भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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मी०, चौड़ाई लिए हुए अंडाकार या गोल, मृदुरोमश या चिकना होता है। पुष्प—श्वेत, सुगंधि गुच्छों में आते हैं। बाह्यदल नलिका ४ मि० मि० लम्बी तथा दन्तुर एवं अन्तर्दल नलिका १३ मि० मि० लम्बी तथा उसके खण्ड ५-८ एवं ६ मि० मि० लम्बे होते हैं। यद्यपि पीतयूथिका का वर्णन भा० प्र० ने किया है तथापि, उपर्युक्त जाति में पीले फूल नहीं होते किन्तु हेटेरोफाइलम् (J. heterophyllum) नामक जाति में पीले सुगंधित फल होते हैं। डॉ० देसाई ने उपर्युक्त जाति (ज. ऑरीक्युलेटम्) का वर्णन जाई के अन्तर्गत किया है। इसके पत्ते तथा फूलों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें सुगंधित्तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके गुण चमेली की ही तरह हैं। यह भी शीतवीर्य, व्रणरोपण एवं व्रणशोधन है। (१) मुखपाक में पत्तों को चबाने को देते हैं या त्रिफला दारुहलदी के साथ इसके पत्तों के कषाय से कुल्ला कराते हैं। अंगुलियों के बीच के स्थान सड़ जाने पर पत्तों का लेप उपयोगी है। व्रण पर पत्तों को पीसकर बाँधते हैं। (२) कर्ण विकारों में इसके पत्तों से पकाया तिल का तेल कान में डालते हैं। (३) पुष्पों को क्षय में दिया जाता है। अथ चम्पकः (चम्पा) । तस्य नामगुणानाह चाम्पेयश्चम्पकः प्रोक्तो हेमपुष्पश्च स स्मृतः। एतस्य कलिका गन्धफलेति कथिता बुधैः ।।३१।। चम्पकः कटुकस्तिक्तः कषायो मधुरो हिमः। विषक्रिमिहरः कृच्छ्रकफवातास्रपित्तजित् ।।३२।। १४. चम्पा हिं०—चम्पा। बं०—चांपा, चाम्पा। म०—सोन चांफा, पिंवला चांफा। गु०—राय चम्पो, पीलो चम्पो। क०— संपगे। ते०—सम्पङ्गी। ता०—शंपंगि। ले०—Michelia champaca Linn. (माइकेलिया चम्पक)। Fam. Magnoliaceae (मॅग्नोलिएसी)। चम्पा के वृक्ष प्रायः वाटिकाओं में रोपण किये जाते हैं किन्तु पूर्वी हिमालय में ३००० फीट तक तथा आसाम, प० घाट एवं दक्षिण भारत में यह अन्य अवस्था में भी पाया जाता है। इसका वृक्ष—छोटा करीब २० फीट ऊँचा होता है और बारहो मास हरा-भरा रहता है। पत्ते—८-१० इञ्च लम्बे, २।। से ४ इंच तक चौड़े, नोकीले, चिकने और चमकीले होते हैं। फूल—२ इञ्च के घेरे में घंटाकार फीके पीले या नारङ्गी रंग के सुगन्धित होते हैं। फल—लम्बे, १-४ धूसर बीजों से युक्त होते हैं। नोट—चंपक के अन्य प्रकारों का भी उल्लेख मिलता है जैसे क्षीर चंपक, नागचंपक (नागकेसर), नीलचंपक (हरा चंपा) एवं भूचंपक आदि जो विभिन्न वनस्पतियाँ हैं। इसके पंचांग, विशेष रूप से डाल तथा पुष्पों का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसके पुष्प तथा छाल में उड़नशील तैल होता है। छाल का क्वाथ करने से यह तेल उड़ जाता है। इसलिये इसका फाण्ट या चूर्ण बनाकर प्रयोग करना चाहिये। गुण और प्रयोग—इसकी छाल—ज्वरहर, मूत्रल, कफहर, दीपन एवं तिक्त पौष्टिक है। पुष्प—उत्तेजक, उद्वेष्टन निरोधी, चक्षुष्य, दाहशामक, मूत्रल, कुष्ठ, कण्डू, व्रणहर एवं दीपन है। जड़ की छाल—विरेचन, आर्तवजनन एवं शोथहर है।