भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६४४ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-यह शीतल, स्नेहन एवं मूत्रजनन होता है। मधुमेह में इसे लाभदायक माना जाता है। बच्चों के उदरविकार में इसकी जड़ देते हैं। उष्णताजन्य शिरःशूल एवं गरमी में दाहशान्ति के लिए भी इसका उपयोग होता है। ३. स्थलपद्म (२) ले०-Hibiscus mutabilis Linn. (हिबिस्कस् म्यूटेलिस) । Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। सं०- पद्माचारिणी। हिं०-गुलियाजैब। बं०-थलपद्म । यह बागों में लगाया मिलता है। इसका आदि स्थान चीन है। इसका वृक्ष-छोटा तथा काँटे विहीन होता है। शाखाएँ मृदुरोमश होती है। पत्ते-हृदयाकार, दन्तुर, ४ इञ्च व्यास में तथा ३ इञ्च लम्बे दण्ड से युक्त होते हैं। पुष्प-३-४ इञ्च व्यास में आते हैं जो प्रायः खिलने पर श्वेत या गुलाबी रंग के तथा शाम तक गहरे लाल रंग के हो जाते हैं। फल-गोल, चिपटे तथा रोमश होते हैं। बीज-वृक्काकार एवं खरखरे होते हैं। गुण और प्रयोग-मलाया तथा चीन में इसके पुष्पों को वक्ष तथा फुफ्फुस विकारों में प्रयोग करते हैं तथा इसे उत्तेजक मानते हैं। इसके पत्तों को शोथ पर बाँधते हैं। अथ कुमुदम् "कमोदनी" इति लोके। तस्य नामानि गुणांश्चाह श्वेतं कुवलयं प्रोक्तं कुमुदं कैरवं तथा। कुमुदं पिच्छिलं स्निग्धं मधुरं ह्लादि शीतलम् ।।१५।। कुमुद के नाम-श्वेतकुवलय, कुमुद, कैरव ये सब संस्कृत में हैं। इसे लोक में "कमोदनी" कहते हैं। कुमुद-पिच्छिल, स्निग्ध, मधुररसयुक्त, शीतल एवम् चित्त को आह्लादित (प्रसन्न) करने वाला है। [१५] अथ कुमुदिनी। तस्या नामगुणांश्चाह कुमुद्वती कैरविका तथा कुमुदिनीति च ।।१६।। सा तु मूलादिसर्वाङ्गैरुक्ता समुदिता बुधैः। पद्मिन्या ये गुणाः प्रोक्ताः कुमुदिन्याश्च ते स्मृताः ।।१७।। कुमुदिनी के नाम-कुमुद्वती, कैरविका और कुमुदिनी ये सब हैं। लक्षण-मूल, नाल, पत्रादिकों के सहित जो कुमुद है उसे "कुमुदिनी" कहते हैं। गुण-पद्मिनी के जो गुण पूर्व में कह चुके हैं। वे ही सब कुमुदिनी के भी समझने चाहिये। [१६-१७] अथ कल्हारम्। तन्नामगुणानाह सौगन्धिकं तु कल्हारं हल्लकं रक्तसन्ध्यकम्। कल्हारं शीतलं ग्राहि विष्टम्भि गुरु रूक्षणम् ।।१८।। कल्हार के नाम-सौगन्धिक, कल्हार, हल्लक और रक्तसन्ध्यक ये सब कल्हार (लालकुमुद) के पर्यायवाची शब्द हैं। कल्हार-शीतल, ग्राही, वातविष्टम्भ को उत्पन्न करने वाला, पाक में गुरु एवं रूक्ष होता है। [१८] नोट-कमल तथा कुमुद के संबंध में विशेष विवरण कमल के नोट के अन्तर्गत दिया जा चुका है। गुणों की दृष्टि से दोनों में पर्याप्त साम्यता है। जिससे एक का दूसरे के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है। कुमुद (निफिया) में वर्ण के अनुसार ४ भेद (Species) पाये जाते हैं। पीत वर्ण का भेद भी विदेशों में पाया जाता है। यहाँ श्वेत कुमुद (नि० अल्बा) का वर्णन किया गया है। अन्यों का केवल संक्षेप में भेद बतलाया गया है।