भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५० भावप्रकाशनिघण्टुः चमेली, बेला, जूही इत्यादि के साथ ही इसका वर्णन होने से इसके जस्मिन् जाति के ही होने की अधिक सम्भावना है। ज. आबोरेसेन्स को कुछ ने कुन्द माना है। कुन्द का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है। यहाँ नेवारी (ज. आबोरेसेन्स) का वर्णन किया जा रहा है। निघंटुओं द्वारा वर्णित इन सुगंधयुक्त विभिन्न वनस्पतियों के पर्यायों में पर्याप्त मतभिन्नता पाई जाती है। १०. नेवारी हिं०-नेवारी, वासन्ती, चमेली। बं०-बुराकुन्दा, नवमल्लिका। मु०-कुसर। ता०-नागमल्ली। ते०- नागमल्ले। ले०-Jasminum arborescens Roxb. (जस्मिन्म् आर्बोरेसेन्स्) । Fam. Oleaceae (ओलिएसी) । यह हिमालय में ४००० फीट की ऊँचाई तक तथा बंगाल, छोटा नागपुर, उड़ीसा, मध्य तथा दक्षिण भारत एवं गंजम् और बिजगापट्टम् के पहाड़ों पर होता है। यह झाड़ीदार वृक्ष होता है। शाखाएँ-रोमश होती हैं। पत्ते-साधारण, विपरीत, ५-७.५ से० मी० लम्बे, अण्डाकार या अण्डाकार-आयताकार, लम्बाग्र तथा १-२ से० मी० लम्बे पत्रनाल से युक्त होते हैं। पुष्प-अत्यन्त सुगन्धित, सफेद रंग के, २.५-३.३ से० मी० व्यास में एवं मृदुरोमश होते हैं। इनके खण्ड नलिका से बड़े या बराबर होते हैं। अन्तर्दल नलिका १-१.३ से० मी० तथा खण्ड ९-१२ रहते हैं। स्त्री केशर (Carpel) १, आयताकार या अण्डाकार, १.३ से० मी० लम्बा एवं काला होता है। रासायनिक संगठन-पुष्पों में एक उड़नशील तैल होता है। गुण और प्रयोग-इसके पत्ते तिक्त, कषाय, बल्य तथा दीपन होते हैं। इसके फल बल्य माने जाते हैं। श्वसनिकाओं में कफ जमा होने पर इसके पत्तों का स्वरस, मरिच, लहसुन तथा अन्य उत्तेजक औषधियों के साथ वामक औषध के रूप में देते हैं। संथाल लोग इसका प्रयोग मासिक विकारों में करते हैं। इसकी जड़ सर्पविष में लाभदायक मानी गई है। अथ वार्षिकी (बेला)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह श्रीपदी षट्पदानन्दा वार्षिकी मुक्तबन्धना ॥२५॥ वार्षिकी शीतला लघ्वी तिक्ता दोषत्रयापहा। कर्णाक्षिमुखरोगघ्नी तत्तैलं तद्गुणं स्मृतम् ।।२६।। वार्षिकी (बेला) के संस्कृत नाम-श्रीपदी, षट्पदानन्दा, वार्षिकी और मुक्तबन्धना ये सब हैं। वार्षिकी (बेला)- शीतल, लघु, तिक्तरसयुक्त एवम्-त्रिदोष, कान, नेत्र, मुख-सम्बन्धी समस्त रोग को दूर करने वाली होती है। तथा इसके तेल के भी ये ही सब गुण हैं। [२५-२६] ११. बेला हिं०-मोगरा, मोतिया, बेला। म०-मोगरा। ग०-डोलर, मोगरो। क०-मल्लिगे। ता०-अडुक्कु मल्लि । बं०-मोतिया। ले०-Jasminum sambac Ait. (जस्मिन्म् सम्बॅक्) । Fam. Oleaceae (ओलिएसी) । यह भारत में सभी स्थानों पर बागों में लगाया मिलता है। अन्य उष्ण प्रदेशों में भी यह होता है। इसका झाड़ीदार गुल्म होता है। नवीन शाखाएँ मृदुरोमश होती हैं। पत्ते-पतले, विपरीत, ३.८-११.५ × २.२- ६.३ से० मी०, विभिन्न आकार के, प्रायः अंडाकार, चिकने तथा ४-६ जोड़ी बगल की स्पष्ट शिराओं से युक्त होते हैं। पत्रनाल ३-६ मि० मि० लम्बा तथा रोमश, होता है। पुष्प-अत्यन्त सुगन्धित, श्वेत एकाकी अथवा ३ एक साथ रहते