भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६४८ भावप्रकाशनिघण्टुः हिं०- सिवार, सेवार। बं०- शेओयाला। म०- शेवाल, शेवाले। गु०- शेवाल। फा०- चश्मवजग। अ०- तुलहब। ले०- Ceratophyllum demersum Linn. (सिरैटोफाइलम् डिमर्सम्)। Fam. Ceratophyllaceae (सिरैटोफाइलेसी)। यह सभी जगह पाया जाता है। इसके जलीय क्षुप- ८ से ३६ इञ्च लम्बे होते हैं जिनकी शाखाएँ तथा पत्तियाँ पानी से बाहर निकालने पर आपस में गुँथकर जाल सा बन जाती हैं। पत्ते- करीब १ इञ्च लम्बे होते हैं जिनके खण्ड जल में फैले रहते हैं। इनकी मोटाई तथा पत्र दन्त में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। पुष्प- छोटे तथा पुं पुष्प एवं स्त्री पुष्प भिन्न दण्डों पर आते हैं। इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन- इसके रोओं में माइरोफाइलिन (Myrophyllin) पाया जाता है। गुण और प्रयोग- यह शीतवीर्य तथा ज्वरहर है। पैत्तिक विकार, रक्तपित्त आदि में इसका प्रयोग करते हैं। मात्रा- स्वरस १-२ तोला।

८. सिवार (२)

हिं०- सेवार। म०- शेवाल। गु०- जलसपौलियन। ते०- पुनत्सू। ले०- Vellisneria spiralis Linn. (वेलिसनेरिया स्पाइरेलिसलिन)। Fam. Hydrocharitaceae (हाइड्रोचेरिटेसी)। यह समस्त भारत में होता है। इसके क्षुप- जल में डूबे हुए, काण्डहीन तथा आपस में गुँथे हुये होते हैं। पत्ते- रेखाकार, बहुत लम्बे तथा पारभासक होते हैं। पुष्प- पुं. पुष्प छोटे पत्रावृत व्यूह में होते हैं और बहुत छोटे तथा संख्या में बहुत होते हैं। परिपक्व होने पर वे व्यूह से अलग होकर जल के ऊपर आ जाते हैं तथा खिल जाते हैं। स्त्री पुष्प, लम्बे कुण्डलित वृन्त से युक्त होते हैं तथा परिपक्व होने पर कुण्डल खुलकर वे ऊपर आ जाते हैं तथा परिषेचन होने पर फिर वृन्त का कुण्डल होकर नीचे चले जाते हैं। गुण और प्रयोग- यह दीपन तथा शोथघ्न है। इसका प्रयोग श्वेतप्रदर में करते हैं। फोड़े पर इसको बाँधने से जलन कम होती है तथा जल्दी फूट जाता है।

अथ शतपत्री (गुलाब)। तस्या नामानि गुणांश्चाह

शतपत्री तरुण्याक्ता कर्णिका चारुकेशरा। महाकुमारी गन्धाढ्या लाक्षापुष्प्याऽतिमञ्जुला ।। २२।। शतपत्री हिमा हृद्या ग्राहिणी$^१$ शुक्रला लघुः। दोषत्रयास्रजिद्वर्ण्या कट्वी तिक्ता च पाचनी ।। २३।। शतपत्री (गुलाब) के संस्कृत नाम- शतपत्री, तरुणी, कर्णिका, चारुकेशरा, महाकुमारी, गन्धाढ्या, लाक्षापुष्पा और अतिमञ्जुला ये सब हैं। शतपत्री- शीतल, हृदय को हितकर, संग्राही, शुक्रजनक, लघु, त्रिदोष तथा रक्तविकार को दूर करनेवाली, शरीर के वर्ण को उत्तम बनाने वाली, कटु तथा तिक्त रसयुक्त और पाचक होती है। [२२-२३]

९. गुलाब

नोट- गुलाब का फूल सुप्रसिद्ध है। चिकित्सा के अतिरिक्त सुगंध के लिए इसका बहुत उपयोग होता है। कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह विदेशी पौधा है। चरक सिद्धिस्थान अध्याय १० में स्वर्णयूथिका, प्रियंगु, रक्तमूली इत्यादि सांग्राहिक द्रव्यों के साथ तरुणी का भी उल्लेख है। भा० प्र० भी इसे ग्राही लिखते हैं। गुलकंद का उपयोग मृदुसारक द्रव्य के रूप में प्रत्यक्ष सिद्ध है। इसलिए तरुणी शब्द गुलाब के लिए ही है अथवा अन्य किसी भिन्न द्रव्य के लिये है यह संदेह होता है। शतपत्री शब्द भी कई अर्थों में आता है। १. 'वृष्या इति पाठ०। २. 'सरा च' इति पाठ०।