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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

६४४ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-यह शीतल, स्नेहन एवं मूत्रजनन होता है। मधुमेह में इसे लाभदायक माना जाता है। बच्चों के उदरविकार में इसकी जड़ देते हैं। उष्णताजन्य शिरःशूल एवं गरमी में दाहशान्ति के लिए भी इसका उपयोग होता है। ३. स्थलपद्म (२) ले०-Hibiscus mutabilis Linn. (हिबिस्कस् म्यूटेलिस) । Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। सं०- पद्माचारिणी। हिं०-गुलियाजैब। बं०-थलपद्म । यह बागों में लगाया मिलता है। इसका आदि स्थान चीन है। इसका वृक्ष-छोटा तथा काँटे विहीन होता है। शाखाएँ मृदुरोमश होती है। पत्ते-हृदयाकार, दन्तुर, ४ इञ्च व्यास में तथा ३ इञ्च लम्बे दण्ड से युक्त होते हैं। पुष्प-३-४ इञ्च व्यास में आते हैं जो प्रायः खिलने पर श्वेत या गुलाबी रंग के तथा शाम तक गहरे लाल रंग के हो जाते हैं। फल-गोल, चिपटे तथा रोमश होते हैं। बीज-वृक्काकार एवं खरखरे होते हैं। गुण और प्रयोग-मलाया तथा चीन में इसके पुष्पों को वक्ष तथा फुफ्फुस विकारों में प्रयोग करते हैं तथा इसे उत्तेजक मानते हैं। इसके पत्तों को शोथ पर बाँधते हैं। अथ कुमुदम् "कमोदनी" इति लोके। तस्य नामानि गुणांश्चाह श्वेतं कुवलयं प्रोक्तं कुमुदं कैरवं तथा। कुमुदं पिच्छिलं स्निग्धं मधुरं ह्लादि शीतलम् ।।१५।। कुमुद के नाम-श्वेतकुवलय, कुमुद, कैरव ये सब संस्कृत में हैं। इसे लोक में "कमोदनी" कहते हैं। कुमुद-पिच्छिल, स्निग्ध, मधुररसयुक्त, शीतल एवम् चित्त को आह्लादित (प्रसन्न) करने वाला है। [१५] अथ कुमुदिनी। तस्या नामगुणांश्चाह कुमुद्वती कैरविका तथा कुमुदिनीति च ।।१६।। सा तु मूलादिसर्वाङ्गैरुक्ता समुदिता बुधैः। पद्मिन्या ये गुणाः प्रोक्ताः कुमुदिन्याश्च ते स्मृताः ।।१७।। कुमुदिनी के नाम-कुमुद्वती, कैरविका और कुमुदिनी ये सब हैं। लक्षण-मूल, नाल, पत्रादिकों के सहित जो कुमुद है उसे "कुमुदिनी" कहते हैं। गुण-पद्मिनी के जो गुण पूर्व में कह चुके हैं। वे ही सब कुमुदिनी के भी समझने चाहिये। [१६-१७] अथ कल्हारम्। तन्नामगुणानाह सौगन्धिकं तु कल्हारं हल्लकं रक्तसन्ध्यकम्। कल्हारं शीतलं ग्राहि विष्टम्भि गुरु रूक्षणम् ।।१८।। कल्हार के नाम-सौगन्धिक, कल्हार, हल्लक और रक्तसन्ध्यक ये सब कल्हार (लालकुमुद) के पर्यायवाची शब्द हैं। कल्हार-शीतल, ग्राही, वातविष्टम्भ को उत्पन्न करने वाला, पाक में गुरु एवं रूक्ष होता है। [१८] नोट-कमल तथा कुमुद के संबंध में विशेष विवरण कमल के नोट के अन्तर्गत दिया जा चुका है। गुणों की दृष्टि से दोनों में पर्याप्त साम्यता है। जिससे एक का दूसरे के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है। कुमुद (निफिया) में वर्ण के अनुसार ४ भेद (Species) पाये जाते हैं। पीत वर्ण का भेद भी विदेशों में पाया जाता है। यहाँ श्वेत कुमुद (नि० अल्बा) का वर्णन किया गया है। अन्यों का केवल संक्षेप में भेद बतलाया गया है।

पुष्पवर्गः ६४५ ४. कुमुद हिं०-कुमुद, कमोदनी, कोई, कुईं । बं०-शालुक, सुन्दी । गु०-पोयण् । म०-कमोद । फा०-नीलूफर । अ०-अर्नबुलमा । अं०-Water lily (वाटर लिली) । ले०-Nymphaea alba Linn. (निम्फिआ अल्बा लिन.) । Fam. Nymphaeaceae (निम्फिएसी) । यह काश्मीर में जलाशयों में पाया जाता है । इसका जलीय क्षुप बहु वर्षायु होता है । इसकी जड़ें जलाशय की सतह में फैलती हैं । पत्ते-गोल, हृदयाकार, चमकीले तथा जल की सतह पर तैरते रहते हैं । पत्रनाल १० फुट तक लंबा होता है तथा पत्र फलक के मध्य में जुटा रहता है । पुष्प-श्वेत तथा २-५ इञ्च व्यास में आते हैं । बाह्यदल-४, बाहर से कुछ हरिताभ तथा अन्दर से श्वेत होते हैं । आभ्यंतर दल-करीब १० होते हैं जो अन्दर की तरफ पुंकेशर में बदल जाते हैं । फल-स्पंज सदृश होता है जो जल के अन्दर पक्व होकर फट जाता है जिसमें से बीज बाहर निकल कर जल पर तैरते हैं । बीज-छोटे, कच्चे लाल एवं पकने पर काले होते हैं । इन्हें भेंट या बेरा कहते हैं । बिहार और बंगाल में इनका लावा बनाकर उसके लड्डू बनाते हैं । उनको वहाँ रामदाने के लड्डू कहते हैं । अन्य जातियाँ- (१) Nymphaea rubra Roxb. (नि. रूब्रा) । रक्त, गुलाबी या श्वेत वर्ण के ३-८ इञ्च व्यास के पुष्प इसमें आते हैं । यह सभी स्थानों पर होता है । इसमें पुष्प केवल सुबह ही खिलते हैं । (२) N. pubescens Willd. (नि. प्यूबेसेन्स) । यह उपर्युक्त के समान ही है किन्तु इसमें पुष्प कुछ छोटे तथा पत्र अधोतल पर रोमश होते हैं । (३) N. stelleta willd. (नि. स्टेल्लेटा) । इसमें पुष्प नीले, हलके बैंगनी तथा ३-६ इञ्च व्यास में आते हैं । यह भी सभी उष्ण भागों में होता है । रासायनिक संगठन-नि. अल्बा के मूलों में निम्फीन (Nymphaeine) नामक क्षाराभ तथा अन्य कषाय द्रव्य पाये जाते हैं । इस क्षाराभ का वातनाड़ी संस्थान के ऊपर विषैला प्रभाव पड़ता है । इसके पुष्पों में हृदय पर परिणाम करने वाला निम्फैलिन (Nymphalin) नामक ग्लूकोसाइड पाया जाता है । इसमें के क्षाराभ का चूहा, मेढक, गिनी पिग तथा कबूतर के मस्तिष्क पर घातक परिणाम होता है तथा श्वसन संस्थान की विषाक्तता होकर मृत्यु होती है । पुष्प एवं कंद के क्षाराभों का अल्प मात्रा में शामक (Sedative) प्रभाव पड़ता है । गुण और प्रयोग-इसके गुणादि कमल जैसे ही होते हैं । मूल ग्राही एवं कुछ मादक होता है । पुष्प कामसादक होते हैं । इसके मूल को प्रवाहिका में देते हैं । पुष्प तथा फल का फांट अतिसार में दिया जाता है तथा इसे स्वेदजनक मानते हैं । अथ वारिपर्णी शैवालञ्च (जलकुम्भी-सिवार) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह वारिपर्णी कुम्भिका स्याद्वारिमूली खमूलिका । शैवालं जलनीली स्याच्छैवलं जलजञ्च तत् ।।१९९।। वारिपर्णी हिमा तिक्ता लघ्वी स्वाद्धी सरा कटुः । दोषत्रयहरी रूक्षा शोणितज्वरशोषकृत् ।।२००।। शैवालं तुवरं तिक्तं मधुरं शीतलं लघु । स्निग्धं दाहतृषापित्तरक्तज्वरहरं परम् ।।२०१।।

