भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्पवर्गः ६५५ पत्ते—जामुन के पत्तों के समान ३।। इञ्च लम्बे, १।।। इञ्च चौड़े, नोकदार एवं किनारों पर लहरदार तथा पौन इञ्च दण्ड से युक्त होते हैं । फूल—सफेद, लगभग एक इञ्च गोल चक्राकार होते हैं और उनसे अत्यन्त सुगन्धि आती है जो इनके सूखने पर भी चिरकाल तक बनी रहती है। फल—किञ्चित् लम्बाई लिये गोल, पौन इञ्च से १ इञ्च लम्बे, ऊपर से साफ, कच्ची अवस्था में हरे रंग के और पकने पर पीले एवं कषाय मधुर हो जाते हैं जिनमें एक बड़ा बीज रहता है। ग्रीष्म से शरद तक यह फूलता है तथा बाद में फलता है। इसकी छाल, फल तथा पुष्पों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—बीजों में सैपोनिन एवं एक तैल होता है। छाल में कषाय द्रव्य, रबर सदृश पदार्थ, मोम, रंजक द्रव्य, स्टार्च एवं राख होती है। फूलों में उड़नशील तैल होता है। फल में शर्करा होती है। गुण और प्रयोग—इसकी छाल कषाय एवं पौष्टिक है। फल संग्राहक एवं स्नेहन हैं। (१) दाँत हिलते हों या अन्य दन्त विकारों में इसका बहुत उपयोग किया जाता है। इससे दतुअन करते हैं। छाल को या कच्चे फलों को चबाने को देते हैं। छाल के क्वाथ से गण्डूष भी कराते हैं। इससे अत्यधिक लालास्राव में भी लाभ होता है। बीजों से भी लाभ होता है। (२) छाल का क्वाथ जीर्ण ज्वर में पौष्टिक रूप में देते हैं। (३) सूखे फूलों का नस्य शिरःशूल में दिया जाता है। (४) पुरानी आँव में पके फल खिलाते हैं। अथ कदम्बः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कदम्बः प्रियको नीपो वृक्षपुष्पो हलिप्रियः । कदम्बो मधुरः शीतः कषायो लवणो गुरुः ।। सरो विष्टम्भकृद्रूक्षः कफस्तन्यानिलप्रदः ।।३६।। कदम्ब के संस्कृत नाम—कदम्ब, प्रियक, नीप, वृत्तपुष्प और हलिप्रिय ये सब हैं। कदम्ब—मधुर, कषाय तथा लवण रस युक्त, शीतल, गुरु, सारक, रूक्ष, वातविष्टम्भ (वायु का न खुलना) को उत्पन्न करने वाला, कफकारक, दुग्धवर्धक और वायुजनक होता है। [१६] नोट—अन्य निघंटुओं ने इसके कई भेदों का उल्लेख किया है। इनके विभिन्न पर्यायों में से धारकदंब, धूलिकदंब, भूकदंब, राजकदंब एवं नीप मुख्य हैं। इनमें से संभवतः कुछ एक-दूसरे के पर्याय हैं तथा कुछ भेद हैं। सुप्रसिद्ध कदंब वृक्ष तो राजकदंब मालूम पड़ता है जिसका विस्तार से नीचे वर्णन् किया गया है। संभवतः इसे ही नीप कहा गया है। भूकदंब तो मुण्डी है जिसका पहले (पृ० ४१३) वर्णन आ चुका है। कदंब के ही वर्ग के कुछ उससे मिलते-जुलते दो अन्य वृक्ष, ले०—Mytragyna parvifolia Korth (मिट्रागाइना पार्विफोलिया), हिं०—करम, कैमा एवं ले०— Adina cordifolia Benth. & Hook. f. (एडिना कॉर्डिफोलिया), हिं०—जातकदम, हलदू, सं०—हरिद्रु, आसा०—केलिकदंब पाये जाते हैं जो संभवतरूः उपर्युक्त भेदों में से हैं। इनमें से प्रथम धारा कदंब एवं द्वितीय धूलिकदंब हो सकता है। १६. कदम हिं०—कदम, कदम्ब । बं०—कदम । म०—कलम्ब । गु०—कदम्ब । क०—कड़वा ते०—कदंबमु । ता०— येल्लह कदम्ब । ले०—Anthocephalus cadamba Miq. (एंथोसिफेलस् कदम्ब) । Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। यह हिमालय के निचले भागों में नेपाल से पूर्व की तरफ वर्मा तक तथा दक्षिण में उत्तरी सरकार तथा पश्चिमी घाट में होता है। सभी स्थानों पर बागों में लगाया हुआ भी पाया जाता है।