भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
[Header] पुष्पवर्गः ६५३
मी०, चौड़ाई लिए हुए अंडाकार या गोल, मृदुरोमश या चिकना होता है। पुष्प—श्वेत, सुगंधि गुच्छों में आते हैं। बाह्यदल नलिका ४ मि० मि० लम्बी तथा दन्तुर एवं अन्तर्दल नलिका १३ मि० मि० लम्बी तथा उसके खण्ड ५-८ एवं ६ मि० मि० लम्बे होते हैं। यद्यपि पीतयूथिका का वर्णन भा० प्र० ने किया है तथापि, उपर्युक्त जाति में पीले फूल नहीं होते किन्तु हेटेरोफाइलम् (J. heterophyllum) नामक जाति में पीले सुगंधित फल होते हैं। डॉ० देसाई ने उपर्युक्त जाति (ज. ऑरीक्युलेटम्) का वर्णन जाई के अन्तर्गत किया है। इसके पत्ते तथा फूलों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें सुगंधित्तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके गुण चमेली की ही तरह हैं। यह भी शीतवीर्य, व्रणरोपण एवं व्रणशोधन है। (१) मुखपाक में पत्तों को चबाने को देते हैं या त्रिफला दारुहलदी के साथ इसके पत्तों के कषाय से कुल्ला कराते हैं। अंगुलियों के बीच के स्थान सड़ जाने पर पत्तों का लेप उपयोगी है। व्रण पर पत्तों को पीसकर बाँधते हैं। (२) कर्ण विकारों में इसके पत्तों से पकाया तिल का तेल कान में डालते हैं। (३) पुष्पों को क्षय में दिया जाता है। अथ चम्पकः (चम्पा) । तस्य नामगुणानाह चाम्पेयश्चम्पकः प्रोक्तो हेमपुष्पश्च स स्मृतः। एतस्य कलिका गन्धफलेति कथिता बुधैः ।।३१।। चम्पकः कटुकस्तिक्तः कषायो मधुरो हिमः। विषक्रिमिहरः कृच्छ्रकफवातास्रपित्तजित् ।।३२।। १४. चम्पा हिं०—चम्पा। बं०—चांपा, चाम्पा। म०—सोन चांफा, पिंवला चांफा। गु०—राय चम्पो, पीलो चम्पो। क०— संपगे। ते०—सम्पङ्गी। ता०—शंपंगि। ले०—Michelia champaca Linn. (माइकेलिया चम्पक)। Fam. Magnoliaceae (मॅग्नोलिएसी)। चम्पा के वृक्ष प्रायः वाटिकाओं में रोपण किये जाते हैं किन्तु पूर्वी हिमालय में ३००० फीट तक तथा आसाम, प० घाट एवं दक्षिण भारत में यह अन्य अवस्था में भी पाया जाता है। इसका वृक्ष—छोटा करीब २० फीट ऊँचा होता है और बारहो मास हरा-भरा रहता है। पत्ते—८-१० इञ्च लम्बे, २।। से ४ इंच तक चौड़े, नोकीले, चिकने और चमकीले होते हैं। फूल—२ इञ्च के घेरे में घंटाकार फीके पीले या नारङ्गी रंग के सुगन्धित होते हैं। फल—लम्बे, १-४ धूसर बीजों से युक्त होते हैं। नोट—चंपक के अन्य प्रकारों का भी उल्लेख मिलता है जैसे क्षीर चंपक, नागचंपक (नागकेसर), नीलचंपक (हरा चंपा) एवं भूचंपक आदि जो विभिन्न वनस्पतियाँ हैं। इसके पंचांग, विशेष रूप से डाल तथा पुष्पों का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसके पुष्प तथा छाल में उड़नशील तैल होता है। छाल का क्वाथ करने से यह तेल उड़ जाता है। इसलिये इसका फाण्ट या चूर्ण बनाकर प्रयोग करना चाहिये। गुण और प्रयोग—इसकी छाल—ज्वरहर, मूत्रल, कफहर, दीपन एवं तिक्त पौष्टिक है। पुष्प—उत्तेजक, उद्वेष्टन निरोधी, चक्षुष्य, दाहशामक, मूत्रल, कुष्ठ, कण्डू, व्रणहर एवं दीपन है। जड़ की छाल—विरेचन, आर्तवजनन एवं शोथहर है।
६५४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका प्रयोग ज्वर, चर्मरोग, उपदंश, शोथ तथा आर्तव विकारों में करते हैं । (१) विषम ज्वर में इसका फांट पिलाते हैं । (२) उपदंश की द्वितीयावस्था में त्वचा के विकार या सन्धि में विकृति होने पर इसकी छाल का प्रयोग करते हैं । (३) मूल की छाल अनार्तव में दी जाती है । व्रणशोथ पर इसे दही में पीसकर लगाते हैं । (४) सोजाक में पुष्पों का फांट पिलाने से जलन कम होती है । (५) तिल के तेल में पुष्पों को पीसकर शिरःशूल, अक्षि पीड़ा, चक्कर आदि में सर पर बाँधते हैं । (७) पत्तों का रस शहद के साथ उदरशूल में देते हैं । मात्रा-त्वक् चूर्ण ५-१५ रत्ती । अथ बकुलः ("मौलसिरी" इति लोके) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह बकुलो मधुगन्धश्च सिंहकेसरकस्तथा । बकुलस्तुवरोऽनुष्णः कटुपाकरसो गुरुः ।। कफपित्तविषश्वित्रकृमिदन्तरुदापहः ॥३३॥ मौलसिरी के संस्कृत नाम-बकुल, मधुगन्ध, सिंहकेसरक ये सब हैं । मौलसिरी-कषायरसयुक्त, किञ्चित् उष्ण, पाक तथा रस में कटु, गुरु, एवम्-कफ, पित्त, विष, श्वेतकुष्ठ कृमि एवं दाँतों के रोगों को दूर करने वाला है। [३३] अथ बृहद्बकुलः (बड़ी मौलसिरी) । तस्य नामगुणानाह शिवमल्ली पाशुपत एकाष्ठीलो वको वसुः ।।३४।। वकोऽनुष्णः कटुस्तिक्तः कफपित्तविषापहः । योनिशूलतृषादाहकुष्ठशोथास्रनाशनः ॥३५॥ बड़ी मौलसिरी के संस्कृत नाम-शिवमल्ली, पाशुपत, एकाष्ठील, वक, वसु ये सब हैं । बड़ी मौलसिरी- किञ्चित् उष्ण, कटु तथा तिक्त रसयुक्त एवम्-कफ, पित्त, विष, योनिशूल, तृषा, दाह, कुष्ठ, शोथ और रक्तविकार को दूर करने वाली है । [३४-३५] नोट-भावप्रकाशकार बकुल की दो जातियों का उल्लेख करते हैं जिनमें बड़ी को शिवमल्ली, पाशुपत, एकाष्ठील, वक एवं वसु कहा गया है । वक नाम होने से इसे कुछ अगस्त मानते हैं किन्तु अगस्त का स्वतंत्र वर्णन आगे आया हुआ है । वानस्पतिक दृष्टि से बकुल की कोई भिन्न जाति (Species) का उल्लेख नहीं पाया जाता । संभव है केवल स्थानादि भेद से कहीं-कहीं बड़े आकार के वृक्ष हो जाते हों जिन्हें बृहद् बकुल कहा गया हो । १५. मौलसिरी हिं०-मौलसिरी । बं०-बकुल । म०-बकुल, ओवली । गु०-बोलसरी । क०-बकुल । ते०-पोगड । ता०- मगिलम । ले०-Mimusops elengi Linn. (मिम्युसोप्स एलेन्गी) । Fam. Sapotaceae (सेपोटेंसी) । शोभा तथा सुगंध के लिए यह सभी जगह बागों में लगाया हुआ पाया जाता है । दक्षिण तथा अंडमान में अधिक होता है । इसके वृक्ष-५० फीट तक ऊँचे, सघन, चिकने पत्तों से युक्त, झोपड़ाकार और सुहावने दिखाई पड़ते हैं तथा बारहो मास हरे-भरे रहते हैं । छाल-धूसर एवं कुछ फटी हुई तथा काष्ठसार लाल रंग का होता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
पुष्पवर्गः ६५५ पत्ते—जामुन के पत्तों के समान ३।। इञ्च लम्बे, १।।। इञ्च चौड़े, नोकदार एवं किनारों पर लहरदार तथा पौन इञ्च दण्ड से युक्त होते हैं । फूल—सफेद, लगभग एक इञ्च गोल चक्राकार होते हैं और उनसे अत्यन्त सुगन्धि आती है जो इनके सूखने पर भी चिरकाल तक बनी रहती है। फल—किञ्चित् लम्बाई लिये गोल, पौन इञ्च से १ इञ्च लम्बे, ऊपर से साफ, कच्ची अवस्था में हरे रंग के और पकने पर पीले एवं कषाय मधुर हो जाते हैं जिनमें एक बड़ा बीज रहता है। ग्रीष्म से शरद तक यह फूलता है तथा बाद में फलता है। इसकी छाल, फल तथा पुष्पों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—बीजों में सैपोनिन एवं एक तैल होता है। छाल में कषाय द्रव्य, रबर सदृश पदार्थ, मोम, रंजक द्रव्य, स्टार्च एवं राख होती है। फूलों में उड़नशील तैल होता है। फल में शर्करा होती है। गुण और प्रयोग—इसकी छाल कषाय एवं पौष्टिक है। फल संग्राहक एवं स्नेहन हैं। (१) दाँत हिलते हों या अन्य दन्त विकारों में इसका बहुत उपयोग किया जाता है। इससे दतुअन करते हैं। छाल को या कच्चे फलों को चबाने को देते हैं। छाल के क्वाथ से गण्डूष भी कराते हैं। इससे अत्यधिक लालास्राव में भी लाभ होता है। बीजों से भी लाभ होता है। (२) छाल का क्वाथ जीर्ण ज्वर में पौष्टिक रूप में देते हैं। (३) सूखे फूलों का नस्य शिरःशूल में दिया जाता है। (४) पुरानी आँव में पके फल खिलाते हैं। अथ कदम्बः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कदम्बः प्रियको नीपो वृक्षपुष्पो हलिप्रियः । कदम्बो मधुरः शीतः कषायो लवणो गुरुः ।। सरो विष्टम्भकृद्रूक्षः कफस्तन्यानिलप्रदः ।।३६।। कदम्ब के संस्कृत नाम—कदम्ब, प्रियक, नीप, वृत्तपुष्प और हलिप्रिय ये सब हैं। कदम्ब—मधुर, कषाय तथा लवण रस युक्त, शीतल, गुरु, सारक, रूक्ष, वातविष्टम्भ (वायु का न खुलना) को उत्पन्न करने वाला, कफकारक, दुग्धवर्धक और वायुजनक होता है। [१६] नोट—अन्य निघंटुओं ने इसके कई भेदों का उल्लेख किया है। इनके विभिन्न पर्यायों में से धारकदंब, धूलिकदंब, भूकदंब, राजकदंब एवं नीप मुख्य हैं। इनमें से संभवतः कुछ एक-दूसरे के पर्याय हैं तथा कुछ भेद हैं। सुप्रसिद्ध कदंब वृक्ष तो राजकदंब मालूम पड़ता है जिसका विस्तार से नीचे वर्णन् किया गया है। संभवतः इसे ही नीप कहा गया है। भूकदंब तो मुण्डी है जिसका पहले (पृ० ४१३) वर्णन आ चुका है। कदंब के ही वर्ग के कुछ उससे मिलते-जुलते दो अन्य वृक्ष, ले०—Mytragyna parvifolia Korth (मिट्रागाइना पार्विफोलिया), हिं०—करम, कैमा एवं ले०— Adina cordifolia Benth. & Hook. f. (एडिना कॉर्डिफोलिया), हिं०—जातकदम, हलदू, सं०—हरिद्रु, आसा०—केलिकदंब पाये जाते हैं जो संभवतरूः उपर्युक्त भेदों में से हैं। इनमें से प्रथम धारा कदंब एवं द्वितीय धूलिकदंब हो सकता है। १६. कदम हिं०—कदम, कदम्ब । बं०—कदम । म०—कलम्ब । गु०—कदम्ब । क०—कड़वा ते०—कदंबमु । ता०— येल्लह कदम्ब । ले०—Anthocephalus cadamba Miq. (एंथोसिफेलस् कदम्ब) । Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। यह हिमालय के निचले भागों में नेपाल से पूर्व की तरफ वर्मा तक तथा दक्षिण में उत्तरी सरकार तथा पश्चिमी घाट में होता है। सभी स्थानों पर बागों में लगाया हुआ भी पाया जाता है।
६५६ भावप्रकाशनिघण्टुः कदम्ब का वृक्ष-४०-५० फीट ऊँचा, बड़ा और छायादार होता है। पत्ते-महुवे के पत्तों के समान लम्बाई युक्त अण्डाकार, ५-९ इञ्च लम्बे होते हैं। इन पर सिरायें बहुत स्पष्ट होती हैं। पुष्प गुच्छ १-२ इञ्च के घेरे में, गोलाकार नारंगी रंग के अनेक पुष्पगुच्छ होते हैं और उनसे विशेष कर रात्रि में सुगन्धि आती है। फल-कच्चे में हरे और पकने पर फीके नारंगी रंग के, १-१॥ इञ्च व्यास में, गोल तथा मधुराम्ल होते हैं। चिकित्सा में फल तथा छाल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में राख १०% रहती है जिसमें चूना रहता है। इसमें का प्रधान तत्त्व सिन्कोटैनिक अम्ल (Cinchotannic acid) की तरह है तथा इसकी छाल का रंग भी सिंकोना में के लाल द्रव्य की तरह है। इसमें का क्षाराभ हृदयावसादक है। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक, शीतवीर्य, ज्वरघ्न, मूत्र स्तंभन (Antidiuretic), व्रणरोपण, शुक्रशोधन, वेदनास्थापन एवं विषघ्न है। इसका प्रयोग ज्वर, रक्तातिसार, मूत्रकृच्छ्र, मूत्रदोष एवं मुखपाक में किया जाता है। (१) इसकी छाल का रस, जीरा एवं मिश्री के साथ बच्चों के ज्वर, वमन एवं अतिसार में दिया जाता है। (२) नेत्राभिष्यंद में अन्य औषधियों के साथ इसका रस पलकों पर लगाते हैं। (३) मुखपाक में छाल का या पत्तों का कषाय गण्डूष के लिए दिया जाता है। (४) फल का रस ज्वरजन्य पिपासा में उपयोगी मानते हैं। मात्रा-त्वक् ५-१० रत्ती। अथ कुब्जकः (कूजा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुब्जको भद्रतरुणी वृत्तपुष्पोऽतिकेसरः। महासहा कण्टकाढ्या नीलालिकुलसंकुला ।। ३७ ।। कुब्जकः सुरभिः स्वादुः कषायानुरसः सरः। त्रिदोषशमनो वृष्यः शीतहर्त्ता च स स्मृतः ।। ३८ ।। कूजा के संस्कृत नाम-कुब्जक, भद्रतरुणी, वृत्तपुष्प, अतिकेसर, महासहा, कण्टकाढ्या, नीलालिकुलसंकुला ये सब हैं। कूजा-सुगन्धयुक्त, आरम्भ में मधुर, अन्त में कषाय रसयुक्त, सारक, त्रिदोषनाशक, वृष्य (वीर्यवर्धक) और शीत को दूर करने वाला है। [३७-३८] १७. कूजा हिं०-कूजा, कुजई। बं०-कूजा। ले०-Rosa moschata Herrm (रोजा मॉस्केटा)। Fam. Rosaceae (रोज़ेसी)। यह मध्य तथा पश्चिम हिमालय के साधारण उष्ण प्रदेशों में मुरी से नेपाल तक २ हजार से ११ हजार फीट तक होता है। गुलाब की जाति की यह इतस्ततः फैलने वाली विस्तृत लता होती है। काण्ड-५" तक मोटे तथा ५० फीट तक ऊँचे होते हैं। काँटे भूरे रंग के होते हैं। पत्ते-संयुक्त, २"-६" लम्बे एवं वृन्त पर काँटे होते हैं। पत्रक-संख्या में ५-९, अंडाकार, तीक्ष्णाग्र, दन्तुर, १-३" लम्बे एवं अधर पृष्ठ पर मृदुरोमश होते हैं। पुष्प-श्वेत, सुगंधित, १- १.