भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्पवर्गः ६४७ (४) भस्म गोमूत्र के साथ गलगंड में देते हैं।¹ मात्रा-स्वरस १-२ तोला; चूर्ण २-८ माशा। ६. जलकुम्भी (२) हिं०-बड़ी जलकुम्भी। बं०-कचूरीपान। मल०-कोलावझा। ता०-आकाशथामरै। ते०-पिशाचिथामर। ले०-Eichhornia crassipes Solms (इचोर्निया क्रेसिपीस)। Fam. Pontederiaceae (पोटेडेरियेसी)। यह सुन्दर विदेशी पौधा भारत में समस्त जलाशयों में पाया जाता है। इसका क्षुप-बहुवर्षायु तथा जल में तैरने वाला होता है। इसकी जड़ें-लम्बी तथा रेशेदार, रोएँदार होती हैं जो छिछले जल में कीचड़ में जम जाती हैं। पत्ते-चक्राकार गुच्छों में, चम्मच के आकार के गोल, चौड़े २-८" व्यास में आते हैं जिनका नाल-पुंगी की तरह बहुत फूला हुआ होता है जिससे यह जल पर तैरता है। पुष्प-सुन्दर, नीलाभ बैंगनी रंग के, १-१.५ इञ्च लम्बे, निवापसम (Funnel-shaped), ६-१० इञ्च लम्बे पुष्पद्ण्ड पर आते हैं। बहुत बीज वाले फल Capsule आते हैं। रासायनिक संगठन-इसके ताजे पत्तों में कैरोटीन पाया जाता हैं। इसमें पोटैशियम की काफी मात्रा होने से खाद के लिये इसका उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसके पुष्प घोड़ों के चर्मरोगों में उपयोगी माने जाते हैं। ७. सेवार (१) शैवाल-जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि शैवाल तथा कुम्भिका एक द्रव्य नहीं है बरन् दो भिन्न द्रव्य हैं। हिन्दी का सेवार शब्द शैवाल से ही बना अपभ्रंश मालूम पड़ता है। व्युत्पत्ति की दृष्टि से शैवाल शब्द का अर्थ है कि जो जल में होता हो। चरक सुश्रुतादि में शैवाल का उल्लेख है। विसर्प के लेपों में इसका अधिक उल्लेख है। ध० नि० में इसके पर्यायों में जलमुस्त शब्द आया है जिससे ऐसा मालूम होता है कि इसमें मोथे की तरह नीचे मूल का कुछ स्वरूप हो। अपने यहाँ नदियों आदि में एक पौध पाया जाता है जो सिरैटोफाइलम् डिमर्सम (Ceratophyllum demersum Linn.) है। यह सिरैटोफाइलेसी (Ceratophyllaceae) वर्ग का पौधा है जो वनस्पतियों के उस विभाग के अन्तर्गत आता है जिनमें पुष्प बीजादि वाली वनस्पतियाँ आती हैं। यह ॲल्गी (Algae) विभाग का नहीं है जिनमें काण्ड, पत्र तथा मूल जैसे अलग-अलग अंगों की उत्पत्ति नहीं हुआ करती। समुद्र में पाई जाने वाली कुछ ॲल्गी ऐसी होती हैं जिनको सेवार कहा जा सकता है। नदियों में पाया जाने वाला एक अन्य क्षुप वेलिसनेरिया स्पाइरेलिस् (Vellisneria spiralis Linn.) है जिसे कुछ ने सेवाल लिखा है। नदियों में एक सेवार पाई जाती है जिसे गरमी के दिनों में लोग भैंसों आदि को खिलाते हैं। इसमें नीचे मोथे की तरह राइजोम पाये जाते हैं। ध० नि० मे लिखा जलमुस्त पर्याय संभवतः इसके लिये अभिप्रेत हो। इससे जल का स्वरूप नीला सा होने से जलनीली पर्याय भी इसके लिये ठीक मालूम पड़ता है। इस सेवार का वनस्पति शास्त्र की दृष्टि से विनिश्चय अभी तक नहीं किया जा सका है। यहाँ पर प्रथम दो का वर्णन किया जा रहा है जिन्हें अधिकांश विद्वानों ने सेवार लिखा है। १. जलकुम्भीकजं भस्म पक्वं गोमूत्र गालितम्। पिबेत्कोद्रवतक्राशी गलगण्डोपशान्तये ॥ (वृन्द)