भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका प्रयोग ज्वर, चर्मरोग, उपदंश, शोथ तथा आर्तव विकारों में करते हैं । (१) विषम ज्वर में इसका फांट पिलाते हैं । (२) उपदंश की द्वितीयावस्था में त्वचा के विकार या सन्धि में विकृति होने पर इसकी छाल का प्रयोग करते हैं । (३) मूल की छाल अनार्तव में दी जाती है । व्रणशोथ पर इसे दही में पीसकर लगाते हैं । (४) सोजाक में पुष्पों का फांट पिलाने से जलन कम होती है । (५) तिल के तेल में पुष्पों को पीसकर शिरःशूल, अक्षि पीड़ा, चक्कर आदि में सर पर बाँधते हैं । (७) पत्तों का रस शहद के साथ उदरशूल में देते हैं । मात्रा-त्वक् चूर्ण ५-१५ रत्ती । अथ बकुलः ("मौलसिरी" इति लोके) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह बकुलो मधुगन्धश्च सिंहकेसरकस्तथा । बकुलस्तुवरोऽनुष्णः कटुपाकरसो गुरुः ।। कफपित्तविषश्वित्रकृमिदन्तरुदापहः ॥३३॥ मौलसिरी के संस्कृत नाम-बकुल, मधुगन्ध, सिंहकेसरक ये सब हैं । मौलसिरी-कषायरसयुक्त, किञ्चित् उष्ण, पाक तथा रस में कटु, गुरु, एवम्-कफ, पित्त, विष, श्वेतकुष्ठ कृमि एवं दाँतों के रोगों को दूर करने वाला है। [३३] अथ बृहद्बकुलः (बड़ी मौलसिरी) । तस्य नामगुणानाह शिवमल्ली पाशुपत एकाष्ठीलो वको वसुः ।।३४।। वकोऽनुष्णः कटुस्तिक्तः कफपित्तविषापहः । योनिशूलतृषादाहकुष्ठशोथास्रनाशनः ॥३५॥ बड़ी मौलसिरी के संस्कृत नाम-शिवमल्ली, पाशुपत, एकाष्ठील, वक, वसु ये सब हैं । बड़ी मौलसिरी- किञ्चित् उष्ण, कटु तथा तिक्त रसयुक्त एवम्-कफ, पित्त, विष, योनिशूल, तृषा, दाह, कुष्ठ, शोथ और रक्तविकार को दूर करने वाली है । [३४-३५] नोट-भावप्रकाशकार बकुल की दो जातियों का उल्लेख करते हैं जिनमें बड़ी को शिवमल्ली, पाशुपत, एकाष्ठील, वक एवं वसु कहा गया है । वक नाम होने से इसे कुछ अगस्त मानते हैं किन्तु अगस्त का स्वतंत्र वर्णन आगे आया हुआ है । वानस्पतिक दृष्टि से बकुल की कोई भिन्न जाति (Species) का उल्लेख नहीं पाया जाता । संभव है केवल स्थानादि भेद से कहीं-कहीं बड़े आकार के वृक्ष हो जाते हों जिन्हें बृहद् बकुल कहा गया हो । १५. मौलसिरी हिं०-मौलसिरी । बं०-बकुल । म०-बकुल, ओवली । गु०-बोलसरी । क०-बकुल । ते०-पोगड । ता०- मगिलम । ले०-Mimusops elengi Linn. (मिम्युसोप्स एलेन्गी) । Fam. Sapotaceae (सेपोटेंसी) । शोभा तथा सुगंध के लिए यह सभी जगह बागों में लगाया हुआ पाया जाता है । दक्षिण तथा अंडमान में अधिक होता है । इसके वृक्ष-५० फीट तक ऊँचे, सघन, चिकने पत्तों से युक्त, झोपड़ाकार और सुहावने दिखाई पड़ते हैं तथा बारहो मास हरे-भरे रहते हैं । छाल-धूसर एवं कुछ फटी हुई तथा काष्ठसार लाल रंग का होता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA