भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पुष्पवर्गः ६४३ इसका चूर्ण मिश्री के साथ रक्तार्श, रक्तप्रदर तथा ऊर्ध्वग रक्तपित्त में देने से लाभ होता है। मात्रा-चूर्ण ५-१५ रत्ती। अथ मृणालं शालूकञ्च। तयोर्गुणानाह मृणालं शीतलं वृष्यं पित्तदाहास्रजिद् गुरु ।।१२।। दुर्जरं स्वादुपाकञ्च स्तन्यानिलकफप्रदम्। संग्राहि मधुरं रूक्षं शालूकमपि तद्गुणम् ।।१३।। मृणाल (कमल नाल)-शीतल वृष्य (वीर्यवर्धक), गुरु, कठिनता से पचने वाला, रूक्ष, विपाक में मधुर, संग्राही, मधुर रस युक्त, दुग्धवर्धक, वायु तथा कफ को उत्पन्न करने वाला एवम्-पित्त, दाह और रक्त विकार को दूर करने वाला होता है। शालूक (कमल कन्द)-यह भी गुणों में मृणाल के तुल्य ही होता है। [१२-१३] इसकी पेया बनाकर अतिसार, रक्तातिसार एवं कुपचन में दी जाती है। अर्श में चूर्ण का उपयोग करते हैं। चर्मरोगों में इसका लेप किया जाता है। मात्रा-१/२-१ तो० पेया बनाकर। अथ स्थलकमलम्। तस्य नामगुणानाह पद्मचारिण्यतिचराऽव्यथा पद्मा च शारदा। पद्माऽनुष्णा कटुस्तिक्ता कषाया कफवातजित्। मूत्रकृच्छ्राश्मशूलघ्नो श्वासकासविषापहा ।।१४।। स्थलकमल के नाम-पद्मचारिणी, अतिचरा, अव्यथा, पद्मा और शारदा ये सब हैं। स्थलकमल-किञ्चित् उष्णवीर्य, कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त एवम्-कफ, वात, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, शूल, श्वास, कास तथा विष को दूर करने वाला है। [१४] नोट-इस सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। चरक, सुश्रुत तथा वाग्भट में इसका उल्लेख नहीं है। वृंद के 'सिद्धयोग' में स्थलपद्म का प्रयोग मिलता है। इसके कल्क को दूध के साथ पिलाने से प्लीहा रोग तथा सभी प्रकार के शोथ में लाभदायक माना है। श्री कण्ठ ने इसको 'माणकम्' लिखा है। इसके कहीं चार प्रकार मानते हैं- चतुर्धा स्थलपद्मानि सेवन्ती गुलदावदी। नैपाली च गुलावश्च बकुलश्च कदम्बकः ।।१।। निम्नलिखित दो पौधों को स्थल कमल कुछ विद्वानों ने माना है। २. स्थलपद्म (१) ले०-Ionidium suffruticosum Ging. (आयोनिडिअम् सफ्रुटिकोसम्) । Fam. Violaceae (ह्रायोलेसी)। हिं०-रतनपुरुष। इसके छोटे बहुवर्षायु क्षुप बुन्देलखण्ड, आगरा, बंगाल, मद्रास, गुजरात, खानदेश तथा कर्नाटक में पाये जाते हैं। पत्ते-कुन्तल क्रम में, लगभग अवृन्त, .७-१" लम्बे और भालाकार होते हैं। पुष्प-एकाकी तथा गुलाबी रंग के आते हैं। पाँच आभ्यन्तर दलों में, एक दल लम्बे दलदण्ड (Claw) और लगभग वृत्ताकार दलोत्सर (limb) से युक्त होता है। मूल तथा पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक क्षारभ पाया जाता है।