६४६ भावप्रकाशनिघण्टुः **वारिपर्णी (जलकुम्भी) के नाम-**वारिपर्णी, कुम्भिका, वारिमूली, खमूलिका ये सब हैं। **जलकुम्भी-**शीतल, तिक्त तथा कटुरसयुक्त, स्वादिष्ट, पाक में लघु, दस्तावर, रूक्ष, त्रिदोषनाशक एवम्-रक्तविकार, ज्वर तथा शोष को उत्पन्न करने वाली है। **शैवाल (सेवार) के नाम-**शैवाल, जलनीली, शैवल और जलज ये सब हैं। **सेवार-**कषाय, तिक्त तथा मधुर रस युक्त, शीतल, लघु, स्निग्ध और दाह, तृषा, पित्त, रक्तविकार और ज्वर को अत्यन्त दूर करने वाला होता है। [१९-२१] **नोट-**मूल पाठ में श्री लाला शालिग्राम जी की टीका में इस प्रकार भेद है। "वारिपर्णी कुम्भिका स्याच्छैवालं शैवलञ्च तत्। वारिपर्णी हिमा तिक्ताज्वरहरं परम्।।" इससे ऐसा मालूम होता है कि कुम्भिका तथा शैवाल पर्यायवाची नाम हैं किन्तु आगे दोनों के गुण अलग-अलग दिये होने से यह संदेह दूर हो जाता है तथा उपर्युक्त पाठभेद गलत मालूम होता है। कुम्भिका तथा शैवाल, दो भिन्न द्रव्य हैं। अमरकोश में भी 'वारिपर्णी तु कुम्भिका' तथा 'जलनीली तु शैवालं शैवलः' दिया हुआ है। वारिपर्णी (कुम्भिका) के गुणों में 'शोणित ज्वर शोषकृत्' के स्थान पर हत् होना चाहिये। सभी टीकाकारों ने गुणों में लिखा है कि यह रक्तविकार, ज्वर तथा शोष में लाभदायक है। कुम्भिका से जलकुम्भी नामक द्रव्य लिया गया है। अन्य कुछ द्रव्यों के लिये भी यह नाम आता है। जलकुम्भी नाम चरक, सुश्रुत, रा० नि० तथा ध० नि० में नहीं मिलता। अधिकांश विद्वानों ने पिस्टिया स्ट्रेटिओटीस लिन. (Pistia stratiotes Linn.) को जलकुम्भी माना है। एक अन्य बड़ी जलकुम्भी भी पाई जाती है जो इचोर्निया क्रेसिपीस (Eichhornia crassipes Solms) है। यह विदेशी पौधा है जो संभवतः सौन्दर्य की दृष्टि से बागों आदि में लगाया जाने लगा है। इनका अलग-अलग वर्णन किया गया है। शैवाल के संबंध में जलकुम्भी के वर्णन के पश्चात् विवेचन किया गया है। ५. जलकुम्भी (वारिपर्णी) (१) **हिं०-**कुम्भी, जलकुम्भी। **बं०-**टोका पाना। **म०-**प्रश्नी, गोंडाल, शेर्र्बल। **गु०-**जल शंखलां। ता०- आकाश तामरै। **अं०-**The wester-Lettuce (दी वेस्टेर लेट्यूस)। ले०-Pistia stratiotes Linn. (पिस्टिया स्ट्रेटिओटीस)। Fam. Araceae (एरेसी)। यह समस्त भारत में, तालाबों तथा गढ़ों में जहाँ जल जमा रहता है, पायी जाती है। इसके **क्षुप-**जलाशयों के ऊपर तैरते रहते हैं। देखने में छोटी गोभी जैसे दिखलाई देते हैं। **पत्ते-**विनाल, मांसल, १-३" लम्बे, अभिलट्वाकार, चक्राकार गुच्छों में आते हैं। **पुष्पव्यूह-**पीले या श्वेत पत्रावरण से आवृत होता है। **मूल-**मूल से डोरे-डोरे जैसे कई उपमूल निकले रहते हैं। इसके पंचांग, पत्ते, मूल तथा इसकी राख का उपयोग किया जाता है। **रासायनिक संगठन-**इसमें ३१% राख होती है जिसमें से जल में घुलनशील क्षार ६% होते हैं। क्षार में पोटेशियम् क्लोराइड ७३% तथा पोटेशियम सल्फेट २२% होता है। **गुण और प्रयोग-**यह शीतल, मूत्रजनन, आनुलोमिक एवं कास शामक है। इसकी गंध से खटमल मरते हैं। इसका प्रयोग मूत्रकृच्छ्र, अर्श, गलगण्ड एवं चर्म रोग में किया जाता है। (१) मूत्रकृच्छ्र में इसके पत्तों का क्वाथ पिलाते हैं तथा पीसकर पेड़ू पर बाँधते हैं। (२) अर्श पर पत्तों को पीस गरम कर बाँधते हैं। (३) सर की दाद पर इसकी राख लगाते हैं। चर्मरोगों में इसके स्वरस से बना गरी का तेल लगाते हैं।

पुष्पवर्गः ६४७ (४) भस्म गोमूत्र के साथ गलगंड में देते हैं।¹ मात्रा-स्वरस १-२ तोला; चूर्ण २-८ माशा। ६. जलकुम्भी (२) हिं०-बड़ी जलकुम्भी। बं०-कचूरीपान। मल०-कोलावझा। ता०-आकाशथामरै। ते०-पिशाचिथामर। ले०-Eichhornia crassipes Solms (इचोर्निया क्रेसिपीस)। Fam. Pontederiaceae (पोटेडेरियेसी)। यह सुन्दर विदेशी पौधा भारत में समस्त जलाशयों में पाया जाता है। इसका क्षुप-बहुवर्षायु तथा जल में तैरने वाला होता है। इसकी जड़ें-लम्बी तथा रेशेदार, रोएँदार होती हैं जो छिछले जल में कीचड़ में जम जाती हैं। पत्ते-चक्राकार गुच्छों में, चम्मच के आकार के गोल, चौड़े २-८" व्यास में आते हैं जिनका नाल-पुंगी की तरह बहुत फूला हुआ होता है जिससे यह जल पर तैरता है। पुष्प-सुन्दर, नीलाभ बैंगनी रंग के, १-१.५ इञ्च लम्बे, निवापसम (Funnel-shaped), ६-१० इञ्च लम्बे पुष्पद्ण्ड पर आते हैं। बहुत बीज वाले फल Capsule आते हैं। रासायनिक संगठन-इसके ताजे पत्तों में कैरोटीन पाया जाता हैं। इसमें पोटैशियम की काफी मात्रा होने से खाद के लिये इसका उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसके पुष्प घोड़ों के चर्मरोगों में उपयोगी माने जाते हैं। ७. सेवार (१) शैवाल-जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि शैवाल तथा कुम्भिका एक द्रव्य नहीं है बरन् दो भिन्न द्रव्य हैं। हिन्दी का सेवार शब्द शैवाल से ही बना अपभ्रंश मालूम पड़ता है। व्युत्पत्ति की दृष्टि से शैवाल शब्द का अर्थ है कि जो जल में होता हो। चरक सुश्रुतादि में शैवाल का उल्लेख है। विसर्प के लेपों में इसका अधिक उल्लेख है। ध० नि० में इसके पर्यायों में जलमुस्त शब्द आया है जिससे ऐसा मालूम होता है कि इसमें मोथे की तरह नीचे मूल का कुछ स्वरूप हो। अपने यहाँ नदियों आदि में एक पौध पाया जाता है जो सिरैटोफाइलम् डिमर्सम (Ceratophyllum demersum Linn.) है। यह सिरैटोफाइलेसी (Ceratophyllaceae) वर्ग का पौधा है जो वनस्पतियों के उस विभाग के अन्तर्गत आता है जिनमें पुष्प बीजादि वाली वनस्पतियाँ आती हैं। यह ॲल्गी (Algae) विभाग का नहीं है जिनमें काण्ड, पत्र तथा मूल जैसे अलग-अलग अंगों की उत्पत्ति नहीं हुआ करती। समुद्र में पाई जाने वाली कुछ ॲल्गी ऐसी होती हैं जिनको सेवार कहा जा सकता है। नदियों में पाया जाने वाला एक अन्य क्षुप वेलिसनेरिया स्पाइरेलिस् (Vellisneria spiralis Linn.) है जिसे कुछ ने सेवाल लिखा है। नदियों में एक सेवार पाई जाती है जिसे गरमी के दिनों में लोग भैंसों आदि को खिलाते हैं। इसमें नीचे मोथे की तरह राइजोम पाये जाते हैं। ध० नि० मे लिखा जलमुस्त पर्याय संभवतः इसके लिये अभिप्रेत हो। इससे जल का स्वरूप नीला सा होने से जलनीली पर्याय भी इसके लिये ठीक मालूम पड़ता है। इस सेवार का वनस्पति शास्त्र की दृष्टि से विनिश्चय अभी तक नहीं किया जा सका है। यहाँ पर प्रथम दो का वर्णन किया जा रहा है जिन्हें अधिकांश विद्वानों ने सेवार लिखा है। १. जलकुम्भीकजं भस्म पक्वं गोमूत्र गालितम्। पिबेत्कोद्रवतक्राशी गलगण्डोपशान्तये ॥ (वृन्द)

६४८ भावप्रकाशनिघण्टुः हिं०- सिवार, सेवार। बं०- शेओयाला। म०- शेवाल, शेवाले। गु०- शेवाल। फा०- चश्मवजग। अ०- तुलहब। ले०- Ceratophyllum demersum Linn. (सिरैटोफाइलम् डिमर्सम्)। Fam. Ceratophyllaceae (सिरैटोफाइलेसी)। यह सभी जगह पाया जाता है। इसके जलीय क्षुप- ८ से ३६ इञ्च लम्बे होते हैं जिनकी शाखाएँ तथा पत्तियाँ पानी से बाहर निकालने पर आपस में गुँथकर जाल सा बन जाती हैं। पत्ते- करीब १ इञ्च लम्बे होते हैं जिनके खण्ड जल में फैले रहते हैं। इनकी मोटाई तथा पत्र दन्त में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। पुष्प- छोटे तथा पुं पुष्प एवं स्त्री पुष्प भिन्न दण्डों पर आते हैं। इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन- इसके रोओं में माइरोफाइलिन (Myrophyllin) पाया जाता है। गुण और प्रयोग- यह शीतवीर्य तथा ज्वरहर है। पैत्तिक विकार, रक्तपित्त आदि में इसका प्रयोग करते हैं। मात्रा- स्वरस १-२ तोला।

८. सिवार (२)

हिं०- सेवार। म०- शेवाल। गु०- जलसपौलियन। ते०- पुनत्सू। ले०- Vellisneria spiralis Linn. (वेलिसनेरिया स्पाइरेलिसलिन)। Fam. Hydrocharitaceae (हाइड्रोचेरिटेसी)। यह समस्त भारत में होता है। इसके क्षुप- जल में डूबे हुए, काण्डहीन तथा आपस में गुँथे हुये होते हैं। पत्ते- रेखाकार, बहुत लम्बे तथा पारभासक होते हैं। पुष्प- पुं. पुष्प छोटे पत्रावृत व्यूह में होते हैं और बहुत छोटे तथा संख्या में बहुत होते हैं। परिपक्व होने पर वे व्यूह से अलग होकर जल के ऊपर आ जाते हैं तथा खिल जाते हैं। स्त्री पुष्प, लम्बे कुण्डलित वृन्त से युक्त होते हैं तथा परिपक्व होने पर कुण्डल खुलकर वे ऊपर आ जाते हैं तथा परिषेचन होने पर फिर वृन्त का कुण्डल होकर नीचे चले जाते हैं। गुण और प्रयोग- यह दीपन तथा शोथघ्न है। इसका प्रयोग श्वेतप्रदर में करते हैं। फोड़े पर इसको बाँधने से जलन कम होती है तथा जल्दी फूट जाता है।

अथ शतपत्री (गुलाब)। तस्या नामानि गुणांश्चाह

शतपत्री तरुण्याक्ता कर्णिका चारुकेशरा। महाकुमारी गन्धाढ्या लाक्षापुष्प्याऽतिमञ्जुला ।। २२।। शतपत्री हिमा हृद्या ग्राहिणी$^१$ शुक्रला लघुः। दोषत्रयास्रजिद्वर्ण्या कट्वी तिक्ता च पाचनी ।। २३।। शतपत्री (गुलाब) के संस्कृत नाम- शतपत्री, तरुणी, कर्णिका, चारुकेशरा, महाकुमारी, गन्धाढ्या, लाक्षापुष्पा और अतिमञ्जुला ये सब हैं। शतपत्री- शीतल, हृदय को हितकर, संग्राही, शुक्रजनक, लघु, त्रिदोष तथा रक्तविकार को दूर करनेवाली, शरीर के वर्ण को उत्तम बनाने वाली, कटु तथा तिक्त रसयुक्त और पाचक होती है। [२२-२३]

९. गुलाब

नोट- गुलाब का फूल सुप्रसिद्ध है। चिकित्सा के अतिरिक्त सुगंध के लिए इसका बहुत उपयोग होता है। कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह विदेशी पौधा है। चरक सिद्धिस्थान अध्याय १० में स्वर्णयूथिका, प्रियंगु, रक्तमूली इत्यादि सांग्राहिक द्रव्यों के साथ तरुणी का भी उल्लेख है। भा० प्र० भी इसे ग्राही लिखते हैं। गुलकंद का उपयोग मृदुसारक द्रव्य के रूप में प्रत्यक्ष सिद्ध है। इसलिए तरुणी शब्द गुलाब के लिए ही है अथवा अन्य किसी भिन्न द्रव्य के लिये है यह संदेह होता है। शतपत्री शब्द भी कई अर्थों में आता है। १. 'वृष्या इति पाठ०। २. 'सरा च' इति पाठ०।

पुष्पवर्गः ६४९ गुलाब की कई जातियाँ तथा उनके भेद पाये जाते हैं। उत्तर-पश्चिम हिमालय तथा काश्मीर में पहाड़ों पर यह वन्य अवस्था में भी पाया जाता है। अधिकतर यह बागों में लगाया हुआ मिलता है। फूलों के वर्ण-भेद से, सुगंधभेद से, काँटों की उपस्थिति या अभाव की दृष्टि से इसके अनेक भेद पाये जाते हैं। करीब एक लाख पुष्पों से १ तोला इत्र प्राप्त होता है जिसका सुगन्ध के लिए उपयोग होता है। हिं०, म०, गु०-गुलाब। बं०-गोलाप। ता०-इराशा, गोलप्पु। क०-गुलबि। ते०-गुलाबीपुवु। फा०- गुले सुर्ख, गुल, गुले गुलाब। अ०-बर्द, बर्दे अहमर। अं०-Rose (रोज)। ले०-Rosa centifolia Linn. (रोजा सेण्टिफोलियालिन)। Fam. Rosaceae (रोजेसी)। यह सभी जगह बागों में लगाया हुआ मिलता है। इसका क्षुप-५-७ फीट ऊँचा होता है। शाखाएँ-काँटो से युक्त होती हैं तथा काँटे असमान, बड़े एवं टेढ़े होते हैं। काँटों के अतिरिक्त इन पर चिपचिपे रोएँ भी होते हैं। पत्ते-संयुक्त तथा पत्रक संख्या में प्रायः ५ तथा मृदुरोमश होते हैं। पत्रदण्ड पर काँटे नहीं होते। पुष्प-प्रायः गुलाबी, बड़े, सुगंधयुक्त तथा लम्बे दंड पर हिलते रहते हैं। बाह्यदल स्थायी तथा अन्तर्दल अंदर मुड़े हुये होते हैं। सेवती गुलाब-(Rosa alba-रोजा ॲल्बा) नामक एक विशेष भेद होता है जिसमें पुष्प श्वेत होते हैं। चिकित्सा के लिए वसंत ऋतु में उत्पन्न पुष्पों की छाया में सुखाई हुई कलिकाओं का उपयोग करना चाहिये। इसके केशर इत्यादि भागों को निकाल कर केवल पंखड़ियों का उपयोग गुलकंद बनाने में किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल, टैनिक अम्ल, मैलिक अम्ल तथा कुछ राल आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-गुलाब शीतवीर्य, मृदुसारक, पाचन, त्रिदोषघ्न, पौष्टिक, हृद्य एवं वर्ण्य है। इससे शौच साफ होकर भूख बढ़ती है तथा शरीर पुष्ट होता है। ग्रीष्म ऋतु में स्त्रियों तथा बच्चों को गुलकंद खिलाया जाता है। गुलकंद तथा गुलाबजल का अनुपान के लिए उपयोग करते हैं। नेत्रबिन्दु में गुलाबजल का उपयोग किया जाता है। मुख व्रण में इसका स्थानिक प्रयोग हितकर है। शोथ में इसका लेप किया जाता है तथा व्रण पर इसका चूर्ण डालते हैं। इसके चूर्ण को शरीर पर मलने से स्वेदाधिक्य कम हो कर दुर्गंध दूर होती है। सेवती गुलाब का प्रयोग ज्वर में शीतलता लाने के लिए करते हैं। इससे हृदय की धड़कन भी कम होती है। मात्रा-गुलकंद से १ से २ तोला; चूर्ण १ से ३ माशा; अर्क २ से ४ तोला। अथ वासन्ती (नेवारी)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह नेपाली कथिता तज्ज्ञैः सप्तला नवमालिका। वासन्ती शीतला लघ्वी तिक्ता दोषत्रयास्रजित् ।। २४ ।। वासन्ती (नेवारी) के संस्कृत नाम-नेपाली, सप्तला, नवमालिका और वासन्ती ये सब हैं। वासन्ती- तिक्तरसयुक्त, शीतल, लघु एवम् त्रिदोष तथा रक्तविकार को दूर करने वाली है। [२४] नोट-नेवारी को कुछ विद्वानों ने जस्मिनम् आबेरिसेन्स माना है तथा कुछ ने आइकजोरा आबोरिया (Ixora arborea Roxb.) माना है। 'वासन्ती' नाम इसके वसन्त ऋतु में पुष्पित होने का द्योतक मालूम पड़ता है। 'नेपाली' पर्याय, इसका नेपाल देश से कुछ संबंध बतलाता है। या नेपाली के स्थान पर नेवाली शब्द हो सकता है जिसका अपभ्रंश नेवारी हो गया होगा।

६५० भावप्रकाशनिघण्टुः चमेली, बेला, जूही इत्यादि के साथ ही इसका वर्णन होने से इसके जस्मिन् जाति के ही होने की अधिक सम्भावना है। ज. आबोरेसेन्स को कुछ ने कुन्द माना है। कुन्द का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है। यहाँ नेवारी (ज. आबोरेसेन्स) का वर्णन किया जा रहा है। निघंटुओं द्वारा वर्णित इन सुगंधयुक्त विभिन्न वनस्पतियों के पर्यायों में पर्याप्त मतभिन्नता पाई जाती है। १०. नेवारी हिं०-नेवारी, वासन्ती, चमेली। बं०-बुराकुन्दा, नवमल्लिका। मु०-कुसर। ता०-नागमल्ली। ते०- नागमल्ले। ले०-Jasminum arborescens Roxb. (जस्मिन्म् आर्बोरेसेन्स्) । Fam. Oleaceae (ओलिएसी) । यह हिमालय में ४००० फीट की ऊँचाई तक तथा बंगाल, छोटा नागपुर, उड़ीसा, मध्य तथा दक्षिण भारत एवं गंजम् और बिजगापट्टम् के पहाड़ों पर होता है। यह झाड़ीदार वृक्ष होता है। शाखाएँ-रोमश होती हैं। पत्ते-साधारण, विपरीत, ५-७.५ से० मी० लम्बे, अण्डाकार या अण्डाकार-आयताकार, लम्बाग्र तथा १-२ से० मी० लम्बे पत्रनाल से युक्त होते हैं। पुष्प-अत्यन्त सुगन्धित, सफेद रंग के, २.५-३.३ से० मी० व्यास में एवं मृदुरोमश होते हैं। इनके खण्ड नलिका से बड़े या बराबर होते हैं। अन्तर्दल नलिका १-१.३ से० मी० तथा खण्ड ९-१२ रहते हैं। स्त्री केशर (Carpel) १, आयताकार या अण्डाकार, १.३ से० मी० लम्बा एवं काला होता है। रासायनिक संगठन-पुष्पों में एक उड़नशील तैल होता है। गुण और प्रयोग-इसके पत्ते तिक्त, कषाय, बल्य तथा दीपन होते हैं। इसके फल बल्य माने जाते हैं। श्वसनिकाओं में कफ जमा होने पर इसके पत्तों का स्वरस, मरिच, लहसुन तथा अन्य उत्तेजक औषधियों के साथ वामक औषध के रूप में देते हैं। संथाल लोग इसका प्रयोग मासिक विकारों में करते हैं। इसकी जड़ सर्पविष में लाभदायक मानी गई है। अथ वार्षिकी (बेला)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह श्रीपदी षट्पदानन्दा वार्षिकी मुक्तबन्धना ॥२५॥ वार्षिकी शीतला लघ्वी तिक्ता दोषत्रयापहा। कर्णाक्षिमुखरोगघ्नी तत्तैलं तद्गुणं स्मृतम् ।।२६।। वार्षिकी (बेला) के संस्कृत नाम-श्रीपदी, षट्पदानन्दा, वार्षिकी और मुक्तबन्धना ये सब हैं। वार्षिकी (बेला)- शीतल, लघु, तिक्तरसयुक्त एवम्-त्रिदोष, कान, नेत्र, मुख-सम्बन्धी समस्त रोग को दूर करने वाली होती है। तथा इसके तेल के भी ये ही सब गुण हैं। [२५-२६] ११. बेला हिं०-मोगरा, मोतिया, बेला। म०-मोगरा। ग०-डोलर, मोगरो। क०-मल्लिगे। ता०-अडुक्कु मल्लि । बं०-मोतिया। ले०-Jasminum sambac Ait. (जस्मिन्म् सम्बॅक्) । Fam. Oleaceae (ओलिएसी) । यह भारत में सभी स्थानों पर बागों में लगाया मिलता है। अन्य उष्ण प्रदेशों में भी यह होता है। इसका झाड़ीदार गुल्म होता है। नवीन शाखाएँ मृदुरोमश होती हैं। पत्ते-पतले, विपरीत, ३.८-११.५ × २.२- ६.३ से० मी०, विभिन्न आकार के, प्रायः अंडाकार, चिकने तथा ४-६ जोड़ी बगल की स्पष्ट शिराओं से युक्त होते हैं। पत्रनाल ३-६ मि० मि० लम्बा तथा रोमश, होता है। पुष्प-अत्यन्त सुगन्धित, श्वेत एकाकी अथवा ३ एक साथ रहते

हैं। बाह्यदल १.३ से ० मी० लम्बा, रोमश एवं ६-१० मि०मि० लम्बे ५-९ विभागों में रहता है। अन्तर्दल नलिका १-३ से० मी० तथा उसके खण्ड नलिका के बराबर होते हैं। स्त्री केशर परिपक्व होने पर ६ मि० मि०, गोल, काला तथा बाह्यदल से घिरा रहता है। बागवानी में इसके अनेक प्रकार पाये जाते हैं। जिनमें चार मुख्य हैं। (१) मोतिया बेला—इसमें पुष्प द्विगुण एवं गोल अन्तर्दल युक्त तथा कली गोल रहती है। (२) बेला—इसमें भी द्विगुण अन्तर्दल कुछ लम्बे रहते हैं। (३) हजारा बेला—इसमें पुष्प के अन्तर्दल द्विगुण नहीं रहते हैं। (४) मोगरा—अन्तर्दल बहु चक्रों में, गोल तथा कलिका १ इञ्च व्यास में रहती है। अन्य निघण्टुओं ने जो विभिन्न भेद वार्षिकी, ग्रैष्मी, अतिमुक्ता, मल्लिका लिखे हैं वे सब इसी ज० सम्बॅक् के ही भेद हैं। वार्षिकी में वर्षाकाल में पुष्प आते हैं। ग्रैष्मी में ग्रीष्म ऋतु में फूल आते हैं। जिसमें फूल छोटे-छोटे होते हैं उसे अतिमुक्ता कहा गया है। भावप्रकाशकार गुण की दृष्टि से मल्लिका को उष्ण वीर्य लिखते हैं और वार्षिकी को शीतवीर्य। अतिमुक्ता यह पर्याय भावप्रकाशकार माधवी के लिये लिखते हैं जो दूसरी लता होती है। इसके पत्र, पुष्प तथा मूल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसके पुष्पों में एक सुगंधित उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—यह त्रिदोषघ्न, शोथघ्न, व्रणरोपक, स्तन्यनाशन एवं गर्भाशयोत्तेजक है। (१) प्रसूता को स्तनशोथ होने पर इसके पुष्पों को पीसकर बाँधते हैं जिससे दुग्ध स्राव बन्द होकर शोथ कम होता है। (२) इसकी ३ माशे जड़ का क्वाथ अनार्तव तथा अनियमितार्तव में देते हैं। (३) रक्तप्रवाहिका में इसकी ३-४ पत्तियों को जल में पीस, छान, मिश्री मिलाकर २-३ बार में देते हैं। (४) पुराने व्रणों पर इसकी पत्तियों का लेप किया जाता है। अथ मालती स्वर्णजाती च (जाई–पीलीजाई)। तयोर्नामानि गुणाँश्चाह जातिर्जाती च सुमना मालती राजपुत्रिका। चेतिका हृद्यगन्धा च सा पीता स्वर्णजातिका ।।२७।। जातीयुगं तिक्तमुष्णं तुवरं लघु दोषजित्। शिरोऽक्षिमुखदन्तार्त्तिविषकुष्ठानिलास्त्रजित् ।।२८।। जाई-पीलीजाई के संस्कृत नाम—जाति, जाती, सुमना, मालती, राजपुत्रिका, चेतिका और हृद्यगन्धा ये सब “जाई” के नाम हैं, यदि पीली जाई हो तो उसे “स्वर्णजातिका” कहते हैं। दोनों जाती (जाई-पीलीजाई) तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, उष्ण, लघु, दोषनाशक एवम्-शिर, आँख, मुख और दाँतों के रोगों को दूर करने वाली तथा विष, कुष्ठ, वायु और रक्तविकार को नष्ट करने वाली होती हैं। [२७-२८] १२. चमेली हिं०—चमेली, चम्बेली, चंबेली। बं०—चमेली, जाति। गु०—चंबेली। म०—चमेली। ता०—पिचि। ते०— जाति। अ०—यासमीन, यास मून। फा०—यास मन। अं०—Spanish Jasmine (स्पैनिश जस्मिन)। ले०— Jasminum grandiflorum Linn. (जस्मिनम् ग्रैण्डिफ्लोरम्)। Fam. Oleaceae (ओलिएसी)। यह भारत में सभी स्थानों पर बागों में लगाया मिलता है। इसका आदि स्थान उत्तर पश्चिम हिमालय मानते हैं। उत्तर प्रदेश में इसकी विस्तृत पैमाने पर खेती की जाती है।

६५२ भावप्रकाशनिघण्टुः इसके गुल्म-बड़े, आरोही तथा फैलने वाले होते हैं। शाखाएँ-धारीदार होती हैं। पत्ते-विपरीत, संयुक्त तथा २-५ इञ्च लम्बे होते हैं। पत्रक संख्या में ७-११, अंतिम अग्र का पत्रक बड़ा तथा बगल के पत्रक विनाल तथा अग्र के जोड़े का आधार मिला हुआ रहता है। पुष्प-सुगंधित सफेद, बाहर से कुछ गुलाबी तथा १।। इञ्च तक व्यास में रहते हैं। जाती का स्वर्णजाती भेद लिखा हुआ है जिसमें पीले रंग के पुष्प आते हैं। उपर्युक्त जाति (Species) में पीला फूल नहीं पाया जाता । किन्तु जस्मिन् की एक अन्य जाति, ज० ह्यूमाइल (J. humile) होती है जिसमें पीले सुगंधित फूल आते हैं। संभवतः यही स्वर्ण जाती हो। कर्पूरादि वर्ग में गन्धमालती नामक एक द्रव्य का वर्णन आया है। वहाँ पर एक लता ऑर्गनोज़्मा कॅरियोफाइलॅटा का वर्णन (पृ० २६१) आया है जिसे भी मालती कहते हैं। इसमें पुष्प सफेद आते हैं किन्तु यह ॲपोसाइनेसी (Apocynaceae) वर्ग की लता है। चमेली के पुष्प तथा पत्तों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पुष्पों में उड़नशील तैल तथा पत्तों में एक क्षाराभ एवं सेलिसिलिक अम्ल होता है। गुण और प्रयोग-यह शीत तिक्त व्रणरोपह, व्रणशोधन एवं कुष्ठघ्न है। (१) त्वचा के विकारों में इसके पत्तों का बाह्य प्रयोग किया जाता है। मुखपाक तथा दंतपीड़ा में पत्ते चबाने को देते हैं। पूतिकर्ण में पत्तों से बनाया तेल कान में डालते हैं। अंगुलियों के बीच का भाग सड़ने पर पत्तों को पीसकर लेप करते हैं। कॉर्न (Corn) पर ताजा रस लगाते हैं। (२) पुष्पों का लेप नेत्ररोग, विस्फोट, शिरःशूल आदि में करते हैं। इससे बना तेल शिरःशूल तथा ठंडक के लिए लगाया जाता है। अथ यूथिका पीतयूथिका च (जूही-सुवर्णजूही) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह यूथिका गणिकाऽम्बष्ठा सा पीता हेमपुष्पिका । यूथीयुगं हिमं तिक्तं कटुपाकरसं लघु ।। २९ ।। मधुरं तुवरं हृद्यं पित्तघ्नं कफवातलम् । व्रणास्रमुखदन्ताक्षिशिरोरोगविषापहम् ।। ३० ।। जूही तथा सुवर्ण जूही के संस्कृत नाम-यूथिका, गणिका, अम्बष्ठा ये नाम जूही के हैं, यदि पीली जूही हो तो उसे "हेमपुष्पिका" कहते हैं। दोनों जूही-शीतल, तिक्त-मधुर तथा कषाय रस युक्त, एवम् पाक में तथा आस्वाद में कटुरसयुक्त, लघु, हृदय को हितकर, पित्तनाशक, कफ तथा वात जनक और व्रण, रक्तविकार, मुख-दाँत-नेत्र- शिरसम्बन्धी समस्त रोग तथा विष विकार को दूर करने वाली हैं। [२९-२०] १३. जूही हिं० - जूही । क० - कदर मल्लिगे । ते० - मागधी । ता० - उसिमल्लिगै । ले० - Jasminum auriculatum Vahl. (जस्‌मिनम् ऑरीक्युलेटम्) । Fam. Oleaceae (ओलिएसी) । यह दक्षिण, कर्नाटक तथा पश्चिमाँ प्रायद्वीप में होती है। भारत के सभी स्थानों पर इसकी खेती होती है। उत्तर प्रदेश में तो व्यापारिक दृष्टिकोण से इसकी खेती करते हैं। इसका गुल्म-मृदुरोमश, लता के समान आरोहणशील या फैला हुआ रहता है। पत्ते-प्रायः साधारण, कभी- कभी त्रिपत्रक जिसमें दो नीचे के पत्रक बहुत छोटे या कभी-कभी अनुपस्थित, बीच का पत्रक २-३.२ × १-१.५ से० CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

[Header] पुष्पवर्गः ६५३

मी०, चौड़ाई लिए हुए अंडाकार या गोल, मृदुरोमश या चिकना होता है। पुष्प—श्वेत, सुगंधि गुच्छों में आते हैं। बाह्यदल नलिका ४ मि० मि० लम्बी तथा दन्तुर एवं अन्तर्दल नलिका १३ मि० मि० लम्बी तथा उसके खण्ड ५-८ एवं ६ मि० मि० लम्बे होते हैं। यद्यपि पीतयूथिका का वर्णन भा० प्र० ने किया है तथापि, उपर्युक्त जाति में पीले फूल नहीं होते किन्तु हेटेरोफाइलम् (J. heterophyllum) नामक जाति में पीले सुगंधित फल होते हैं। डॉ० देसाई ने उपर्युक्त जाति (ज. ऑरीक्युलेटम्) का वर्णन जाई के अन्तर्गत किया है। इसके पत्ते तथा फूलों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें सुगंधित्तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके गुण चमेली की ही तरह हैं। यह भी शीतवीर्य, व्रणरोपण एवं व्रणशोधन है। (१) मुखपाक में पत्तों को चबाने को देते हैं या त्रिफला दारुहलदी के साथ इसके पत्तों के कषाय से कुल्ला कराते हैं। अंगुलियों के बीच के स्थान सड़ जाने पर पत्तों का लेप उपयोगी है। व्रण पर पत्तों को पीसकर बाँधते हैं। (२) कर्ण विकारों में इसके पत्तों से पकाया तिल का तेल कान में डालते हैं। (३) पुष्पों को क्षय में दिया जाता है। अथ चम्पकः (चम्पा) । तस्य नामगुणानाह चाम्पेयश्चम्पकः प्रोक्तो हेमपुष्पश्च स स्मृतः। एतस्य कलिका गन्धफलेति कथिता बुधैः ।।३१।। चम्पकः कटुकस्तिक्तः कषायो मधुरो हिमः। विषक्रिमिहरः कृच्छ्रकफवातास्रपित्तजित् ।।३२।। १४. चम्पा हिं०—चम्पा। बं०—चांपा, चाम्पा। म०—सोन चांफा, पिंवला चांफा। गु०—राय चम्पो, पीलो चम्पो। क०— संपगे। ते०—सम्पङ्गी। ता०—शंपंगि। ले०—Michelia champaca Linn. (माइकेलिया चम्पक)। Fam. Magnoliaceae (मॅग्नोलिएसी)। चम्पा के वृक्ष प्रायः वाटिकाओं में रोपण किये जाते हैं किन्तु पूर्वी हिमालय में ३००० फीट तक तथा आसाम, प० घाट एवं दक्षिण भारत में यह अन्य अवस्था में भी पाया जाता है। इसका वृक्ष—छोटा करीब २० फीट ऊँचा होता है और बारहो मास हरा-भरा रहता है। पत्ते—८-१० इञ्च लम्बे, २।। से ४ इंच तक चौड़े, नोकीले, चिकने और चमकीले होते हैं। फूल—२ इञ्च के घेरे में घंटाकार फीके पीले या नारङ्गी रंग के सुगन्धित होते हैं। फल—लम्बे, १-४ धूसर बीजों से युक्त होते हैं। नोट—चंपक के अन्य प्रकारों का भी उल्लेख मिलता है जैसे क्षीर चंपक, नागचंपक (नागकेसर), नीलचंपक (हरा चंपा) एवं भूचंपक आदि जो विभिन्न वनस्पतियाँ हैं। इसके पंचांग, विशेष रूप से डाल तथा पुष्पों का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसके पुष्प तथा छाल में उड़नशील तैल होता है। छाल का क्वाथ करने से यह तेल उड़ जाता है। इसलिये इसका फाण्ट या चूर्ण बनाकर प्रयोग करना चाहिये। गुण और प्रयोग—इसकी छाल—ज्वरहर, मूत्रल, कफहर, दीपन एवं तिक्त पौष्टिक है। पुष्प—उत्तेजक, उद्वेष्टन निरोधी, चक्षुष्य, दाहशामक, मूत्रल, कुष्ठ, कण्डू, व्रणहर एवं दीपन है। जड़ की छाल—विरेचन, आर्तवजनन एवं शोथहर है।

६५४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका प्रयोग ज्वर, चर्मरोग, उपदंश, शोथ तथा आर्तव विकारों में करते हैं । (१) विषम ज्वर में इसका फांट पिलाते हैं । (२) उपदंश की द्वितीयावस्था में त्वचा के विकार या सन्धि में विकृति होने पर इसकी छाल का प्रयोग करते हैं । (३) मूल की छाल अनार्तव में दी जाती है । व्रणशोथ पर इसे दही में पीसकर लगाते हैं । (४) सोजाक में पुष्पों का फांट पिलाने से जलन कम होती है । (५) तिल के तेल में पुष्पों को पीसकर शिरःशूल, अक्षि पीड़ा, चक्कर आदि में सर पर बाँधते हैं । (७) पत्तों का रस शहद के साथ उदरशूल में देते हैं । मात्रा-त्वक् चूर्ण ५-१५ रत्ती । अथ बकुलः ("मौलसिरी" इति लोके) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह बकुलो मधुगन्धश्च सिंहकेसरकस्तथा । बकुलस्तुवरोऽनुष्णः कटुपाकरसो गुरुः ।। कफपित्तविषश्वित्रकृमिदन्तरुदापहः ॥३३॥ मौलसिरी के संस्कृत नाम-बकुल, मधुगन्ध, सिंहकेसरक ये सब हैं । मौलसिरी-कषायरसयुक्त, किञ्चित् उष्ण, पाक तथा रस में कटु, गुरु, एवम्-कफ, पित्त, विष, श्वेतकुष्ठ कृमि एवं दाँतों के रोगों को दूर करने वाला है। [३३] अथ बृहद्बकुलः (बड़ी मौलसिरी) । तस्य नामगुणानाह शिवमल्ली पाशुपत एकाष्ठीलो वको वसुः ।।३४।। वकोऽनुष्णः कटुस्तिक्तः कफपित्तविषापहः । योनिशूलतृषादाहकुष्ठशोथास्रनाशनः ॥३५॥ बड़ी मौलसिरी के संस्कृत नाम-शिवमल्ली, पाशुपत, एकाष्ठील, वक, वसु ये सब हैं । बड़ी मौलसिरी- किञ्चित् उष्ण, कटु तथा तिक्त रसयुक्त एवम्-कफ, पित्त, विष, योनिशूल, तृषा, दाह, कुष्ठ, शोथ और रक्तविकार को दूर करने वाली है । [३४-३५] नोट-भावप्रकाशकार बकुल की दो जातियों का उल्लेख करते हैं जिनमें बड़ी को शिवमल्ली, पाशुपत, एकाष्ठील, वक एवं वसु कहा गया है । वक नाम होने से इसे कुछ अगस्त मानते हैं किन्तु अगस्त का स्वतंत्र वर्णन आगे आया हुआ है । वानस्पतिक दृष्टि से बकुल की कोई भिन्न जाति (Species) का उल्लेख नहीं पाया जाता । संभव है केवल स्थानादि भेद से कहीं-कहीं बड़े आकार के वृक्ष हो जाते हों जिन्हें बृहद् बकुल कहा गया हो । १५. मौलसिरी हिं०-मौलसिरी । बं०-बकुल । म०-बकुल, ओवली । गु०-बोलसरी । क०-बकुल । ते०-पोगड । ता०- मगिलम । ले०-Mimusops elengi Linn. (मिम्युसोप्स एलेन्गी) । Fam. Sapotaceae (सेपोटेंसी) । शोभा तथा सुगंध के लिए यह सभी जगह बागों में लगाया हुआ पाया जाता है । दक्षिण तथा अंडमान में अधिक होता है । इसके वृक्ष-५० फीट तक ऊँचे, सघन, चिकने पत्तों से युक्त, झोपड़ाकार और सुहावने दिखाई पड़ते हैं तथा बारहो मास हरे-भरे रहते हैं । छाल-धूसर एवं कुछ फटी हुई तथा काष्ठसार लाल रंग का होता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

पुष्पवर्गः ६५५ पत्ते—जामुन के पत्तों के समान ३।। इञ्च लम्बे, १।।। इञ्च चौड़े, नोकदार एवं किनारों पर लहरदार तथा पौन इञ्च दण्ड से युक्त होते हैं । फूल—सफेद, लगभग एक इञ्च गोल चक्राकार होते हैं और उनसे अत्यन्त सुगन्धि आती है जो इनके सूखने पर भी चिरकाल तक बनी रहती है। फल—किञ्चित् लम्बाई लिये गोल, पौन इञ्च से १ इञ्च लम्बे, ऊपर से साफ, कच्ची अवस्था में हरे रंग के और पकने पर पीले एवं कषाय मधुर हो जाते हैं जिनमें एक बड़ा बीज रहता है। ग्रीष्म से शरद तक यह फूलता है तथा बाद में फलता है। इसकी छाल, फल तथा पुष्पों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—बीजों में सैपोनिन एवं एक तैल होता है। छाल में कषाय द्रव्य, रबर सदृश पदार्थ, मोम, रंजक द्रव्य, स्टार्च एवं राख होती है। फूलों में उड़नशील तैल होता है। फल में शर्करा होती है। गुण और प्रयोग—इसकी छाल कषाय एवं पौष्टिक है। फल संग्राहक एवं स्नेहन हैं। (१) दाँत हिलते हों या अन्य दन्त विकारों में इसका बहुत उपयोग किया जाता है। इससे दतुअन करते हैं। छाल को या कच्चे फलों को चबाने को देते हैं। छाल के क्वाथ से गण्डूष भी कराते हैं। इससे अत्यधिक लालास्राव में भी लाभ होता है। बीजों से भी लाभ होता है। (२) छाल का क्वाथ जीर्ण ज्वर में पौष्टिक रूप में देते हैं। (३) सूखे फूलों का नस्य शिरःशूल में दिया जाता है। (४) पुरानी आँव में पके फल खिलाते हैं। अथ कदम्बः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कदम्बः प्रियको नीपो वृक्षपुष्पो हलिप्रियः । कदम्बो मधुरः शीतः कषायो लवणो गुरुः ।। सरो विष्टम्भकृद्रूक्षः कफस्तन्यानिलप्रदः ।।३६।। कदम्ब के संस्कृत नाम—कदम्ब, प्रियक, नीप, वृत्तपुष्प और हलिप्रिय ये सब हैं। कदम्ब—मधुर, कषाय तथा लवण रस युक्त, शीतल, गुरु, सारक, रूक्ष, वातविष्टम्भ (वायु का न खुलना) को उत्पन्न करने वाला, कफकारक, दुग्धवर्धक और वायुजनक होता है। [१६] नोट—अन्य निघंटुओं ने इसके कई भेदों का उल्लेख किया है। इनके विभिन्न पर्यायों में से धारकदंब, धूलिकदंब, भूकदंब, राजकदंब एवं नीप मुख्य हैं। इनमें से संभवतः कुछ एक-दूसरे के पर्याय हैं तथा कुछ भेद हैं। सुप्रसिद्ध कदंब वृक्ष तो राजकदंब मालूम पड़ता है जिसका विस्तार से नीचे वर्णन् किया गया है। संभवतः इसे ही नीप कहा गया है। भूकदंब तो मुण्डी है जिसका पहले (पृ० ४१३) वर्णन आ चुका है। कदंब के ही वर्ग के कुछ उससे मिलते-जुलते दो अन्य वृक्ष, ले०—Mytragyna parvifolia Korth (मिट्रागाइना पार्विफोलिया), हिं०—करम, कैमा एवं ले०— Adina cordifolia Benth. & Hook. f. (एडिना कॉर्डिफोलिया), हिं०—जातकदम, हलदू, सं०—हरिद्रु, आसा०—केलिकदंब पाये जाते हैं जो संभवतरूः उपर्युक्त भेदों में से हैं। इनमें से प्रथम धारा कदंब एवं द्वितीय धूलिकदंब हो सकता है। १६. कदम हिं०—कदम, कदम्ब । बं०—कदम । म०—कलम्ब । गु०—कदम्ब । क०—कड़वा ते०—कदंबमु । ता०— येल्लह कदम्ब । ले०—Anthocephalus cadamba Miq. (एंथोसिफेलस् कदम्ब) । Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। यह हिमालय के निचले भागों में नेपाल से पूर्व की तरफ वर्मा तक तथा दक्षिण में उत्तरी सरकार तथा पश्चिमी घाट में होता है। सभी स्थानों पर बागों में लगाया हुआ भी पाया जाता है।

६५६ भावप्रकाशनिघण्टुः कदम्ब का वृक्ष-४०-५० फीट ऊँचा, बड़ा और छायादार होता है। पत्ते-महुवे के पत्तों के समान लम्बाई युक्त अण्डाकार, ५-९ इञ्च लम्बे होते हैं। इन पर सिरायें बहुत स्पष्ट होती हैं। पुष्प गुच्छ १-२ इञ्च के घेरे में, गोलाकार नारंगी रंग के अनेक पुष्पगुच्छ होते हैं और उनसे विशेष कर रात्रि में सुगन्धि आती है। फल-कच्चे में हरे और पकने पर फीके नारंगी रंग के, १-१॥ इञ्च व्यास में, गोल तथा मधुराम्ल होते हैं। चिकित्सा में फल तथा छाल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में राख १०% रहती है जिसमें चूना रहता है। इसमें का प्रधान तत्त्व सिन्कोटैनिक अम्ल (Cinchotannic acid) की तरह है तथा इसकी छाल का रंग भी सिंकोना में के लाल द्रव्य की तरह है। इसमें का क्षाराभ हृदयावसादक है। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक, शीतवीर्य, ज्वरघ्न, मूत्र स्तंभन (Antidiuretic), व्रणरोपण, शुक्रशोधन, वेदनास्थापन एवं विषघ्न है। इसका प्रयोग ज्वर, रक्तातिसार, मूत्रकृच्छ्र, मूत्रदोष एवं मुखपाक में किया जाता है। (१) इसकी छाल का रस, जीरा एवं मिश्री के साथ बच्चों के ज्वर, वमन एवं अतिसार में दिया जाता है। (२) नेत्राभिष्यंद में अन्य औषधियों के साथ इसका रस पलकों पर लगाते हैं। (३) मुखपाक में छाल का या पत्तों का कषाय गण्डूष के लिए दिया जाता है। (४) फल का रस ज्वरजन्य पिपासा में उपयोगी मानते हैं। मात्रा-त्वक् ५-१० रत्ती। अथ कुब्जकः (कूजा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुब्जको भद्रतरुणी वृत्तपुष्पोऽतिकेसरः। महासहा कण्टकाढ्या नीलालिकुलसंकुला ।। ३७ ।। कुब्जकः सुरभिः स्वादुः कषायानुरसः सरः। त्रिदोषशमनो वृष्यः शीतहर्त्ता च स स्मृतः ।। ३८ ।। कूजा के संस्कृत नाम-कुब्जक, भद्रतरुणी, वृत्तपुष्प, अतिकेसर, महासहा, कण्टकाढ्या, नीलालिकुलसंकुला ये सब हैं। कूजा-सुगन्धयुक्त, आरम्भ में मधुर, अन्त में कषाय रसयुक्त, सारक, त्रिदोषनाशक, वृष्य (वीर्यवर्धक) और शीत को दूर करने वाला है। [३७-३८] १७. कूजा हिं०-कूजा, कुजई। बं०-कूजा। ले०-Rosa moschata Herrm (रोजा मॉस्केटा)। Fam. Rosaceae (रोज़ेसी)। यह मध्य तथा पश्चिम हिमालय के साधारण उष्ण प्रदेशों में मुरी से नेपाल तक २ हजार से ११ हजार फीट तक होता है। गुलाब की जाति की यह इतस्ततः फैलने वाली विस्तृत लता होती है। काण्ड-५" तक मोटे तथा ५० फीट तक ऊँचे होते हैं। काँटे भूरे रंग के होते हैं। पत्ते-संयुक्त, २"-६" लम्बे एवं वृन्त पर काँटे होते हैं। पत्रक-संख्या में ५-९, अंडाकार, तीक्ष्णाग्र, दन्तुर, १-३" लम्बे एवं अधर पृष्ठ पर मृदुरोमश होते हैं। पुष्प-श्वेत, सुगंधित, १- १.५" व्यास में एवं इनके वृन्त पर काँटे नहीं होते। फल-नारंगी, रक्त या हलके लाल रंग के, गोल या अंडाकार एवं व्यास में ०.३-०.६" रहते हैं। पुष्पकाल अप्रिल से जून एवं फलोद्भव अक्तूबर से फरवरी तक। गुण और प्रयोग-यह सारक, त्रिदोषघ्न तथा वृष्य है। इसका प्रयोग पैत्तिक विकार, दाह एवं नेत्र रोगों में किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पुष्पवर्गः ६५७ अथ मल्लिका। तस्या नामानि गुणाँश्चाह मल्लिका मदयन्ती च शीतभीरुश्च भूपदी ।।३९।। मल्लिकोष्णा लघुर्वृष्या तिक्ता च कटुका हरेत् । वातपित्तास्यदृग्गव्याधिकुष्ठारुचिविषव्रणान् ।।४०।। मल्लिका (बेला, मोतिया) के संस्कृत नाम—मल्लिका, मदयन्ती, शीतभीरु, भूपदी ये सब हैं। मल्लिका— उष्ण, लघु वृष्य, तिक्त तथा कटु रसयुक्त एवम्—वात, पित्त, मुख-नेत्र-सम्बन्धी रोग, कुष्ठ, अरुचि, विष तथा व्रण को दूर करने वाली है। [३९-४०] १८. मल्लिका यह जस्मिनम् सम्बॅक् (Jasminum sambac) की ही एक जाति (Variety) है जिसका वर्णन बेला (वार्षिकी) के अन्तर्गत (पृष्ठ ४९०) किया जा चुका है। गुण की दृष्टि से यह उससे कुछ समान ही है किन्तु इसे भा० प्र० उष्णवीर्य एवं वार्षिकी को शीतवीर्य मानते हैं। अथ माधवी (वासन्ती) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह माधवी स्यात्तु वासन्ती पुण्ड्रको मण्डकोऽपि च । अतिमुक्तो विमुक्तश्च कामुको भ्रमरोत्सवः ।। माधवी मधुरा शीता लघ्वी दोषत्रयापहा ।।४१।। माधवी के संस्कृत नाम—माधवी, वासन्ती, पुण्ड्रक, मण्डक, अतिमुक्त, विमुक्त, कामुक, भ्रमरोत्सव ये सब हैं। माधवी—मधुर रसयुक्त, शीतल, लघु तथा त्रिदोषनाशक है। [४१] १९. माधवी हिं०—माधवी। बं०—माधवी लता। म०—मधु मालती, हलदबेल। गु०—रगतपीती, माधवी लता। ता०— अडिगम। ते०—माधवतोगे। अं०—Clustered Hiptage (क्लस्टर्ड हिप्टेज)। ले०—Hiptage madablota Gaertn. (हिप्टेज मेडेब्लोटा)। Fam. Malpi-ghiaceae (मॅल्पिघिएसी)। यह दक्षिण, सिवालिक, कुमाऊँ, पूर्वीबंगाल, आसाम, नेपाल तथा अंडमान में होती है एवं बागों में भी यह लगाई जाती है। इसकी लता—बहुत विस्तार में फैलने वाली होती है और निकटवर्ती वृक्ष पर चढ़ कर उसको ढँक देती है। इसका स्तम्भ—मजबूत होता है और शाखाएँ मोटी होती हैं। पत्ते—अंडाकार, लट्वाकार-आयताकार या आयताकार-प्रासवत्, श्वेत तथा सुगंधित रहते हैं। आभ्यंतर दल झालरदार रहते हैं जिनमें से एक दल पीला रहता है। प्रत्येक स्त्री केशर में एक बड़ा और दो छोटे पक्ष (Wing) होते हैं। इसकी छाल तथा पत्तों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें हिप्टेजिन (Hiptagin) नामक एक ग्लूकोसाइड पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके पत्ते कुष्ठघ्न हैं। त्वचा के रोगों में पत्तों को पीसकर लगाया जाता है। खुजली (Scabies) में यह लाभदायक है। इसकी छाल कड़वी तथा सुगंधित है तथा इसका जीर्ण आमवात तथा श्वास में उपयोग किया जाता है। कमर पतली करने के लिए जड़ को मट्ठे के साथ पिलाना चाहिये। (चक्रदत्त) ४५ भाव.I

६५८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ केतकः सुवर्णकेतकी च (केवड़ा-पीला केवड़ा) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह केतकः सूचिकापुष्पो जम्बुकः क्रकचच्छदः । सुवर्णकेतकी त्वन्या लघुपुष्पा सुगन्धिनी ।।४२।। केतकः कटुकः स्वादुर्लघुस्तिक्तः कफापहः । उष्णा तिक्तरसा ज्ञेया चक्षुष्या हेमकेतकी ।।४३।। २०. केवड़ा हिं०-केवड़ा। बं०-केया। म०-केवड़ा। गु०-केवड़ो। ते०-मुगलीपुवु। ता०-ताल है। क०-केदगे। फा०-गुलकेरी। अ०-कादी। अं०-Screw Pine (स्क्रू पाइन)। ले०-Pandanus odoratissimus Roxb. (पेण्डेनस ओडोरेटिसिमस्) । Fam. Pandanaceae (पेण्डेनेसी) । भारतीय प्रायद्वीप के दोनों तरफ समुद्री किनारों तथा अंडमान में यह पाया जाता है। सभी स्थानों में बागों में लगाया हुआ भी मिलता है। इसका गुल्म या छोटा वृक्ष करीब १०-१२ फीट ऊँचा होता है। काण्ड से वायवीयमूल निकल कर उसे सहारा देते हुए जमीन में घुसे रहते हैं। पत्ते-सघन, चमकीले, हरे, तलवार की तरह, ३-७ फीट तक लम्बे, पतले तथा किनारों . एवं मध्यशिरा पर तीक्ष्ण काँटों से युक्त होते हैं। पुष्प-पत्रावृत अवृन्त-काण्डज व्यूह (Spadix) में आते हैं जिनके पत्रकोश (Spathe) सुगन्धित तथा श्वेतवर्ण के होते हैं। पुं० पुष्प एवं स्त्री पुष्प भिन्न-भिन्न वृक्षों पर होते हैं। पुं० पुष्प व्यूह में कई गुच्छ ५-१० x २.५ - ३.८ से० मी० बड़े रहते हैं किन्तु स्त्रीपुष्प व्यूह में एक ही गुच्छ, ५ से० मी० व्यास का रहता है। फल-गोल या आयताकार, १५-२५ से० मी० लम्बा चौड़ा, पीत या रक्तवर्ण का हाता है। वर्षा ऋतु में पुष्प एवं शरद् ऋतु में फल आते हैं। भावप्रकाशकार इसके दो भेद मानते हैं। (१) केतक तथा (२) सुवर्ण केतकी। सुवर्णकेतकी के पुष्प कुछ छोटे, स्वर्ण वर्ण के तथा अधिक सुगन्धि वाले माने जाते हैं। आधुनिक राक्सवर्ग जैसे वैज्ञानिकों का मत है कि सुगन्ध पुं० पुष्प में अधिक होती है। पेण्डेनस की ऐसी भी कुछ जातियाँ (Species) पाई जाती हैं जिनके पत्तों में काँटे नहीं होते। इसके पुष्प एवं पत्तों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पुष्पों में ०.१-०.३% सुगन्धित तैल होता है। गुण और प्रयोग-यह सौमनस्यजनन, हृद्य, मस्तिष्क को बल देने वाला, दुर्गन्ध हर एवं कफनाशक है। (१) इसका अर्क ज्वर में देने से पसीना आकर ताजगी मालूम पड़ती है। (२) इसके तेल की मालिश से शिरःशूल, कटिशूल एवं आमवातादि में लाभ होता है। (३) चर्मरोगों में पत्तों का उपयोग किया जाता है। (४) गुल्म में इसके क्षार का प्रयोग किया जाता है। (सुश्रुत) मात्रा-अर्क ४-६ तोला; शर्बत २-४ तोला। अथ किङ्किरातः (गौडादौ प्रसिद्धः) तस्य नामानि गुणाँश्चाह किङ्किरातो हेमगौरः पीतकः पीतभद्रकः ।।४४।। किङ्किरातो हिमस्तिक्तः कषायश्च हरेदसौ। कफपित्तपिपासाऽस्रदाहशोषवमिक्रिमीन् ।।४५।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

किङ्किरात (यह गौड़ आदि देशों में प्रसिद्ध है) के संस्कृत-नाम-किङ्किरात, हेमगौर, पीतक, पीतभद्रक ये सब हैं। किङ्किरात-तिक्त तथा कषाय रस युक्त, शीतल तथा कफ, पित्त, प्यास, रक्तविकार, दाह, शोष, वमन तथा क्रिमि को दूर करता है। [४४-४५] २१. किंकिरात आगे वटादिवर्ग में बब्बूल (किंकिरात) का वर्णन आया है। या तो इसके फूलों के महत्त्व को बतलाने के लिए इसका यहाँ स्वतंत्र वर्णन किया गया हो या यह बब्बूल का कोई भेद हो। पीले पुष्प की कटसरैया को भी कुछ विद्वान् किंकिरात मानते हैं। दक्षिण की तरफ एक बब्बूल की जाति का छोटा वृक्ष म०-देववाभूल, ले०-Acacia latromun Willd. (अकेसिया लेट़्रोमन); Fam. Leguminosae (लेग्यु-मिनोसी) पाया जाता है। यदि बब्बूल से भिन्न किंकिरात हो तो इसके होने की संभावना है। यह छोटा सा वृक्ष होता है जिसका ऊपर का भाग पुराने वृक्षों में छत्र की तरह फैल जाता है। इसमें पुष्प सफेद आते हैं जो बाद में पीले हो जाते हैं। पागल कुत्ते के काटने पर इसकी ताजी जड़, ४ तोले की मात्रा में ठंडे जल में पीस कर ७ दिन पिलाते हैं। अथ कर्णिकारः ("पांगारा" इति महाराष्ट्रे प्रसिद्धः) तस्य नामानि गुणाँश्चाह कर्णिकारः कटुस्तिक्तस्तुवरो शोधनो लघुः । रञ्जनः सुखदः शोथश्लेष्मास्रव्रणकुष्ठजित् ।।४६।। कर्णिकार (यह "पांगारा" इस नाम से महाराष्ट्र में प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-कर्णिकार, परिव्याध, पादपोत्पल ये सब हैं। कर्णिकार-कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, कोष्ठशोधक, लघु रंग देने वाला, सुख पहुँचाने वाला, एवम्-शोथ, कफ, रक्तविकार, व्रण और कुष्ठ को दूर करने वाला है। [४६] २२. कर्णिकार कर्णिकार क्या है इस संबन्ध में कुछ मतभेद हैं। हरीतक्यादि वर्ग में (पृ० ६८) आरग्वध के पर्याय में कर्णिकार शब्द आया है। जैसे बब्बूल का पर्याय किंकिरात होते हुए भी उसके पुष्पों के महत्त्व की दृष्टि से उसका दो स्थानों पर स्वतंत्र वर्णन किया है वैसे ही संभवतः इसका यहाँ फिर से वर्णन किया गया है। ध० नि० ने कर्णिकार को आरग्वध भेद माना है। 'पांगारा', इति महाराष्ट्रे प्रसिद्धः' यह जो प्रारंभ में दिया हुआ है वह उचित नहीं मालूम पड़ता। मराठी में पांगारा यह पारिभद्र, Erythrina indica (एरिश्रिना इण्डिका) का नाम है जिसका पहले वर्णन (पृ० ३३४) किया जा चुका है। कुछ विद्वानों ने उलटकंबल, Abroma augusta (एब्रोमा ऑगस्टा) को कर्णिकार माना है। कुछ ने बं०- कनकचम्पा, Pterospermum acerifolium (टेरोस्पर्मम् एसेरिफोलियम्) को कर्णिकार माना है किन्तु यह तो मुचकुंद है। मुचकुंद के लिये गलती से लोगों ने Pterospermum suberifolium (टे० सुबेरिफोलियम्) नाम लिखा है।¹ मुचकुंद का आगे स्वतंत्र वर्णन आया हुआ है। अथाशोकः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह अशोको हेमपुष्पश्च वञ्जुलस्ताम्रपल्लवः । कङ्केलिः पिण्डपुष्पश्च गन्धपुष्पो नटस्तथा ।।४७।। १. श्री ठा० बलवन्तसिंह-बिहार की वनस्पतियाँ, पृ. १७

६६० भावप्रकाशनिघण्टुः अशोकः शीतलस्तिक्तो ग्राही वर्ण्यः कषायकः । दोषापचीत्पादाहकृमिशोषविषास्रजित् १ ॥४८॥ अशोक के संस्कृत नाम-अशोक, हेमपुष्प, वञ्जुल, ताम्रपल्लव, कङ्केलि, पिण्डपुष्प, गन्धपुष्प, नट ये सब हैं । अशोक-तिक्त तथा कषाय रस युक्त, शीतल, ग्राही, शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला एवम् वातादिदोष, अपची, तृषा, दाह, क्रिमि, शोष, विष और रक्तविकार को दूर करने वाला है । [४७-४८] नोट-यद्यपि अशोक वृक्ष, Saraca indica Linn. (साराका इण्डिका) है तथापि कहीं-कहीं Polyalthia longifolia (पॉलिएल्थिया लौंगिफोलिया) को गलती से लोग अशोक मानते हैं । असली अशोक का उपयोग रक्तप्रदर आदि गर्भाशय के विकारों में बहुत प्रचलित हैं किन्तु इस गुण का उल्लेख चरक, सुश्रुत, भा० प्र०, रा० नि०, ध० नि०, में देखने में नहीं आता । सुश्रुत में लोध्रादिगण में इसका पाठ है जिसमें ये द्रव्य योनिदोषों में उपयोगी बतलाये गये हैं । चरक में वेदनास्थापनगण एवं कषायस्कंध में उल्लेख है । वृन्द ने प्रथम रक्तप्रदर में इसका उपयोग किया है । यहाँ प्रथम असली अशोक का तथा बाद में दूसरे अशोक का संक्षेप में वर्णन किया है । २३. अशोक (१), असली अशोक हि०-अशोक । बं०-असोक । म०, गु०-अशोक । क०-अशोक । ता०-अचोकम् । ले०-Saraca indica Linn. (सराका इण्डिका) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह मध्य और पूर्वी हिमालय, पूर्व बंगाल और दक्षिण भारत में पाया जाता है तथा अनेक प्रकार की वाटिकाओं में भी देखने में आता है । बंगाल में इसका अधिक आदर है और प्रायः वहाँ के सब वाटिकाओं में देखा जाता है । इसका वृक्ष-बड़ा, सीधा और झोपड़ाकार होता है तथा यह बारहो मास हरा-भरा दिखाई पड़ता है । लकड़ी- हलकी, किंचित् लाली युक्त भूरे रंग की होती है । पत्ते-सम-पक्षवत् एवं पत्रक-पतली-पतली टहनियों पर ३ से ६ जोड़े रहते हैं और वे ३ से ९ इञ्च तक लम्बे, आयताकार या आयताकार प्रासवत्, चिकने, तीक्ष्ण या लम्बाग्र एवं चर्मल होते हैं । नई-नई टहनियाँ नीचे की ओर झुकी हुई रहती है और उनके पत्ते अत्यन्त कोमल, एक दूसरे से सटे हुए, तांबे के रंग के लाल मनोहर दिखाई पड़ते हैं । इसीलिए इसको ताम्रपल्लव कहते हैं । वसन्त ऋतु में इस पर फूल तथा शरद् में फल आते हैं । पुष्प-सघन गुच्छों में आते हैं और वे नारंगी रंग से लेकर अत्यन्त रक्तवर्ण तक परम सुहावने होते हैं । इसमें कोण पुष्पक एवं बाह्यदल रंगीन होते हैं । बाह्यदल ४ तथा आयताकार होते हैं । आभ्यंतरदल नहीं रहते । पुंकेशर ७-८, करीब १ इञ्च लम्बे एवं गहरे लाल रंग के होते हैं । फलियाँ-६ से १० इञ्च तक लम्बी, चिपटी, १ से १।। इञ्च चौड़ी तथा दोनों सिरों पर कुछ-कुछ टेढ़ी होती हैं । प्रत्येक फली में ४ से ८ तक बीज रहते हैं । बीज-१