५" व्यास में एवं इनके वृन्त पर काँटे नहीं होते। फल-नारंगी, रक्त या हलके लाल रंग के, गोल या अंडाकार एवं व्यास में ०.३-०.६" रहते हैं। पुष्पकाल अप्रिल से जून एवं फलोद्भव अक्तूबर से फरवरी तक। गुण और प्रयोग-यह सारक, त्रिदोषघ्न तथा वृष्य है। इसका प्रयोग पैत्तिक विकार, दाह एवं नेत्र रोगों में किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पुष्पवर्गः ६५७ अथ मल्लिका। तस्या नामानि गुणाँश्चाह मल्लिका मदयन्ती च शीतभीरुश्च भूपदी ।।३९।। मल्लिकोष्णा लघुर्वृष्या तिक्ता च कटुका हरेत् । वातपित्तास्यदृग्गव्याधिकुष्ठारुचिविषव्रणान् ।।४०।। मल्लिका (बेला, मोतिया) के संस्कृत नाम—मल्लिका, मदयन्ती, शीतभीरु, भूपदी ये सब हैं। मल्लिका— उष्ण, लघु वृष्य, तिक्त तथा कटु रसयुक्त एवम्—वात, पित्त, मुख-नेत्र-सम्बन्धी रोग, कुष्ठ, अरुचि, विष तथा व्रण को दूर करने वाली है। [३९-४०] १८. मल्लिका यह जस्मिनम् सम्बॅक् (Jasminum sambac) की ही एक जाति (Variety) है जिसका वर्णन बेला (वार्षिकी) के अन्तर्गत (पृष्ठ ४९०) किया जा चुका है। गुण की दृष्टि से यह उससे कुछ समान ही है किन्तु इसे भा० प्र० उष्णवीर्य एवं वार्षिकी को शीतवीर्य मानते हैं। अथ माधवी (वासन्ती) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह माधवी स्यात्तु वासन्ती पुण्ड्रको मण्डकोऽपि च । अतिमुक्तो विमुक्तश्च कामुको भ्रमरोत्सवः ।। माधवी मधुरा शीता लघ्वी दोषत्रयापहा ।।४१।। माधवी के संस्कृत नाम—माधवी, वासन्ती, पुण्ड्रक, मण्डक, अतिमुक्त, विमुक्त, कामुक, भ्रमरोत्सव ये सब हैं। माधवी—मधुर रसयुक्त, शीतल, लघु तथा त्रिदोषनाशक है। [४१] १९. माधवी हिं०—माधवी। बं०—माधवी लता। म०—मधु मालती, हलदबेल। गु०—रगतपीती, माधवी लता। ता०— अडिगम। ते०—माधवतोगे। अं०—Clustered Hiptage (क्लस्टर्ड हिप्टेज)। ले०—Hiptage madablota Gaertn. (हिप्टेज मेडेब्लोटा)। Fam. Malpi-ghiaceae (मॅल्पिघिएसी)। यह दक्षिण, सिवालिक, कुमाऊँ, पूर्वीबंगाल, आसाम, नेपाल तथा अंडमान में होती है एवं बागों में भी यह लगाई जाती है। इसकी लता—बहुत विस्तार में फैलने वाली होती है और निकटवर्ती वृक्ष पर चढ़ कर उसको ढँक देती है। इसका स्तम्भ—मजबूत होता है और शाखाएँ मोटी होती हैं। पत्ते—अंडाकार, लट्वाकार-आयताकार या आयताकार-प्रासवत्, श्वेत तथा सुगंधित रहते हैं। आभ्यंतर दल झालरदार रहते हैं जिनमें से एक दल पीला रहता