भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्पवर्ग: ६४१ जैसा कि ऊपर कहा गया है कमल (नेलंबिअम् स्पेसिओजम्) में कोई जाति (Species) भेद नहीं पाया जाता है केवल वर्ण-भेद से दो प्रकार श्वेत एवं गुलाबी पाये जाते हैं। इसमें पत्तियाँ तथा पुष्प प्रायः पानी की सतह के ऊपर निकले रहते हैं। इसमें स्त्री-केशर पृथक्-पृथक् कर्णिका में इतस्ततः धँसे हुए तथा बाह्यदल (Sepals) कर्णिका के नीचे से निकले रहते हैं। इसमें दूध होता है तथा पत्र-नाल पर दूर-दूर छोटे कांटे होते हैं। कुमुद (निफिया) में पत्तियाँ तथा पुष्प प्रायः पानी की सतह तक निकले रहते हैं। इनमें स्त्री केशर चक्राकार स्थित, न्यूनाधिक परस्पर संयुक्त और कर्णिका में किंचित् धँसे रहते हैं। ऊपर के कुछ बाह्यदल कर्णिका से संलग्न रहते हैं। यहाँ कमल का वर्णन किया गया है। कुमुद का आगे वर्णन किया गया है। १. कमल हिं०-कमल, पुरइन। बं०-पद्म। उड़ि०-पद्म। म०-गु०-कमल। प०-कवलककरी। क०-बिलिया तावरे। ते०-कलावा, तम्मिपुव्वु। ता०-तामरै, अम्बल्। मला०-तमर। अ०-कातिलुन्नहल। अं०-Sacred lotus (सैक्रेड लोटस्)। ले०-Nelumbium speciosum Willd. (नेलंबियम् स्पेसिओजम् विल्ड)। Fam. Nymphaeaceae (निंफिएसी)। यह भारत के सभी उष्ण प्रदेशों में होता है। यह तालाबों में होने वाला विस्तृत जलीय क्षुप है। इसकी जड़ कीचड़ में फैलती है। पत्र-पतले, १-३ फुट व्यास के, चक्राकार, चिकने, चमकीले, नतोदर तथा वृन्तगोलायत होते हैं। पत्रनाल-बहुत लम्बा तथा उस पर दूर- दूर छोटे काँटे होते हैं। फूल-एकाकी, ४-१० इञ्च व्यास में, श्वेत या गुलाबी, सुगंधित तथा लम्बे दंड पर आता है। गर्मी तथा वर्षा काल में यह फूलते हैं। कर्णिका (बीजाधार) स्पंज के समान एवं धूसर होती है जिसमें १/२ इञ्च लम्बे, गोल, काले तथा चिकने बीज रहते हैं। इन्हें (हिं०) कमलगट्ठा, (सं०) पद्मबीज, (म०) कमलकाकडी, (गु०) पबडी कहा जाता है। रासायनिक संगठन-इसके कंद तथा बीजों में राल, ग्लूकोज, मेटार्बिन (Metarbin), टैनिन, वसा तथा नेलंबिन (Nelumbine) नामक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-कमल के पुष्प-(पंखुड़ियाँ) शीत, दाह प्रशमन, हृदय-बल्य, हृदयसंरक्षक, रक्तसंग्राहक, मूत्रजनन, मूत्र विरजनीय एवं ग्राही होते हैं। इनका प्रयोग रक्तपित्त, ज्वर, मूत्रकृच्छ्र एवं अतिसार में किया जाता है। (१) तीव्र ज्वर में हृदय पर ज्वर का कुप्रभाव न हो तथा उसे बल मिले इस दृष्टि से इसका फांट मिश्री मिलाकर दिया जाता है। इसके साथ श्वेत तथा रक्तचंदन, बालक, मुलेठी, मुस्तक मिलाते हैं। डिजिटैलिस की तरह इसका हृदय पर प्रभाव पड़ता है जिससे धड़कन कम होकर हृदय को बल मिलता है। (२) गर्भावस्था में रक्तस्राव प्रारंभ होने पर इसके फांट से त्वरित लाभ होता है। मात्रा-पंखड़ियां १-२ तो० फाँट बनाकर। अथ पद्मिनी। तस्या लक्षणनामगुणानाह मूलनालदलोत्फुल्लफलैः समुदिता पुनः। पद्मिनी प्रोच्यते प्राज्ञैर्बिसिन्यादि च सा स्मृता ॥६॥ पद्मिनी के लक्षण-मूल, नाल, पत्र और फल से युक्त, खिले हुए कमल को विद्वान् लोग "पद्मिनी" कहते हैं। पंचांग (पद्मिनी) के नाम-इसके बिसिनी आदि भी नाम हैं। [६] ४४ भाव. I