भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 705, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 705

६५४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका प्रयोग ज्वर, चर्मरोग, उपदंश, शोथ तथा आर्तव विकारों में करते हैं । (१) विषम ज्वर में इसका फांट पिलाते हैं । (२) उपदंश की द्वितीयावस्था में त्वचा के विकार या सन्धि में विकृति होने पर इसकी छाल का प्रयोग करते हैं । (३) मूल की छाल अनार्तव में दी जाती है । व्रणशोथ पर इसे दही में पीसकर लगाते हैं । (४) सोजाक में पुष्पों का फांट पिलाने से जलन कम होती है । (५) तिल के तेल में पुष्पों को पीसकर शिरःशूल, अक्षि पीड़ा, चक्कर आदि में सर पर बाँधते हैं । (७) पत्तों का रस शहद के साथ उदरशूल में देते हैं । मात्रा-त्वक् चूर्ण ५-१५ रत्ती । अथ बकुलः ("मौलसिरी" इति लोके) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह बकुलो मधुगन्धश्च सिंहकेसरकस्तथा । बकुलस्तुवरोऽनुष्णः कटुपाकरसो गुरुः ।। कफपित्तविषश्वित्रकृमिदन्तरुदापहः ॥३३॥ मौलसिरी के संस्कृत नाम-बकुल, मधुगन्ध, सिंहकेसरक ये सब हैं । मौलसिरी-कषायरसयुक्त, किञ्चित् उष्ण, पाक तथा रस में कटु, गुरु, एवम्-कफ, पित्त, विष, श्वेतकुष्ठ कृमि एवं दाँतों के रोगों को दूर करने वाला है। [३३] अथ बृहद्बकुलः (बड़ी मौलसिरी) । तस्य नामगुणानाह शिवमल्ली पाशुपत एकाष्ठीलो वको वसुः ।।३४।। वकोऽनुष्णः कटुस्तिक्तः कफपित्तविषापहः । योनिशूलतृषादाहकुष्ठशोथास्रनाशनः ॥३५॥ बड़ी मौलसिरी के संस्कृत नाम-शिवमल्ली, पाशुपत, एकाष्ठील, वक, वसु ये सब हैं । बड़ी मौलसिरी- किञ्चित् उष्ण, कटु तथा तिक्त रसयुक्त एवम्-कफ, पित्त, विष, योनिशूल, तृषा, दाह, कुष्ठ, शोथ और रक्तविकार को दूर करने वाली है । [३४-३५] नोट-भावप्रकाशकार बकुल की दो जातियों का उल्लेख करते हैं जिनमें बड़ी को शिवमल्ली, पाशुपत, एकाष्ठील, वक एवं वसु कहा गया है । वक नाम होने से इसे कुछ अगस्त मानते हैं किन्तु अगस्त का स्वतंत्र वर्णन आगे आया हुआ है । वानस्पतिक दृष्टि से बकुल की कोई भिन्न जाति (Species) का उल्लेख नहीं पाया जाता । संभव है केवल स्थानादि भेद से कहीं-कहीं बड़े आकार के वृक्ष हो जाते हों जिन्हें बृहद् बकुल कहा गया हो । १५. मौलसिरी हिं०-मौलसिरी । बं०-बकुल । म०-बकुल, ओवली । गु०-बोलसरी । क०-बकुल । ते०-पोगड । ता०- मगिलम । ले०-Mimusops elengi Linn. (मिम्युसोप्स एलेन्गी) । Fam. Sapotaceae (सेपोटेंसी) । शोभा तथा सुगंध के लिए यह सभी जगह बागों में लगाया हुआ पाया जाता है । दक्षिण तथा अंडमान में अधिक होता है । इसके वृक्ष-५० फीट तक ऊँचे, सघन, चिकने पत्तों से युक्त, झोपड़ाकार और सुहावने दिखाई पड़ते हैं तथा बारहो मास हरे-भरे रहते हैं । छाल-धूसर एवं कुछ फटी हुई तथा काष्ठसार लाल रंग का होता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा) · पृष्ठ 705, कुल 1167 में से · BharatKosha