भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५६ भावप्रकाशनिघण्टुः कदम्ब का वृक्ष-४०-५० फीट ऊँचा, बड़ा और छायादार होता है। पत्ते-महुवे के पत्तों के समान लम्बाई युक्त अण्डाकार, ५-९ इञ्च लम्बे होते हैं। इन पर सिरायें बहुत स्पष्ट होती हैं। पुष्प गुच्छ १-२ इञ्च के घेरे में, गोलाकार नारंगी रंग के अनेक पुष्पगुच्छ होते हैं और उनसे विशेष कर रात्रि में सुगन्धि आती है। फल-कच्चे में हरे और पकने पर फीके नारंगी रंग के, १-१॥ इञ्च व्यास में, गोल तथा मधुराम्ल होते हैं। चिकित्सा में फल तथा छाल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में राख १०% रहती है जिसमें चूना रहता है। इसमें का प्रधान तत्त्व सिन्कोटैनिक अम्ल (Cinchotannic acid) की तरह है तथा इसकी छाल का रंग भी सिंकोना में के लाल द्रव्य की तरह है। इसमें का क्षाराभ हृदयावसादक है। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक, शीतवीर्य, ज्वरघ्न, मूत्र स्तंभन (Antidiuretic), व्रणरोपण, शुक्रशोधन, वेदनास्थापन एवं विषघ्न है। इसका प्रयोग ज्वर, रक्तातिसार, मूत्रकृच्छ्र, मूत्रदोष एवं मुखपाक में किया जाता है। (१) इसकी छाल का रस, जीरा एवं मिश्री के साथ बच्चों के ज्वर, वमन एवं अतिसार में दिया जाता है। (२) नेत्राभिष्यंद में अन्य औषधियों के साथ इसका रस पलकों पर लगाते हैं। (३) मुखपाक में छाल का या पत्तों का कषाय गण्डूष के लिए दिया जाता है। (४) फल का रस ज्वरजन्य पिपासा में उपयोगी मानते हैं। मात्रा-त्वक् ५-१० रत्ती। अथ कुब्जकः (कूजा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुब्जको भद्रतरुणी वृत्तपुष्पोऽतिकेसरः। महासहा कण्टकाढ्या नीलालिकुलसंकुला ।। ३७ ।। कुब्जकः सुरभिः स्वादुः कषायानुरसः सरः। त्रिदोषशमनो वृष्यः शीतहर्त्ता च स स्मृतः ।। ३८ ।। कूजा के संस्कृत नाम-कुब्जक, भद्रतरुणी, वृत्तपुष्प, अतिकेसर, महासहा, कण्टकाढ्या, नीलालिकुलसंकुला ये सब हैं। कूजा-सुगन्धयुक्त, आरम्भ में मधुर, अन्त में कषाय रसयुक्त, सारक, त्रिदोषनाशक, वृष्य (वीर्यवर्धक) और शीत को दूर करने वाला है। [३७-३८] १७. कूजा हिं०-कूजा, कुजई। बं०-कूजा। ले०-Rosa moschata Herrm (रोजा मॉस्केटा)। Fam. Rosaceae (रोज़ेसी)। यह मध्य तथा पश्चिम हिमालय के साधारण उष्ण प्रदेशों में मुरी से नेपाल तक २ हजार से ११ हजार फीट तक होता है। गुलाब की जाति की यह इतस्ततः फैलने वाली विस्तृत लता होती है। काण्ड-५" तक मोटे तथा ५० फीट तक ऊँचे होते हैं। काँटे भूरे रंग के होते हैं। पत्ते-संयुक्त, २"-६" लम्बे एवं वृन्त पर काँटे होते हैं। पत्रक-संख्या में ५-९, अंडाकार, तीक्ष्णाग्र, दन्तुर, १-३" लम्बे एवं अधर पृष्ठ पर मृदुरोमश होते हैं। पुष्प-श्वेत, सुगंधित, १- १.५" व्यास में एवं इनके वृन्त पर काँटे नहीं होते। फल-नारंगी, रक्त या हलके लाल रंग के, गोल या अंडाकार एवं व्यास में ०.३-०.६" रहते हैं। पुष्पकाल अप्रिल से जून एवं फलोद्भव अक्तूबर से फरवरी तक। गुण और प्रयोग-यह सारक, त्रिदोषघ्न तथा वृष्य है। इसका प्रयोग पैत्तिक विकार, दाह एवं नेत्र रोगों में किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA