भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६० भावप्रकाशनिघण्टुः अशोकः शीतलस्तिक्तो ग्राही वर्ण्यः कषायकः । दोषापचीत्पादाहकृमिशोषविषास्रजित् १ ॥४८॥ अशोक के संस्कृत नाम-अशोक, हेमपुष्प, वञ्जुल, ताम्रपल्लव, कङ्केलि, पिण्डपुष्प, गन्धपुष्प, नट ये सब हैं । अशोक-तिक्त तथा कषाय रस युक्त, शीतल, ग्राही, शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला एवम् वातादिदोष, अपची, तृषा, दाह, क्रिमि, शोष, विष और रक्तविकार को दूर करने वाला है । [४७-४८] नोट-यद्यपि अशोक वृक्ष, Saraca indica Linn. (साराका इण्डिका) है तथापि कहीं-कहीं Polyalthia longifolia (पॉलिएल्थिया लौंगिफोलिया) को गलती से लोग अशोक मानते हैं । असली अशोक का उपयोग रक्तप्रदर आदि गर्भाशय के विकारों में बहुत प्रचलित हैं किन्तु इस गुण का उल्लेख चरक, सुश्रुत, भा० प्र०, रा० नि०, ध० नि०, में देखने में नहीं आता । सुश्रुत में लोध्रादिगण में इसका पाठ है जिसमें ये द्रव्य योनिदोषों में उपयोगी बतलाये गये हैं । चरक में वेदनास्थापनगण एवं कषायस्कंध में उल्लेख है । वृन्द ने प्रथम रक्तप्रदर में इसका उपयोग किया है । यहाँ प्रथम असली अशोक का तथा बाद में दूसरे अशोक का संक्षेप में वर्णन किया है । २३. अशोक (१), असली अशोक हि०-अशोक । बं०-असोक । म०, गु०-अशोक । क०-अशोक । ता०-अचोकम् । ले०-Saraca indica Linn. (सराका इण्डिका) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह मध्य और पूर्वी हिमालय, पूर्व बंगाल और दक्षिण भारत में पाया जाता है तथा अनेक प्रकार की वाटिकाओं में भी देखने में आता है । बंगाल में इसका अधिक आदर है और प्रायः वहाँ के सब वाटिकाओं में देखा जाता है । इसका वृक्ष-बड़ा, सीधा और झोपड़ाकार होता है तथा यह बारहो मास हरा-भरा दिखाई पड़ता है । लकड़ी- हलकी, किंचित् लाली युक्त भूरे रंग की होती है । पत्ते-सम-पक्षवत् एवं पत्रक-पतली-पतली टहनियों पर ३ से ६ जोड़े रहते हैं और वे ३ से ९ इञ्च तक लम्बे, आयताकार या आयताकार प्रासवत्, चिकने, तीक्ष्ण या लम्बाग्र एवं चर्मल होते हैं । नई-नई टहनियाँ नीचे की ओर झुकी हुई रहती है और उनके पत्ते अत्यन्त कोमल, एक दूसरे से सटे हुए, तांबे के रंग के लाल मनोहर दिखाई पड़ते हैं । इसीलिए इसको ताम्रपल्लव कहते हैं । वसन्त ऋतु में इस पर फूल तथा शरद् में फल आते हैं । पुष्प-सघन गुच्छों में आते हैं और वे नारंगी रंग से लेकर अत्यन्त रक्तवर्ण तक परम सुहावने होते हैं । इसमें कोण पुष्पक एवं बाह्यदल रंगीन होते हैं । बाह्यदल ४ तथा आयताकार होते हैं । आभ्यंतरदल नहीं रहते । पुंकेशर ७-८, करीब १ इञ्च लम्बे एवं गहरे लाल रंग के होते हैं । फलियाँ-६ से १० इञ्च तक लम्बी, चिपटी, १ से १।। इञ्च चौड़ी तथा दोनों सिरों पर कुछ-कुछ टेढ़ी होती हैं । प्रत्येक फली में ४ से ८ तक बीज रहते हैं । बीज-१