भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६२८ भावप्रकाशनिघण्टुः १७५. वनककोड़ा हिं०-बाँझककोड़ा, वनककोड़ा, बाँझखेखसा, बं०-तित्कांकरोल। म०-बाँझकटोली। गु०-बाँझकंटोला, कंकोडी। क०-माडहागल। ता०-पलुप्पकै। ते०-आगाकर। ले०-Momordica dioica Roxb. (मोमोर्डिका डायोइका राक्स.)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी)। यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों के जंगल झाड़ियों में उत्पन्न होती है और वर्षा ऋतु में अधिक पाई जाती है। हिमालय में ५००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। इसकी लता, पत्र आदि खेखसा के समान ही होते हैं, केवल अन्तर यह है कि खेखसा में फल लगता है और इसमें फल नहीं लगता इसलिए इसको वन्ध्याकर्कोटकी कहते हैं। इसका कारण यह है कि यह द्विधैकलिंगक वनस्पति है, इसलिये नर और नारी पुष्पों की लतायें पृथक् होती हैं। नरपुष्पों की लता को वन्ध्याकर्कोटकी या बाँझककोड़ा और फल देने वाली नारी पुष्पों को उत्पन्न करने वाली लताएँ कर्कोटकी कही जाती हैं। इसकी लता-आरोही, चिकनी प्रायः दुर्गन्धयुक्त एवं कोनदार काण्ड वाली होती है। तन्तु निःशाख होते हैं। पत्ते-आकार में छोटे-बड़े हुआ करते हैं जो २ से ४ इञ्च के घेरे में लम्बाई युक्त गोलाकार, हृद्वत्, ३ भागों में विभक्त या अखण्ड, प्रायः लहरदार एवं दन्तुर धार वाले रहते हैं। पुष्प-बड़े, पीत वर्ण के; नर पुष्प-पतले एवं २-६ इञ्च लम्बे पुष्पडण्डों से युक्त होते हैं एवं नारीपुष्पों के दण्ड छोटे या उतने ही बड़े होते हैं। नरपुष्प में कोणपुष्पक बड़ा एवं पुष्प को आच्छादित किये रहता है तथा नारीपुष्प में यह छोटा होता है। फल-यह १-३ इञ्च लम्बा, दीर्घ वृत्ताभ और तीक्ष्णाग्र अथवा अंडाकार होता है तथा इस पर मुलायम काँटे सदृश बाह्य वृद्धियाँ होती हैं। जड़ बहुवर्षायु एवं कन्दवत् होती है। इसकी पत्ती एवं फल का शाकार्थ उपयोग होता है तथा कन्द एवं पत्रादि का चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है। कर्कोटकी का स्वतंत्र वर्णन (गुण, प्रयोग आदि) आगे शाकवर्ग में आया है। रासायनिक संगठन-इसकी राख में मैंगनीज होता है। इसमें क्षाराभ भी पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह थोड़ी सी रक्तसंग्राहक, विषनाशक, कफघ्न एवं व्रणहर है। इसका कन्द कफनाशक एवं सभी विषों को दूर करने वाला है। (१) इसके कन्द को भूनकर या उसका चूर्ण रक्तार्श में देते हैं। (२) सर्पविष तथा बिच्छू के काटने पर इसका प्रयोग करते हैं। इसकी जड़ को पीस कर पिलाते हैं तथा नस्य देते हैं। (३) ज्वर में शाक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है (सु० उ० ३९-१५०)। तीव्र ज्वर एवं प्रलाप में इसका बाह्य लेप किया जाता है। (४) मूत्रकृच्छ्र में मूल को दूध के साथ पिलाते हैं। मार्कण्डिका (सनाय) । तस्या नामगुणानाह मार्कण्डिका भूमिवल्ली मार्कण्डी मृदुरेचनी ।। २८९ ।। मार्कण्डिका कुष्ठहरी ऊर्ध्वाधःकायशोधिनी । विषदुर्गन्धकाघ्नी गुल्मोदरविनाशिनी ।। २९० ।। सनाय के नाम तथा गुण-मार्कण्डिका, भूमिवल्ली, मार्कण्डी और मृदुरेचनी (मृदु विरेचन करने वाली) ये नाम सनाय के हैं। सनाय-कुष्ठनाशक, ऊपर तथा नीचे से शरीर का शोधन करने वाली एवं विष, दुर्गन्ध, खाँसी, गुल्म तथा उदर रोग को दूर करने वाली होती है। [२८९-२९०] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA