भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६५८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ केतकः सुवर्णकेतकी च (केवड़ा-पीला केवड़ा) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह केतकः सूचिकापुष्पो जम्बुकः क्रकचच्छदः । सुवर्णकेतकी त्वन्या लघुपुष्पा सुगन्धिनी ।।४२।। केतकः कटुकः स्वादुर्लघुस्तिक्तः कफापहः । उष्णा तिक्तरसा ज्ञेया चक्षुष्या हेमकेतकी ।।४३।। २०. केवड़ा हिं०-केवड़ा। बं०-केया। म०-केवड़ा। गु०-केवड़ो। ते०-मुगलीपुवु। ता०-ताल है। क०-केदगे। फा०-गुलकेरी। अ०-कादी। अं०-Screw Pine (स्क्रू पाइन)। ले०-Pandanus odoratissimus Roxb. (पेण्डेनस ओडोरेटिसिमस्) । Fam. Pandanaceae (पेण्डेनेसी) । भारतीय प्रायद्वीप के दोनों तरफ समुद्री किनारों तथा अंडमान में यह पाया जाता है। सभी स्थानों में बागों में लगाया हुआ भी मिलता है। इसका गुल्म या छोटा वृक्ष करीब १०-१२ फीट ऊँचा होता है। काण्ड से वायवीयमूल निकल कर उसे सहारा देते हुए जमीन में घुसे रहते हैं। पत्ते-सघन, चमकीले, हरे, तलवार की तरह, ३-७ फीट तक लम्बे, पतले तथा किनारों . एवं मध्यशिरा पर तीक्ष्ण काँटों से युक्त होते हैं। पुष्प-पत्रावृत अवृन्त-काण्डज व्यूह (Spadix) में आते हैं जिनके पत्रकोश (Spathe) सुगन्धित तथा श्वेतवर्ण के होते हैं। पुं० पुष्प एवं स्त्री पुष्प भिन्न-भिन्न वृक्षों पर होते हैं। पुं० पुष्प व्यूह में कई गुच्छ ५-१० x २.५ - ३.८ से० मी० बड़े रहते हैं किन्तु स्त्रीपुष्प व्यूह में एक ही गुच्छ, ५ से० मी० व्यास का रहता है। फल-गोल या आयताकार, १५-२५ से० मी० लम्बा चौड़ा, पीत या रक्तवर्ण का हाता है। वर्षा ऋतु में पुष्प एवं शरद् ऋतु में फल आते हैं। भावप्रकाशकार इसके दो भेद मानते हैं। (१) केतक तथा (२) सुवर्ण केतकी। सुवर्णकेतकी के पुष्प कुछ छोटे, स्वर्ण वर्ण के तथा अधिक सुगन्धि वाले माने जाते हैं। आधुनिक राक्सवर्ग जैसे वैज्ञानिकों का मत है कि सुगन्ध पुं० पुष्प में अधिक होती है। पेण्डेनस की ऐसी भी कुछ जातियाँ (Species) पाई जाती हैं जिनके पत्तों में काँटे नहीं होते। इसके पुष्प एवं पत्तों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पुष्पों में ०.१-०.३% सुगन्धित तैल होता है। गुण और प्रयोग-यह सौमनस्यजनन, हृद्य, मस्तिष्क को बल देने वाला, दुर्गन्ध हर एवं कफनाशक है। (१) इसका अर्क ज्वर में देने से पसीना आकर ताजगी मालूम पड़ती है। (२) इसके तेल की मालिश से शिरःशूल, कटिशूल एवं आमवातादि में लाभ होता है। (३) चर्मरोगों में पत्तों का उपयोग किया जाता है। (४) गुल्म में इसके क्षार का प्रयोग किया जाता है। (सुश्रुत) मात्रा-अर्क ४-६ तोला; शर्बत २-४ तोला। अथ किङ्किरातः (गौडादौ प्रसिद्धः) तस्य नामानि गुणाँश्चाह किङ्किरातो हेमगौरः पीतकः पीतभद्रकः ।।४४।। किङ्किरातो हिमस्तिक्तः कषायश्च हरेदसौ। कफपित्तपिपासाऽस्रदाहशोषवमिक्रिमीन् ।।४५।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA