भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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किङ्किरात (यह गौड़ आदि देशों में प्रसिद्ध है) के संस्कृत-नाम-किङ्किरात, हेमगौर, पीतक, पीतभद्रक ये सब हैं। किङ्किरात-तिक्त तथा कषाय रस युक्त, शीतल तथा कफ, पित्त, प्यास, रक्तविकार, दाह, शोष, वमन तथा क्रिमि को दूर करता है। [४४-४५] २१. किंकिरात आगे वटादिवर्ग में बब्बूल (किंकिरात) का वर्णन आया है। या तो इसके फूलों के महत्त्व को बतलाने के लिए इसका यहाँ स्वतंत्र वर्णन किया गया हो या यह बब्बूल का कोई भेद हो। पीले पुष्प की कटसरैया को भी कुछ विद्वान् किंकिरात मानते हैं। दक्षिण की तरफ एक बब्बूल की जाति का छोटा वृक्ष म०-देववाभूल, ले०-Acacia latromun Willd. (अकेसिया लेट़्रोमन); Fam. Leguminosae (लेग्यु-मिनोसी) पाया जाता है। यदि बब्बूल से भिन्न किंकिरात हो तो इसके होने की संभावना है। यह छोटा सा वृक्ष होता है जिसका ऊपर का भाग पुराने वृक्षों में छत्र की तरह फैल जाता है। इसमें पुष्प सफेद आते हैं जो बाद में पीले हो जाते हैं। पागल कुत्ते के काटने पर इसकी ताजी जड़, ४ तोले की मात्रा में ठंडे जल में पीस कर ७ दिन पिलाते हैं। अथ कर्णिकारः ("पांगारा" इति महाराष्ट्रे प्रसिद्धः) तस्य नामानि गुणाँश्चाह कर्णिकारः कटुस्तिक्तस्तुवरो शोधनो लघुः । रञ्जनः सुखदः शोथश्लेष्मास्रव्रणकुष्ठजित् ।।४६।। कर्णिकार (यह "पांगारा" इस नाम से महाराष्ट्र में प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-कर्णिकार, परिव्याध, पादपोत्पल ये सब हैं। कर्णिकार-कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, कोष्ठशोधक, लघु रंग देने वाला, सुख पहुँचाने वाला, एवम्-शोथ, कफ, रक्तविकार, व्रण और कुष्ठ को दूर करने वाला है। [४६] २२. कर्णिकार कर्णिकार क्या है इस संबन्ध में कुछ मतभेद हैं। हरीतक्यादि वर्ग में (पृ० ६८) आरग्वध के पर्याय में कर्णिकार शब्द आया है। जैसे बब्बूल का पर्याय किंकिरात होते हुए भी उसके पुष्पों के महत्त्व की दृष्टि से उसका दो स्थानों पर स्वतंत्र वर्णन किया है वैसे ही संभवतः इसका यहाँ फिर से वर्णन किया गया है। ध० नि० ने कर्णिकार को आरग्वध भेद माना है। 'पांगारा', इति महाराष्ट्रे प्रसिद्धः' यह जो प्रारंभ में दिया हुआ है वह उचित नहीं मालूम पड़ता। मराठी में पांगारा यह पारिभद्र, Erythrina indica (एरिश्रिना इण्डिका) का नाम है जिसका पहले वर्णन (पृ० ३३४) किया जा चुका है। कुछ विद्वानों ने उलटकंबल, Abroma augusta (एब्रोमा ऑगस्टा) को कर्णिकार माना है। कुछ ने बं०- कनकचम्पा, Pterospermum acerifolium (टेरोस्पर्मम् एसेरिफोलियम्) को कर्णिकार माना है किन्तु यह तो मुचकुंद है। मुचकुंद के लिये गलती से लोगों ने Pterospermum suberifolium (टे० सुबेरिफोलियम्) नाम लिखा है।¹ मुचकुंद का आगे स्वतंत्र वर्णन आया हुआ है। अथाशोकः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह अशोको हेमपुष्पश्च वञ्जुलस्ताम्रपल्लवः । कङ्केलिः पिण्डपुष्पश्च गन्धपुष्पो नटस्तथा ।।४७।। १. श्री ठा० बलवन्तसिंह-बिहार की वनस्पतियाँ, पृ. १७