भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 691, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ पुष्पवर्गः
तत्रादौ कमलम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
वा पुंसि पद्मं नलिनमरविन्दं महोत्पलम् । सहस्रपत्रं कमलं शतपत्रं कुशेशयम् ॥१॥ पङ्केरुहं तामरसं सारसं सरसीरुहम् । विसप्रसूनराजीवपुष्कराम्भोरुहाणि च ॥२॥ कमलं शीतलं वर्ण्यं मधुरं कफपित्तजित् । तृष्णादाहास्रविस्फोटविषवीसर्पनाशनम् ॥३॥ कमल के नाम—पद्म (यह नपुंसकलिङ्ग कभी-कभी पुंल्लिङ्ग में भी व्यवहृत होता है), नलिन, अरविन्द, महोत्पल, सहस्रपत्र, कमल, शतपत्र, कुशेशय, पङ्केरुह, तामरस, सारस, सरसीरुह, विसप्रसून, राजीव, पुष्कर और अम्भोरुह ये सब संस्कृत में होते हैं। कमल—शीतल, वर्ण्य, (शरीर के रंग) को उत्तम करने वाला, मधुर रस युक्त, कफ-पित्त नाशक एवम्—तृष्णा, दाह, रक्तविकार, विस्फोट (शरीर में छोटी-छोटी फुंसियों का होना), विष और विसर्प को दूर करने वाला होता है। [१- ३]
अथ नामोल्लेखपूर्वकं कमलभेदाँस्तद्गुणाँश्चाह
विशेषतः सितं पद्मं पुण्डरीकमिति स्मृतम् । रक्तं कोकनदं ज्ञेयं नीलमिन्दीवरं स्मृतम् ॥४॥ धवलं कमलं शीतं मधुरं कफपित्तजित् । तस्मादल्पगुणं किञ्चिदन्यद्रक्तोत्पलादिकम् ॥५॥ कमल के भेदों के नाम—विशेष करके श्वेत कमल “पुण्डरीक” कहा जाता है। लाल कमल को “कोकनद” एवम् नीले कमल को “इन्दीवर” कहते हैं। श्वेतकमल—शीतल, मधुर एवम् कफ-पित्त का नाशक होता है। रक्तकमल आदि श्वेतकमल की अपेक्षा न्यूनगुणवाले होते हैं। [४-५] नोट—भावप्रकाशकार कमल के ३ भेद श्वेत, रक्त तथा नील लिखते हैं। आगे श्वेत कुवलय (श्वेत कुमुद) का तथा कल्हार (रक्त कुमुद) का अलग वर्णन करते हैं। इसके अतिरिक्त एक स्थल कमल का और वर्णन करते हैं। अन्य निघण्टुओं ने वर्ण के आधार पर जो नाम दिये हैं उनमें आपस में पर्याप्त मतभिन्नता पाई जाती है। चरक, सुश्रुतादि में भी इनके कई भेदों का उल्लेख है। आधुनिक वानस्पतिक वर्गीकरण की दृष्टि से नेलंबिअम् स्पेसिओजम् में श्वेत एवं रक्त दो भेद पाये जाते हैं। इसे अधिकांश विद्वानों ने कमल माना है। इसमें नीला भेद नहीं पाया जाता। दूसरी प्रजाति (Genus) निंफिया की वेत, रक्त तथा नील जातियाँ (Species) पायी जाती हैं। इस प्रजाति को कुमुद कोई मानते हैं। संभव है इसी प्रजाति के नील जाति (Species) को कमल का नील भेद मान लिया गया हो। गुणों की दृष्टि से दोनों (कमल एवं कुमुद) में पर्याप्त समता होने के कारण एक का दूसरे के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है। सभी प्रकार के कमल बल्य कषाय एवं रक्तपित्तहर होते हैं। (च० सू० अ० २७) पुण्डरीक प्रायः श्वेत कमल को, कोकनद रक्तकमल को एवं इन्दीवर नील कमल को कहा गया है। विकसित होने की दृष्टि से इनके दो भेद सूर्य-विकाशी एवं चन्द्र-विकाशी मानते हैं। जो प्रातः खिलते हैं तथा शाम को संकुचित हो जाते हैं उन्हें सूर्य-विकाशी तथा जो रात को खिले रहते हैं तथा दिन को संकुचित रहते हैं उन्हें चन्द्र- विकाशी कहा जाता है। कमल सूर्य-विकाशी तथा कुमुद प्रायः चन्द्रविकाशी होते हैं।