भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्पवर्गः ६४९ गुलाब की कई जातियाँ तथा उनके भेद पाये जाते हैं। उत्तर-पश्चिम हिमालय तथा काश्मीर में पहाड़ों पर यह वन्य अवस्था में भी पाया जाता है। अधिकतर यह बागों में लगाया हुआ मिलता है। फूलों के वर्ण-भेद से, सुगंधभेद से, काँटों की उपस्थिति या अभाव की दृष्टि से इसके अनेक भेद पाये जाते हैं। करीब एक लाख पुष्पों से १ तोला इत्र प्राप्त होता है जिसका सुगन्ध के लिए उपयोग होता है। हिं०, म०, गु०-गुलाब। बं०-गोलाप। ता०-इराशा, गोलप्पु। क०-गुलबि। ते०-गुलाबीपुवु। फा०- गुले सुर्ख, गुल, गुले गुलाब। अ०-बर्द, बर्दे अहमर। अं०-Rose (रोज)। ले०-Rosa centifolia Linn. (रोजा सेण्टिफोलियालिन)। Fam. Rosaceae (रोजेसी)। यह सभी जगह बागों में लगाया हुआ मिलता है। इसका क्षुप-५-७ फीट ऊँचा होता है। शाखाएँ-काँटो से युक्त होती हैं तथा काँटे असमान, बड़े एवं टेढ़े होते हैं। काँटों के अतिरिक्त इन पर चिपचिपे रोएँ भी होते हैं। पत्ते-संयुक्त तथा पत्रक संख्या में प्रायः ५ तथा मृदुरोमश होते हैं। पत्रदण्ड पर काँटे नहीं होते। पुष्प-प्रायः गुलाबी, बड़े, सुगंधयुक्त तथा लम्बे दंड पर हिलते रहते हैं। बाह्यदल स्थायी तथा अन्तर्दल अंदर मुड़े हुये होते हैं। सेवती गुलाब-(Rosa alba-रोजा ॲल्बा) नामक एक विशेष भेद होता है जिसमें पुष्प श्वेत होते हैं। चिकित्सा के लिए वसंत ऋतु में उत्पन्न पुष्पों की छाया में सुखाई हुई कलिकाओं का उपयोग करना चाहिये। इसके केशर इत्यादि भागों को निकाल कर केवल पंखड़ियों का उपयोग गुलकंद बनाने में किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल, टैनिक अम्ल, मैलिक अम्ल तथा कुछ राल आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-गुलाब शीतवीर्य, मृदुसारक, पाचन, त्रिदोषघ्न, पौष्टिक, हृद्य एवं वर्ण्य है। इससे शौच साफ होकर भूख बढ़ती है तथा शरीर पुष्ट होता है। ग्रीष्म ऋतु में स्त्रियों तथा बच्चों को गुलकंद खिलाया जाता है। गुलकंद तथा गुलाबजल का अनुपान के लिए उपयोग करते हैं। नेत्रबिन्दु में गुलाबजल का उपयोग किया जाता है। मुख व्रण में इसका स्थानिक प्रयोग हितकर है। शोथ में इसका लेप किया जाता है तथा व्रण पर इसका चूर्ण डालते हैं। इसके चूर्ण को शरीर पर मलने से स्वेदाधिक्य कम हो कर दुर्गंध दूर होती है। सेवती गुलाब का प्रयोग ज्वर में शीतलता लाने के लिए करते हैं। इससे हृदय की धड़कन भी कम होती है। मात्रा-गुलकंद से १ से २ तोला; चूर्ण १ से ३ माशा; अर्क २ से ४ तोला। अथ वासन्ती (नेवारी)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह नेपाली कथिता तज्ज्ञैः सप्तला नवमालिका। वासन्ती शीतला लघ्वी तिक्ता दोषत्रयास्रजित् ।। २४ ।। वासन्ती (नेवारी) के संस्कृत नाम-नेपाली, सप्तला, नवमालिका और वासन्ती ये सब हैं। वासन्ती- तिक्तरसयुक्त, शीतल, लघु एवम् त्रिदोष तथा रक्तविकार को दूर करने वाली है। [२४] नोट-नेवारी को कुछ विद्वानों ने जस्मिनम् आबेरिसेन्स माना है तथा कुछ ने आइकजोरा आबोरिया (Ixora arborea Roxb.) माना है। 'वासन्ती' नाम इसके वसन्त ऋतु में पुष्पित होने का द्योतक मालूम पड़ता है। 'नेपाली' पर्याय, इसका नेपाल देश से कुछ संबंध बतलाता है। या नेपाली के स्थान पर नेवाली शब्द हो सकता है जिसका अपभ्रंश नेवारी हो गया होगा।