भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६४६ भावप्रकाशनिघण्टुः **वारिपर्णी (जलकुम्भी) के नाम-**वारिपर्णी, कुम्भिका, वारिमूली, खमूलिका ये सब हैं। **जलकुम्भी-**शीतल, तिक्त तथा कटुरसयुक्त, स्वादिष्ट, पाक में लघु, दस्तावर, रूक्ष, त्रिदोषनाशक एवम्-रक्तविकार, ज्वर तथा शोष को उत्पन्न करने वाली है। **शैवाल (सेवार) के नाम-**शैवाल, जलनीली, शैवल और जलज ये सब हैं। **सेवार-**कषाय, तिक्त तथा मधुर रस युक्त, शीतल, लघु, स्निग्ध और दाह, तृषा, पित्त, रक्तविकार और ज्वर को अत्यन्त दूर करने वाला होता है। [१९-२१] **नोट-**मूल पाठ में श्री लाला शालिग्राम जी की टीका में इस प्रकार भेद है। "वारिपर्णी कुम्भिका स्याच्छैवालं शैवलञ्च तत्। वारिपर्णी हिमा तिक्ताज्वरहरं परम्।।" इससे ऐसा मालूम होता है कि कुम्भिका तथा शैवाल पर्यायवाची नाम हैं किन्तु आगे दोनों के गुण अलग-अलग दिये होने से यह संदेह दूर हो जाता है तथा उपर्युक्त पाठभेद गलत मालूम होता है। कुम्भिका तथा शैवाल, दो भिन्न द्रव्य हैं। अमरकोश में भी 'वारिपर्णी तु कुम्भिका' तथा 'जलनीली तु शैवालं शैवलः' दिया हुआ है। वारिपर्णी (कुम्भिका) के गुणों में 'शोणित ज्वर शोषकृत्' के स्थान पर हत् होना चाहिये। सभी टीकाकारों ने गुणों में लिखा है कि यह रक्तविकार, ज्वर तथा शोष में लाभदायक है। कुम्भिका से जलकुम्भी नामक द्रव्य लिया गया है। अन्य कुछ द्रव्यों के लिये भी यह नाम आता है। जलकुम्भी नाम चरक, सुश्रुत, रा० नि० तथा ध० नि० में नहीं मिलता। अधिकांश विद्वानों ने पिस्टिया स्ट्रेटिओटीस लिन. (Pistia stratiotes Linn.) को जलकुम्भी माना है। एक अन्य बड़ी जलकुम्भी भी पाई जाती है जो इचोर्निया क्रेसिपीस (Eichhornia crassipes Solms) है। यह विदेशी पौधा है जो संभवतः सौन्दर्य की दृष्टि से बागों आदि में लगाया जाने लगा है। इनका अलग-अलग वर्णन किया गया है। शैवाल के संबंध में जलकुम्भी के वर्णन के पश्चात् विवेचन किया गया है। ५. जलकुम्भी (वारिपर्णी) (१) **हिं०-**कुम्भी, जलकुम्भी। **बं०-**टोका पाना। **म०-**प्रश्नी, गोंडाल, शेर्र्बल। **गु०-**जल शंखलां। ता०- आकाश तामरै। **अं०-**The wester-Lettuce (दी वेस्टेर लेट्यूस)। ले०-Pistia stratiotes Linn. (पिस्टिया स्ट्रेटिओटीस)। Fam. Araceae (एरेसी)। यह समस्त भारत में, तालाबों तथा गढ़ों में जहाँ जल जमा रहता है, पायी जाती है। इसके **क्षुप-**जलाशयों के ऊपर तैरते रहते हैं। देखने में छोटी गोभी जैसे दिखलाई देते हैं। **पत्ते-**विनाल, मांसल, १-३" लम्बे, अभिलट्वाकार, चक्राकार गुच्छों में आते हैं। **पुष्पव्यूह-**पीले या श्वेत पत्रावरण से आवृत होता है। **मूल-**मूल से डोरे-डोरे जैसे कई उपमूल निकले रहते हैं। इसके पंचांग, पत्ते, मूल तथा इसकी राख का उपयोग किया जाता है। **रासायनिक संगठन-**इसमें ३१% राख होती है जिसमें से जल में घुलनशील क्षार ६% होते हैं। क्षार में पोटेशियम् क्लोराइड ७३% तथा पोटेशियम सल्फेट २२% होता है। **गुण और प्रयोग-**यह शीतल, मूत्रजनन, आनुलोमिक एवं कास शामक है। इसकी गंध से खटमल मरते हैं। इसका प्रयोग मूत्रकृच्छ्र, अर्श, गलगण्ड एवं चर्म रोग में किया जाता है। (१) मूत्रकृच्छ्र में इसके पत्तों का क्वाथ पिलाते हैं तथा पीसकर पेड़ू पर बाँधते हैं। (२) अर्श पर पत्तों को पीस गरम कर बाँधते हैं। (३) सर की दाद पर इसकी राख लगाते हैं। चर्मरोगों में इसके स्वरस से बना गरी का तेल लगाते हैं।