भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२६ भावप्रकाशनिघण्टुः (३) खुजली में इसका रस शरीर पर मलते हैं। (४) सरदी से उत्पन्न शिरःशूल में इसके स्वरस का नस्य उपयोगी है। (५) कामला में इसके पत्तों का रस नेत्रों में डालते हैं। मात्रा-स्वरस १/२-१ तोला। अथ सुवर्चला (हुरहुर-श्वेत, पीत) । तयोर्नामगुणानाह सुवर्चलार सूर्यभक्ता वरदा बदराऽपि । सूर्यावर्त्ता रविप्रीताऽपरा ब्रह्मसुदुर्लभा ।। २८४ ।। सुवर्चला हिमा रूक्षा स्वादुपाका सरा गुरुः । अपित्तला कटुः क्षारा विष्टम्भकफवातजित् ।। २८५ ।। अन्या तिक्ता कषायोष्णा सरा रूक्षा लघुः कटुः । निहन्ति कफपित्तास्रश्वासकासारुचिज्वरान् ।। विस्फोटकुष्ठमेहास्त्रयोनिरुक्कृमिपाण्डुताः ।। २८६ ।। हुरहुर तथा ब्रह्मसुवर्चला१ के नाम और गुण-सुवर्चला, सूर्यभक्ता, वरदा, बदरा, सूर्यावर्त्ता और रविप्रोता ये नाम हुरहुर के हैं। एक दूसरे प्रकार की भी 'हुरहुर' होती है, जिसका ब्रह्मसुदुर्लभा नाम है। हुरहुर-शीतवीर्य, रूक्ष, विपाक में मधुररसयुक्त, सारक, गुरु, किञ्चित् पित्तजनक, कटुरसयुक्त, क्षारीय एवं विष्टम्भ, कफ और वात को दूर करने वाली होती है। और द्वितीय हुरहुर (ब्रह्मसुदुर्लभा)-तिक्त-कषाय और कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, सारक, रूक्ष, लघु एवं कफ, पित्त-रक्त, श्वास, कास, अरुचि, ज्वर, विस्फोटक, कुष्ठ, प्रमेह, रक्तविकार, योनिरोग, कृमि तथा पाण्डुरोग को दूर करने वाली होती है। [२८४-२८६] नोट-उपर्युक्त वनस्पति को अधिकांश विद्वानों ने आजकल मिलने वाली हुरहुर माना है। हुरहुर के दो भेद पाये जाते हैं। गाइनेण्ड्रोप्सिस् पेण्टाफाइला (Gynandropsis pentaphylla) नामक श्वेत हुरहुर तथा क्लिओम् बिस्कोसा (Cleome viscosa) नामक पीत हुरहुर। एक अन्य क्लि. मोनोफाइला (C. monophylla Linn.) नामक बैंगनी हुरहुर भी होता है। श्वेत हुरहुर के पत्र पर्णनाल पर सूर्य के साथ घूमते हैं, जिससे उपर्युक्त सूर्यभक्ता, सूर्यावर्ता, रविप्रीता आदि नाम इस (श्वेत हुरहुर) के लिये सार्थक मालूम पड़ते हैं। कुछ विद्वान् इसमें उग्रगन्ध होने से इसे उग्रगन्धा, अजगन्धा मानते हैं। इसका मराठी नाम तिलवण इसके तिलपर्णी होने का सन्देह पैदा करता है। कुछ ने इसे कर्णस्फोटा माना है। बंगाली वैद्य सुवर्चला नाम से इसे लेते हैं। यहाँ दोनों हुरहुर का वर्णन किया गया है। हुरहुर को शास्त्रीय सुवर्चला, अजगन्धा तिलपर्णी, आदित्यभक्ता, सूर्यमुखी या कर्णस्फोटा इनमें से क्या माना जाय यह सन्देहास्पद है। मालवा, राटंडीफोलिया (Malva rotundifolia Lill.; Fam. Malvaceae) का स्थानिक नाम सोंचल होने के कारण कुछ विद्वान् उसे सुवर्चला मानते हैं। १७३. हुरहुर (श्वेत) हिं०-हुरहुर सफेद, करेला, चमनी। को०-सेत काटाझड़ा। म०-तिलवण, माटवण, माब्ली। बं०- हुरहुरिया। गु०-धोली तलवर्णा। ते०-वामिंटम्। मल०-तैवेल। ता०-कुडुगु, वेलै। ले०-Gynandropsis pentaphylla, DC. (गाइनेण्ड्राप्सिस् पेण्टाफाइला डीसी.)। Fam. Capparidaceae (कैपेरिडेसी)। यह भारत के सभी उष्ण स्थानों में होता है। इसका क्षुप-१-३ फीट ऊँचा एवं दुर्गन्धयुक्त होता है। पत्ते-सपत्रक, पाणिवत, पत्रक प्रायः पाँच, अभिलट्वाकार, ग्रन्थिक रोमश एवं चिपचिपे होते हैं। पुष्प-श्वेत या बैंगनी होते हैं, जिसमें ६ नरकेसर होते हैं। फली-गोल, चिकनी, १. ब्रह्मसुवर्चला इति पाठ०