भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 708

पुष्पवर्गः ६५७ अथ मल्लिका। तस्या नामानि गुणाँश्चाह मल्लिका मदयन्ती च शीतभीरुश्च भूपदी ।।३९।। मल्लिकोष्णा लघुर्वृष्या तिक्ता च कटुका हरेत् । वातपित्तास्यदृग्गव्याधिकुष्ठारुचिविषव्रणान् ।।४०।। मल्लिका (बेला, मोतिया) के संस्कृत नाम—मल्लिका, मदयन्ती, शीतभीरु, भूपदी ये सब हैं। मल्लिका— उष्ण, लघु वृष्य, तिक्त तथा कटु रसयुक्त एवम्—वात, पित्त, मुख-नेत्र-सम्बन्धी रोग, कुष्ठ, अरुचि, विष तथा व्रण को दूर करने वाली है। [३९-४०] १८. मल्लिका यह जस्मिनम् सम्बॅक् (Jasminum sambac) की ही एक जाति (Variety) है जिसका वर्णन बेला (वार्षिकी) के अन्तर्गत (पृष्ठ ४९०) किया जा चुका है। गुण की दृष्टि से यह उससे कुछ समान ही है किन्तु इसे भा० प्र० उष्णवीर्य एवं वार्षिकी को शीतवीर्य मानते हैं। अथ माधवी (वासन्ती) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह माधवी स्यात्तु वासन्ती पुण्ड्रको मण्डकोऽपि च । अतिमुक्तो विमुक्तश्च कामुको भ्रमरोत्सवः ।। माधवी मधुरा शीता लघ्वी दोषत्रयापहा ।।४१।। माधवी के संस्कृत नाम—माधवी, वासन्ती, पुण्ड्रक, मण्डक, अतिमुक्त, विमुक्त, कामुक, भ्रमरोत्सव ये सब हैं। माधवी—मधुर रसयुक्त, शीतल, लघु तथा त्रिदोषनाशक है। [४१] १९. माधवी हिं०—माधवी। बं०—माधवी लता। म०—मधु मालती, हलदबेल। गु०—रगतपीती, माधवी लता। ता०— अडिगम। ते०—माधवतोगे। अं०—Clustered Hiptage (क्लस्टर्ड हिप्टेज)। ले०—Hiptage madablota Gaertn. (हिप्टेज मेडेब्लोटा)। Fam. Malpi-ghiaceae (मॅल्पिघिएसी)। यह दक्षिण, सिवालिक, कुमाऊँ, पूर्वीबंगाल, आसाम, नेपाल तथा अंडमान में होती है एवं बागों में भी यह लगाई जाती है। इसकी लता—बहुत विस्तार में फैलने वाली होती है और निकटवर्ती वृक्ष पर चढ़ कर उसको ढँक देती है। इसका स्तम्भ—मजबूत होता है और शाखाएँ मोटी होती हैं। पत्ते—अंडाकार, लट्वाकार-आयताकार या आयताकार-प्रासवत्, श्वेत तथा सुगंधित रहते हैं। आभ्यंतर दल झालरदार रहते हैं जिनमें से एक दल पीला रहता है। प्रत्येक स्त्री केशर में एक बड़ा और दो छोटे पक्ष (Wing) होते हैं। इसकी छाल तथा पत्तों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें हिप्टेजिन (Hiptagin) नामक एक ग्लूकोसाइड पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके पत्ते कुष्ठघ्न हैं। त्वचा के रोगों में पत्तों को पीसकर लगाया जाता है। खुजली (Scabies) में यह लाभदायक है। इसकी छाल कड़वी तथा सुगंधित है तथा इसका जीर्ण आमवात तथा श्वास में उपयोग किया जाता है। कमर पतली करने के लिए जड़ को मट्ठे के साथ पिलाना चाहिये। (चक्रदत्त) ४५ भाव.I