भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४२ भावप्रकाशनिघण्टुः "आदिशब्दान्नलिनी-कमलिनीत्यादि ।।६।। यहाँ पर आदि पद से—नलिनी, कमलिनी इत्यादि भी नामान्तर समझना चाहिये। [६] पद्मिनी शीतला गुर्वी मधुरा लवणा च सा। पित्तासृक्कफनुद्रूक्षा वातविष्टम्भकारिणी ।।७।। पद्मिनी—शीतल, पाक में गुरु, मधुर तथा लवण रस युक्त, रूक्ष, एवम्—वातविष्टम्भ (अधो वायु का शुद्ध न खुलना) पैदा करने वाली होती है तथा पित्त, रक्तविकार और कफ की नाशक होती है। [७] अथ नवपत्रादि। तस्य नामान्याह संवर्तिका नवदलं बीजकोशस्तु कर्णिका। किञ्जल्कः केशरः प्रोक्तो मकरन्दो रसः स्मृतः। पद्मनालं मृणालं स्यात्तथा बिसमिति स्मृतम् ।।८।। कमल के नवीन पत्ते आदि के नाम—संवर्तिका—यह कमल के नवीन पत्तों का नाम है। कर्णिका—बीजकोश (जिसमें बीज रहते हैं) का नामान्तर है। किञ्जल्क-कमल के केशर को कहते हैं। मकरन्द—कमलपुष्प के रस का वाचक है। मृणाल तथा बिस ये दो नाम कमल के नाल के हैं। [८] कमल के विभिन्न अंगों के अन्य पर्यायवाची तथा विभिन्न भाषाओं के नाम—कमलकर्णिका—सं०—बीजकोश, वराटक। हिं०—कमल का छत्ता। म०—धांगुड, ढांपणी। गु०—धीतेलां, कुमडा (रात्रिविकाशी)। कमलनाल—सं०—बिस, मृणाल। हिं०—मुरार, भसींड। म०—भिसें। कमलकन्द—सं०—शालूक, करहाटक। गु०—लोढ। अथ संवर्तिका (नये पत्ते)। तस्या गुणानाह संवर्तिका हिमा तिक्ता कषाया दाहतृट्प्रणुत्। मूत्रकृच्छ्रगुदव्याधिरक्तपित्तविनाशिनी ।।९।। संवर्तिका (कमल के नवीन पत्र)—शीतल, तिक्त तथा कषाय रस युक्त एवम्—दाह, प्यास, मूत्रकृच्छ्र, गुदासम्बन्धी रोग (अर्श आदि) और रक्तपित्त को नष्ट करने वाली होती है। [९] अथ कर्णिका। तस्या गुणानाह पद्मस्य कर्णिका तिक्ता कषाया मधुरा हिमा। मुखवैशद्यकृल्लघ्वी तृष्णाऽस्रकफपित्तनुत् ।।१०।। कर्णिका (बीज कोश)—तिक्त, कषाय तथा मधुर रस युक्त, शीतल, लघु और मुख को स्वच्छ करने वाली एवम्—तृषा, रक्तविकार, कफ तथा पित्त को नाश करने वाली होती है। [१०] कमल के बीज—इसके बीज पौष्टिक, मधुर, स्नेहन, ग्राही, रक्तसंग्राहक, गर्भसंस्थापक एवं शीत होते हैं। खाद्य के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसकी पेया बनाकर वमन तथा हिचकी में देने से लाभ होता है। प्रदर में भी इसे देते हैं। मात्रा—१/४-१/२ तो० पेया बनाकर। अथ किञ्जल्कः (केशर)। तस्य गुणानाह किञ्जल्कः शीतलो वृष्यः कषायो ग्राहकोऽपिसः। कफपित्ततृषादाहरक्तार्शोविषशोथजित् ।।११।। किञ्जल्क (कमल का केशर)—शीतल, वृष्य (वीर्यवर्धक), कषाय रस युक्त, ग्राही एवम्—कफ, पित्त, तृषा, दाह, रक्तार्श (खूनी बवासीर), विष और शोथ को दूर करने वाला होता है। [११] कमल का केशर—यह ग्राही, शीतवीर्य, रक्तपित्तशामक एवं दाहप्रशमन होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmù. Digitized by S3 Foundation USA