भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 678, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ६२७ लम्बी एवं लम्बे वृन्त से युक्त होती है। बीज-राई के समान किन्तु छोटे होते हैं। इसके बीज एवं मूल का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल होता है। बीजों में क्लिओमिन नामक तत्त्व होता है। गुण और प्रयोग-इसके बीज राई की तरह दाहजनक, दीपन, पाचन, उत्तेजक एवं कृमिघ्न है। जड़ उत्तेजक तथा स्वेदजनन है। पत्तों को पीस कर त्वचा पर लेप करने से यह पीत हुरहुर की अपेक्षा कम रक्तोत्पादक है। (१) ज्वर में कमजोरी आने पर उत्तेजना लाने के लिये समूल क्षुप का स्वरस ½-१ तो० पिलाते हैं। (२) पूतिकर्ण एवं कर्णशूल में इसके पत्तों का रस कान में डालते हैं, किन्तु इससे जलन होकर तकलीफ होती है। (३) ग्रन्थि बैठाने के लिये इसके पत्तों का लेप किया जाता है। १७४. हुरहुर (पीत) हिं०-चमनी, हुरहुरपीला, केदार शनावर (सं०)। म०-पिवली तिलवण। गु०-पीली तलवर्णा। बं०- हुरहुरिया। ले०-Cleome viscosa, Linn. (क्लिओम् विस्कोसा, लिन.); C. isocandra Linn. (आइसोकैण्ड्रा लिन.)। Fam. Capparidaceae (कैपेरिडेसी)। यह भारत के सभी भागों में होती है। इसका क्षुप-भी पहले की तरह होता है किन्तु इसमें सपत्रक पर्ण में पत्रकों की संख्या ३-५ तक होती है एवं फूल-पीले होते हैं। इसमें नरकेशर छोटे होते हैं। फली-चिपटी, रेशेदार एवं छोटे वृन्त से युक्त होती है। इसके बीज एवं पत्तों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसी की एक अन्य जाति क्लि. मोनोफाइला, लिन. (C. monophylla, Linn.) होती है जिसमें पर्ण अपत्रक एवं पुष्प बैंगनी होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में ०.१% विस्कोसिक अम्ल (Viscosic acid), ०.०४% विस्कोसिन (Viscosin) पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह स्वेदजनन, उत्तेजक, कोष्ठवात-प्रशमन एवं कृमिघ्न है। पत्तों का रस कोथप्रशमन एवं मूल कृमिघ्न है। इसके बीज एवं पत्तों का प्रभाव राई की तरह होता है। श्वेत की अपेक्षा इसके पत्ते अधिक दाहजनक हैं, क्योंकि इसके लेप से त्वचा त्वरित लाल हो जाती है एवं फोड़े भी हो जाते हैं। (१) इसके बीज केचुओं की बीमारी में देते हैं। (२) आन्तरिक शोथ कम करने के लिये राई की अपेक्षा इसके पत्तों का लेप अधिक प्रभावशाली होता है। स्फोटोत्पादन के लिये या त्वक्-रागोत्पादन के लिये इसके पत्तों का पञ्चांग का लेप करते हैं। (३) पूतिव्रण एवं बाधिर्य में इसके पत्तों का स्वरस तेल मिलाकर कान में डालते हैं। मात्रा-बीज १-३ माशा। अथ वन्ध्याकर्कोटकी (वनककोडा) । तस्या नामानि गुणांश्चाह वन्ध्याकर्कोटकी देवी कन्या योगीश्वरीति च। नागारिर्नक्रदमनी विषकण्टकिनी तथा ॥२८७॥ वन्ध्याकर्कोटकी लघ्वी कफनुद् व्रणशोधिनी। सर्पदपंहरी तीक्ष्णा विसर्पविषहारिणी ॥२८८॥ वन ककोड़ा के नाम तथा गुण-बन्ध्याकर्कोटकी, देवी, कन्या, योगीश्वरी, नागारि, नक्रदमनी और विषकण्टकिनी ये नाम वन ककोड़ा के हैं। वनककोड़ा-लघु, कफनाशक, व्रणशोधक, साँप के अहङ्कार को दूर करने वाली (विष के प्रभाव को दूर करने वाली), तीक्ष्णवीर्य एवं विसर्प तथा विष को नष्ट करने वाली होती है। [२८७-२८८] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA