भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 713, कुल 1167 में से

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६६२ भावप्रकाशनिघण्टुः नाम—कुरबक है। नीले फूलवाली कटसरैया के संस्कृत नाम—बाणा, बाण, (बाण शब्द पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग दोनों में है), दासी, आर्तगल ये सब हैं। कटसरैया—तिक्त, मधुर तथा किञ्चित् अम्लरस युक्त, उष्ण, अतिस्निग्ध, केशों को रंगनेवाली होती है तथा कुष्ठ, वातरक्त, कफ, खुजली एवं विष का नाश करती है। नोट—सैरेयक के पुष्पों के आधार पर विभिन्न भेद किये हुए हैं। ये सब Barleria (बार्लेरिया) की विभिन्न जातियाँ हैं जिनके साधारण स्वरूप में साम्यता रहती है। यहाँ वानस्पतिक वर्णन केवल पीत का किया गया है। गुणकर्म भी सब के प्रायः समान ही होने से एक साथ ही सबका वर्णन किया गया है। निम्नलिखित भेदों का उल्लेख निघण्टुओं ने किया है। (१) श्वेत पुष्प—सहचर, Barleria cristata Linn. (बार्लेरिया क्रिस्टेटा) । (२) पीत " —कुरंटक, " prionitis " ( " प्रियोनाइटिस्) । (३) रक्त " —कुरबक, " cristata " ( " क्रिस्टेटा) । (४) नील " —दासी, आर्तगल, बाण, B. strigosa Willd. (बार्लेरिया स्ट्राइगोसा) । B. cristata (बा. क्रिस्टेटा) में स्थानभेद से पुष्प वर्ण तथा पत्रादि में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती हैं। इसमें श्वेत तथा गुलाबी दोनों प्रकार के फूल पाये जाते हैं। हिमालय पर होने वाले पौधों में जामुनी नील वर्ण के पुष्प होते हैं। बार्लेरिया की अन्य अनेक जातियाँ भी पाई जाती हैं जिन्हें बागों में शोभा के लिए भी लगाते हैं। २६. कटसरैया हिं०-कटसरैया, पियाबाँसा। बं०-कांट्राजाती। म०-कोरांटी। गु०-पीलो कांटारीयो। ले०-Barleria prionitis Linn. (बार्लेरिया प्रियोनाइटिस्) । Fam. Acanthaceae (अॅकेन्थेसी) । कटसरैया सभी उष्ण प्रान्तों में पाई जाती है तथा बागों में भी लगाई जाती है। इसका क्षुप-झाड़दार, काँटेदार तथा २ से ५ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते—१.५ से ४ इञ्च लम्बे, कण्टकित अग्रयुक्त, अंडाकार (शाखाओं में आयताकार-प्रासवत), विपरीत तथा अखण्डतट वाले हैं। डोडी—१ इञ्च लम्बी होती है जिनमें दो चिपटे बीज पाये जाते हैं। कटसरैया के पत्र एवं मूल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-पीत सैरेयक में एक क्षाराभ पाया गया है तथा इसमें पोटेशियम् (Potassium) काफी रहता है। गुण और प्रयोग-सैरेयक, तिक्त, अम्ल, उष्ण, कफनिःसारक, कुछ स्वेदजनक, शोथहर, व्रणरोपण, विषघ्न एवं केशरंजक है। इसका उपयोग कास, शोथ, दंतशोथ, चर्मरोग एवं चूहे के विष में किया जाता है। (१) बच्चों के कफयुक्त खाँसी में इसके पत्तों का स्वरस मधु या शर्करा मिलाकर देते हैं। शुष्क कास में सूखी हुई छाल का चूर्ण चटाते हैं। (२) जलशोथ (Anasarca) में मूल की ताजी छाल या पंचांग की राख खांड के साथ देते हैं। (३) चूहे के विष में मूल को मधु तथा चावल को धोवन के साथ देते हैं। (वाग्भट उ० ३८)। (४) दाँत हिलते हों तो नील सैरेयक के पत्तों के कषाय से गण्डूष कराते हैं (चक्र); दंतशूल में नमक के साथ पत्तों का लेप मसूड़ों पर करते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA

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