भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 680, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ६२९ १७६. सनाय हिं०-देशी सनाय। बं०-सोनपात, सोनामुखी। म०-सोनामुखी। गु०-मीठीआकबल, सोना मुखी। ते०- नेलातनेगेडु। ता०-निलाविरै। अ०-सनाय मक्की। अं०-Indian or Tinnevelly Senna (इंडियन या तिनेवेल्ली सेना)। ले०-Cassia angustifolia, Vahl (केशिया ॲंगस्टिफोलिया)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। इसका आदि स्थान अरब तथा सोमालीलैंड है। किन्तु अब इसकी खेती दक्षिण भारत में तिनेवेल्ली, मदुरा तथा त्रिचनापल्ली जिलों में होती है। मैसूर में भी इसकी उपज का प्रयत्न किया गया है। इसका सीधा गुल्म २-३ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-संयुक्त होते हैं जिनमें पत्रक १-८ जोड़े होते हैं। पत्रक- अंडाकार भालाकार, २.५-७ से० मी० लम्बे तथा ७-८ मि० मि० चौड़े (१-२ इञ्च × ०.२-०.६ इञ्च) एवं चिकने होते हैं। पुष्प-पत्रकोणीय सदण्डिक मंजरियों में पीतवर्ण के पुष्प आते हैं। फली-चपटी, १.४ से २.८ इञ्च लम्बी, करीब ०.८ इञ्च चौड़ी एवं हरिताभ भूरी होती है। यह के. अॅक्यूूटिफोलिया की फली से कम चौड़ी किन्तु अधिक लम्बी होती है। बीज-संख्या में ५-७, गहरे भूरे रंग के, अभिलट्वाकार एवं दबे हुए होते हैं। इसकी फली एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। ब्रिटिश फारमाकोपिया (British pharmacopoeia) में दो जाति की सनाय मान्य है। एक उपर्युक्त सनाय तथा दूसरी ॲलेक्सॉण्ड्रियन सेना (Alexandrian senna) जो कि केशिया अॅक्यूूटिफोलिया (Cassia acutifolia Delile) के जंगली पौधों से प्राप्त होती है। यह अफ्रीका तथा सूडान में होती है। इसको भारत में भी उगाने का प्रयत्न किया गया है। एक तीसरा भेद के. ऑब्ओव्हेटा (Cassia obovata (L.) Collad) होता है, जिसे इटालियन सेना (Italiansenna) कहते हैं, पंजाब, गुजरात, दक्षिण महाराष्ट्र एवं डेक्कन में पाया जाता है। यह देशी सनाय (Country senna) के नाम से भारतीय बाजार में सनाय के प्रतिनिधि रूप में बिकती है। रासायनिक संगठन-इसमें ह्वीन (Rhein, C₁₄ H₅ O₂ (OH)₂ COOH), एलोएमोडीन (Aloe-emodin, C₁₄ · H₅ O₂) (OH)₂ (CH₂ OH), केम्फेरिन (Kaempferin) एवं आइसोहॅम्नेटिन (Isorhamnetin) मुक्त रूप में या ग्लाइकोसाइड के रूप में होते हैं। इनके अतिरिक्त केम्फेरॉल (Kaempferol), माइरिसिल् अॅल्कोहोल (Myricyl alcohol) तथा फाइटोस्टेरोलिन (Phytosterolin) भी पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त इसके पत्तों में गोंद, कॅल्शियम ऑक्सॅलेट (Calcium oxalate), राल तथा कुछ ग्लाइकोसाइड सम द्रव्य होते हैं। मेथिल अॅन्थ्रा क्विनोन (Methyl-anthraquinone) से संजात (Derivatives) कुल द्रव्य की मात्रा १-४% तक पाई गई है। गुण और प्रयोग-यह रेचन औषध है। इसका छोटी आँतों पर प्रभाव होता है, जिससे पुरस्सरण की क्रिया बढ़ती है। सेवन के ६-१० घण्टे पश्चात् साफ शौच होता है। इसमें कुछ मरोड़ होती है जो संभवतः इसके पत्तों में के रालीय द्रव्य के कारण या पत्तों में रहने वाले एमोडीन (Emodin) के कारण होती है। इसे दूर करने के लिये तथा स्वाद ठीक करने के लिये इसके साथ सुगन्धित द्रव्य या क्षारीय विरेचन एवं मुलेठी या द्राक्षा देना चाहिये। इसका उत्सर्ग दूध द्वारा होने के कारण दूध में विरेचक गुण आ जाता है। (१) जिनको कब्ज की शिकायत रहती है, उन्हें इसको दिया जाता है। (२) पित्तज्वर में विरेचन के लिये इसे देने से दूषित पित्त निकल जाता है, जिससे दाह, शिरःशूल आदि कम हो जाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA