भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 712, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुष्पवर्गः ६६१ इसका उपयोग रक्तप्रदर-कष्टार्तव, श्वेतप्रदर, रक्तार्श, रक्तातिसार एवं गर्भाशय के विकारो में किया जाता है। अर्गट की तरह सभी प्रकार के रक्तप्रदर में इसका प्रयोग किया जा सकता है। (१) रक्तप्रदर में इसकी छाल का क्षीरपाक करके सुबह पिलाते हैं। (चक्रदत्त) मात्रा-१ से २ तोला (क्षीरपाक करके)। २४. अशोक (२) हिं०-अशोक असोक, देवदारु। बं०-देव दारु। म०-अशोक। ते०-असोकमु। क०-पुत्रजीवी। ले०- Polyalthia longifolia Benth. & Hook. f. (पॉलीएलथिया लौंगी फोलिया)। Fam. Annonaceae (अन्नोनेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है, विशेष कर सड़कों के किनारे देखने में आता है। इसे वाटिकाओं में भी लगाते हैं। इसका वृक्ष-सीधा खड़ा होता है। शाखाएँ-सघन नहीं होतीं। पतली-पतली टहनियों पर पत्ते विषमवर्ती रहते हैं। छाल-पतली और लकड़ी-किंचित् पीलापन युक्त सफेद होती है। पत्ते-६ से ९ इञ्च तक लम्बे, किंचित् अंडाकार, मालाकार, लहरदार धारवाले और चमकीले होते हैं। फूल-हरापन युक्त पीले रंग के अथवा पीलापन युक्त सफेद रंग के आते हैं। फल-जामुन के समान गोल होते हैं। कच्ची अवस्था में नीले रंग के और पकने पर लाल हो जाते हैं। गुण और प्रयोग-गलती से इसकी छाल का कहीं-कहीं असली अशोक के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। यह ज्वरनाशक होती है। अथाम्लाटनः (बाणपुष्प इति गौडादौ प्रसिद्धः) तस्य नामानि गुणाँश्चाह अम्लातोऽम्लाटनः प्रोक्तस्तथाऽम्लातक इत्यपि ।।४९।। कुरण्टको वर्णपुष्पः स एवोक्तो महासहः। अम्लाटनः कषायोष्णः स्निग्धः स्वादुश्च तिक्तकः ।।५०।। अम्लाटन (यह "बाणपुष्प" के नाम से गौड़ आदि देशों में प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-अम्लात, अम्लाटन, अम्लातक, कुरण्टक, वर्णपुष्प, महासह ये सब हैं। अम्लाटन-कषाय तथा तिक्तरस युक्त, उष्ण, स्निग्ध एवम् स्वादिष्ट है। [४९-५०] २५. बाणपुष्प इसके संस्कृत पर्याय-अम्लात, अम्लाटन, अम्लातक, कुरण्टक आदि कटसरैया के बोधक हैं। इसलिये बाणपुष्प, कटसरैये का ही कोई भेद मालूम पड़ता है। [२५] अथ सैरेयकः (कटसरैया) तस्य नामानि भेदान् गुणाँश्चाह सैरेयकः श्वेतपुष्पः सैरेयः कटसारिका। सहाचरः सहचरः स च भिन्द्यापि कथ्यते ।।५१।। कुरण्टकोऽन्नपीते स्याद्रक्त कुरबकः स्मृतः। नीले बाणा द्वयोरोक्तो दासी चार्त्तगलश्च सः ।।५२।। सैरेयः कुष्ठवातास्रकफकण्डूविषापहः। तिक्तोष्णो मधुरोऽनम्लः १सुस्निग्धः केशरञ्जनः ।।५३।। सफेद फूलवाली कटसरैया के संस्कृत नाम-सैरेयक, श्वेतपुष्पसैरेयक, सैरेय, कटसारिका, सहाचर, सहचर, भिन्दी ये सब हैं। पीले फूल वाली कटसरैया का संस्कृत नाम-कुरण्टक है। लाल फूलवाली का संस्कृत १. दन्त्यः इति पाठा०।