भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ६२५ (१) त्वचा के विकारों में यह अच्छी लाभदायक है। कुष्ठ में इससे कुछ लाक्षणिक लाभ एवं साधारण स्वास्थ्य ठीक होता है। फिरंग की द्वितीयावस्था एवं तृतीयावस्था तथा जीर्ण आमवात में इसको देते हैं। फिरंग में इसके देने से एक सप्ताह में त्वचा मुलायम पड़कर छूटने लगती है। अन्य त्वचा रोगों में भी इससे लाभ होता है। इसका चूर्ण व्रण पर लगाते हैं तथा इसे खिलाते हैं। इसके प्रयोग से यदि कण्डू हो तो कुछ दिन इसे रोकना चाहिये तथा रेचक औषध देनी चाहिये। (२) बच्चों के खूनी आँव में २ से ४ पत्तों का स्वरस, जीरक एवं मिश्री के साथ पिलाते हैं तथा नाभि के नीचे लेप करते हैं। (३) बच्चों को शब्दोच्चारण ठीक करने के लिये इसे चबाने को देते हैं। (४) स्मरणशक्ति बढ़ाने के लिये इसका चूर्ण दुग्ध के साथ दिया जाता हैं। मात्रा-चूर्ण २-४ रत्ती; ताजे पत्ते ८-१२ प्रौढ़ के लिये; २-४ बालकों के लिये। अथ द्रोणा (गूमा)। तस्या नामगुणानाह द्रोणा च द्रोणपुष्पी च फलेपुष्पा च कीर्त्तिता। द्रोणपुष्पी गुरुः स्वादू रूक्षोष्णा वातपित्तकृत् ।।२८२।। सतीक्ष्णलवणा स्वादुपाका कट्वी च भेदिनी। कफामकामलाशोथतमकश्वासजन्तुजित् ।।२८३।। गूमा के नाम तथा गुण-द्रोणा, द्रोणपुष्पी और फलेपुष्पा ये नाम गूमा के हैं। गूमा-गुड़, स्वादिष्ट, रूक्ष, उष्ण, वात-पित्त कारक, तीक्ष्ण, लवणरसयुक्त, विपाक में मधुररसयुक्त, कटु, मल को भेदन करने वाली एवे कफ, आम, कामला, शोथ, तमकश्वास और क्रिमि को दूर करती है। [२८२-२८३] १७२. गूमा हिं०-गूमा। बं०-घलघसे, हलकषा, दण्ड कलस। गु०-कुबो। म०-तुंब्रा। ले०-Leucas cephalotes Spreng. (ल्यूकस् सिफैलोटिस् स्प्रेंग.); Fam. Labiatae (लेबिएटी)। यह प्रायः सब स्थानों में वर्षा में अधिक दिखाई पड़ती है। इसका क्षुप-आधे से २-३ फीट तक ऊँचा होता है। शाखायें चौपहल एवं रोमश होती हैं। पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे तथा आधा इञ्च चौड़े अथवा न्यूनाधिक होते हैं। ये अंडाकार- प्रासवत् या लट्त्वाकार, गोल एवं आरावत् दन्तुर एवं रोमश दन्तुर होते हैं। पुष्पगुच्छ-श्वेत, प्रायः अग्र्य, गोल, व्यास में १-२ इञ्च एवं प्रायः लम्बाग्र कोणपुष्पकों से घिरे हुये रहते हैं और पुष्पगुच्छ के शीर्ष पर प्रायः दो पत्तियाँ रहती हैं। पुष्प आकृति में द्रोण के सदृश होते हैं, इसलिये इसे द्रोणपुष्पी कहते हैं। पुष्प शरद् में आते हैं तथा ग्रीष्म में यह सूख जाता है। इस प्रजाति में अनेक जातियाँ हैं जिनमें से कई एक गूमा कहा जाता है। इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक सुगन्धित तैल तथा क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, कटु, स्वेदजनन, वातप्रशमन, सं्रसन एवं कफघ्न है। इसका प्रयोग प्रतिश्याय, कास, अग्निमांद्य, विषमज्वर एवं त्वचा के रोगों में किया जाता है। (१) जुकाम में इसका फांट या स्वरस देते हैं। कफज्वर में टंकणक्षार तथा मधु के साथ इसका स्वरस देते हैं। इसके फूलों का शर्बत भी जुकाम आदि में लाभदायक है। (२) आध्मान तथा उदरशूल में इसका स्वरस दिया जाता है। ४३ भाव. I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA