प्रत्येक भाग दन्तुर दीर्घवृत्ताभ होते हैं। पत्रदण्ड-१-२ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प-श्वेत तथा व्यास में १/२-१ इञ्च होते हैं। पुं-पुष्प-२-८ इञ्च लम्बी मंजरियों में और उन्हीं पत्रकोणों में एकाकी स्त्री-पुष्प निकले रहते हैं। फल-१ से १।। इञ्च लम्बे, लगभग आधा इञ्च मोटे, १/६-१/४ इञ्च लम्बे सघन कड़े रोम (बाह्यवृद्धि) अथवा कोमल काँटों से आच्छादित रहते हैं। फल कच्चे होते हैं, तो यह काँटे हरे रंग के और सूखने पर भूरे रंग के हो जाते हैं। फलों के मुँह पर सूक्ष्म ढक्कन (Lid) होता है। जब फल जाड़े में पक कर सूख जाता है, तब यह ढक्कन अपने आप फल से अलग होकर गिर जाता है और फल के अन्दर के रेशेवाले तीन छिद्रों में से बीज निकलना आरम्भ होता है। इस लता का स्वाद बहुत कडुवा होता है। इसके फल का उपयोग किया जाता है। पंचांग का प्रयोग भी किया जा सकता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmı. Digitized by S3 Foundation USA