पुष्पवर्गः ६६१ इसका उपयोग रक्तप्रदर-कष्टार्तव, श्वेतप्रदर, रक्तार्श, रक्तातिसार एवं गर्भाशय के विकारो में किया जाता है। अर्गट की तरह सभी प्रकार के रक्तप्रदर में इसका प्रयोग किया जा सकता है। (१) रक्तप्रदर में इसकी छाल का क्षीरपाक करके सुबह पिलाते हैं। (चक्रदत्त) मात्रा-१ से २ तोला (क्षीरपाक करके)। २४. अशोक (२) हिं०-अशोक असोक, देवदारु। बं०-देव दारु। म०-अशोक। ते०-असोकमु। क०-पुत्रजीवी। ले०- Polyalthia longifolia Benth. & Hook. f. (पॉलीएलथिया लौंगी फोलिया)। Fam. Annonaceae (अन्नोनेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है, विशेष कर सड़कों के किनारे देखने में आता है। इसे वाटिकाओं में भी लगाते हैं। इसका वृक्ष-सीधा खड़ा होता है। शाखाएँ-सघन नहीं होतीं। पतली-पतली टहनियों पर पत्ते विषमवर्ती रहते हैं। छाल-पतली और लकड़ी-किंचित् पीलापन युक्त सफेद होती है। पत्ते-६ से ९ इञ्च तक लम्बे, किंचित् अंडाकार, मालाकार, लहरदार धारवाले और चमकीले होते हैं। फूल-हरापन युक्त पीले रंग के अथवा पीलापन युक्त सफेद रंग के आते हैं। फल-जामुन के समान गोल होते हैं। कच्ची अवस्था में नीले रंग के और पकने पर लाल हो जाते हैं। गुण और प्रयोग-गलती से इसकी छाल का कहीं-कहीं असली अशोक के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। यह ज्वरनाशक होती है। अथाम्लाटनः (बाणपुष्प इति गौडादौ प्रसिद्धः) तस्य नामानि गुणाँश्चाह अम्लातोऽम्लाटनः प्रोक्तस्तथाऽम्लातक इत्यपि ।।४९।। कुरण्टको वर्णपुष्पः स एवोक्तो महासहः। अम्लाटनः कषायोष्णः स्निग्धः स्वादुश्च तिक्तकः ।।५०।। अम्लाटन (यह "बाणपुष्प" के नाम से गौड़ आदि देशों में प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-अम्लात, अम्लाटन, अम्लातक, कुरण्टक, वर्णपुष्प, महासह ये सब हैं। अम्लाटन-कषाय तथा तिक्तरस युक्त, उष्ण, स्निग्ध एवम् स्वादिष्ट है। [४९-५०] २५. बाणपुष्प इसके संस्कृत पर्याय-अम्लात, अम्लाटन, अम्लातक, कुरण्टक आदि कटसरैया के बोधक हैं। इसलिये बाणपुष्प, कटसरैये का ही कोई भेद मालूम पड़ता है। [२५] अथ सैरेयकः (कटसरैया) तस्य नामानि भेदान् गुणाँश्चाह सैरेयकः श्वेतपुष्पः सैरेयः कटसारिका। सहाचरः सहचरः स च भिन्द्यापि कथ्यते ।।५१।। कुरण्टकोऽन्नपीते स्याद्रक्त कुरबकः स्मृतः। नीले बाणा द्वयोरोक्तो दासी चार्त्तगलश्च सः ।।५२।। सैरेयः कुष्ठवातास्रकफकण्डूविषापहः। तिक्तोष्णो मधुरोऽनम्लः १सुस्निग्धः केशरञ्जनः ।।५३।। सफेद फूलवाली कटसरैया के संस्कृत नाम-सैरेयक, श्वेतपुष्पसैरेयक, सैरेय, कटसारिका, सहाचर, सहचर, भिन्दी ये सब हैं। पीले फूल वाली कटसरैया का संस्कृत नाम-कुरण्टक है। लाल फूलवाली का संस्कृत १. दन्त्यः इति पाठा०।

६६२ भावप्रकाशनिघण्टुः नाम—कुरबक है। नीले फूलवाली कटसरैया के संस्कृत नाम—बाणा, बाण, (बाण शब्द पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग दोनों में है), दासी, आर्तगल ये सब हैं। कटसरैया—तिक्त, मधुर तथा किञ्चित् अम्लरस युक्त, उष्ण, अतिस्निग्ध, केशों को रंगनेवाली होती है तथा कुष्ठ, वातरक्त, कफ, खुजली एवं विष का नाश करती है। नोट—सैरेयक के पुष्पों के आधार पर विभिन्न भेद किये हुए हैं। ये सब Barleria (बार्लेरिया) की विभिन्न जातियाँ हैं जिनके साधारण स्वरूप में साम्यता रहती है। यहाँ वानस्पतिक वर्णन केवल पीत का किया गया है। गुणकर्म भी सब के प्रायः समान ही होने से एक साथ ही सबका वर्णन किया गया है। निम्नलिखित भेदों का उल्लेख निघण्टुओं ने किया है। (१) श्वेत पुष्प—सहचर, Barleria cristata Linn. (बार्लेरिया क्रिस्टेटा) । (२) पीत " —कुरंटक, " prionitis " ( " प्रियोनाइटिस्) । (३) रक्त " —कुरबक, " cristata " ( " क्रिस्टेटा) । (४) नील " —दासी, आर्तगल, बाण, B. strigosa Willd. (बार्लेरिया स्ट्राइगोसा) । B. cristata (बा. क्रिस्टेटा) में स्थानभेद से पुष्प वर्ण तथा पत्रादि में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती हैं। इसमें श्वेत तथा गुलाबी दोनों प्रकार के फूल पाये जाते हैं। हिमालय पर होने वाले पौधों में जामुनी नील वर्ण के पुष्प होते हैं। बार्लेरिया की अन्य अनेक जातियाँ भी पाई जाती हैं जिन्हें बागों में शोभा के लिए भी लगाते हैं। २६. कटसरैया हिं०-कटसरैया, पियाबाँसा। बं०-कांट्राजाती। म०-कोरांटी। गु०-पीलो कांटारीयो। ले०-Barleria prionitis Linn. (बार्लेरिया प्रियोनाइटिस्) । Fam. Acanthaceae (अॅकेन्थेसी) । कटसरैया सभी उष्ण प्रान्तों में पाई जाती है तथा बागों में भी लगाई जाती है। इसका क्षुप-झाड़दार, काँटेदार तथा २ से ५ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते—१.५ से ४ इञ्च लम्बे, कण्टकित अग्रयुक्त, अंडाकार (शाखाओं में आयताकार-प्रासवत), विपरीत तथा अखण्डतट वाले हैं। डोडी—१ इञ्च लम्बी होती है जिनमें दो चिपटे बीज पाये जाते हैं। कटसरैया के पत्र एवं मूल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-पीत सैरेयक में एक क्षाराभ पाया गया है तथा इसमें पोटेशियम् (Potassium) काफी रहता है। गुण और प्रयोग-सैरेयक, तिक्त, अम्ल, उष्ण, कफनिःसारक, कुछ स्वेदजनक, शोथहर, व्रणरोपण, विषघ्न एवं केशरंजक है। इसका उपयोग कास, शोथ, दंतशोथ, चर्मरोग एवं चूहे के विष में किया जाता है। (१) बच्चों के कफयुक्त खाँसी में इसके पत्तों का स्वरस मधु या शर्करा मिलाकर देते हैं। शुष्क कास में सूखी हुई छाल का चूर्ण चटाते हैं। (२) जलशोथ (Anasarca) में मूल की ताजी छाल या पंचांग की राख खांड के साथ देते हैं। (३) चूहे के विष में मूल को मधु तथा चावल को धोवन के साथ देते हैं। (वाग्भट उ० ३८)। (४) दाँत हिलते हों तो नील सैरेयक के पत्तों के कषाय से गण्डूष कराते हैं (चक्र); दंतशूल में नमक के साथ पत्तों का लेप मसूड़ों पर करते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA

पुष्पवर्गः ६६३ (५) ग्रन्थि, शोथ आदि में मूल का लेप, व्रण पर पंचांग सिद्ध तैल एवं बरसात में पैर न फटे इसलिये तलवे पर पत्तों का लेप किया जाता है। कुष्ठादि चर्मरोगों में इसका लेप एवं आन्तरिक प्रयोग किया जाता है। मात्रा-स्वरस १/२-१ तोला; क्वाथ ५-१० तो०। अथ कुन्दम्। तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुन्दं तु कथितं माथ्यं सदापुष्पञ्च तत्स्मृतम्। कुन्दं शीतं लघु श्लेष्मशिरोरुग्विषपित्तहृत् ।।५४।। कुन्द के संस्कृत नाम-कुन्द, माथ्य, सदापुष्प ये सब हैं। कुन्द-शीतल, लघु तथा कफ, शिरोरोग, विष और पित्त को दूर करने वाला है। [५४] २७. कुन्द हिं०-कुन्द, कुन्दे का वृक्ष, कुन्द फूल। बं०-कुन्द। म०-कस्तूरी मोगरा। गु०-मोगरो। ता०-मल्लिगै। ते०-कुंदमु। ले०-Jasminum pubescens Willd. (जसमीनम् प्युबेसेन्स) । Fam. Oleaceae (ओलिएसी)। यह सब स्थानों पर होता है। बागों में शोभा के लिये भी लगाते हैं। इसका गुल्म-बड़ा, रोमश, लतासदृश आरोहणशील होता है। पत्ते-विपरीत, ३.८-७ x १.६-३.८ से० मी०, अंडाकार एवं लम्बाग्र तथा वृन्त ६-१० मि० मी० घन रोमश होता है। पुष्प-बेला के समान या उससे कुछ लम्बे, गुच्छों में, श्वेत, सुगन्धित एवं दल पत्र आयताकार तथा मालाकार होते हैं। यद्यपि यह वर्ष भर फूलता है किन्तु शीत ऋतु में बहुत अधिक फूलता है। इसके पुष्प, पत्र एवं मूल का प्रयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसके पत्तों का पुल्टिस बनाकर पुराने व्रणों पर बाँधने से व्रणरोपण होने लगता है। इसकी जड़ सर्पविष में उपयोगी बतलाई गई है। पुष्प एवं पिप्पली को तण्डुलांबु के साथ श्वास में पिलाने से लाभ होता है। (सु० उ० अ० ५१-३७) अथ मुचुकुन्दः । (नाम्नैव प्रसिद्धः)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह मुचुकुन्दः क्षत्रवृक्षश्चित्रकः प्रतिविष्णुकः । मुचुकुन्दः शिरःपीडापित्तास्रविषनाशनः ।। ५५ ।। मुचुकुन्द (यह इसी नाम से प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-मुचुकुन्द, क्षत्रवृक्ष, चित्रक, प्रतिविष्णुक, ये सब हैं। मुचुकुन्द-शिर की पीड़ा, पित्त, रक्तविकार एवम् विष का नाशक है। [५५] २८. मुचुकुन्द हिं०, म०, बं०, गु०-मुचुकुन्द। ले०-Pterospermum acerifolium Willd. १ (टेरोस्पर्मम् एसेरिफोलियम्) । Fam. Sterculiaceae (स्टर्क्यूलिएसी)। यह हिमालय में ४००० फीट तक तथा बंगाल, चटगाँव, खासिया पहाड़, मणिपुर में तथा दक्षिण में विशेष रूप से बम्बई प्रान्त में लगाया हुआ मिलता है। १. "ग्रन्थों में भूल से एक दूसरी जाति P. suberifolium को मुचकुंद नाम दिया हुआ मिलता है।"-ठा. बलवन्तसिंह, बिहार की वनस्पतियाँ, पृष्ठ १७। कुछ विद्वानों ने P. acerifolium को कर्णिकार माना है। कर्णिकार संभवतः आरग्वध है। चरक में मुचकुंद का उल्लेख नहीं मिलता। सुश्रुत में विद्रधि अध्याय (चि. १८-१०) में है।