है। प्रत्येक स्त्री केशर में एक बड़ा और दो छोटे पक्ष (Wing) होते हैं। इसकी छाल तथा पत्तों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें हिप्टेजिन (Hiptagin) नामक एक ग्लूकोसाइड पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके पत्ते कुष्ठघ्न हैं। त्वचा के रोगों में पत्तों को पीसकर लगाया जाता है। खुजली (Scabies) में यह लाभदायक है। इसकी छाल कड़वी तथा सुगंधित है तथा इसका जीर्ण आमवात तथा श्वास में उपयोग किया जाता है। कमर पतली करने के लिए जड़ को मट्ठे के साथ पिलाना चाहिये। (चक्रदत्त) ४५ भाव.I
६५८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ केतकः सुवर्णकेतकी च (केवड़ा-पीला केवड़ा) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह केतकः सूचिकापुष्पो जम्बुकः क्रकचच्छदः । सुवर्णकेतकी त्वन्या लघुपुष्पा सुगन्धिनी ।।४२।। केतकः कटुकः स्वादुर्लघुस्तिक्तः कफापहः । उष्णा तिक्तरसा ज्ञेया चक्षुष्या हेमकेतकी ।।४३।। २०. केवड़ा हिं०-केवड़ा। बं०-केया। म०-केवड़ा। गु०-केवड़ो। ते०-मुगलीपुवु। ता०-ताल है। क०-केदगे। फा०-गुलकेरी। अ०-कादी। अं०-Screw Pine (स्क्रू पाइन)। ले०-Pandanus odoratissimus Roxb. (पेण्डेनस ओडोरेटिसिमस्) । Fam. Pandanaceae (पेण्डेनेसी) । भारतीय प्रायद्वीप के दोनों तरफ समुद्री किनारों तथा अंडमान में यह पाया जाता है। सभी स्थानों में बागों में लगाया हुआ भी मिलता है। इसका गुल्म या छोटा वृक्ष करीब १०-१२ फीट ऊँचा होता है। काण्ड से वायवीयमूल निकल कर उसे सहारा देते हुए जमीन में घुसे रहते हैं। पत्ते-सघन, चमकीले, हरे, तलवार की तरह, ३-७ फीट तक लम्बे, पतले तथा किनारों . एवं मध्यशिरा पर तीक्ष्ण काँटों से युक्त होते हैं। पुष्प-पत्रावृत अवृन्त-काण्डज व्यूह (Spadix) में आते हैं जिनके पत्रकोश (Spathe) सुगन्धित तथा श्वेतवर्ण के होते हैं। पुं० पुष्प एवं स्त्री पुष्प भिन्न-भिन्न वृक्षों पर होते हैं। पुं० पुष्प व्यूह में कई गुच्छ ५-१० x २.५ - ३.८ से० मी० बड़े रहते हैं किन्तु स्त्रीपुष्प व्यूह में एक ही गुच्छ, ५ से० मी० व्यास का रहता है। फल-गोल या आयताकार, १५-२५ से० मी० लम्बा चौड़ा, पीत या रक्तवर्ण का हाता है। वर्षा ऋतु में पुष्प एवं शरद् ऋतु में फल आते हैं। भावप्रकाशकार इसके दो भेद मानते हैं। (१) केतक तथा (२) सुवर्ण केतकी। सुवर्णकेतकी के पुष्प कुछ छोटे, स्वर्ण वर्ण के तथा अधिक सुगन्धि वाले माने जाते हैं। आधुनिक राक्सवर्ग जैसे वैज्ञानिकों का मत है कि सुगन्ध पुं० पुष्प में अधिक होती है। पेण्डेनस की ऐसी भी कुछ जातियाँ (Species) पाई जाती हैं जिनके पत्तों में काँटे नहीं होते। इसके पुष्प एवं पत्तों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पुष्पों में ०.१-०.३% सुगन्धित तैल होता है। गुण और प्रयोग-यह सौमनस्यजनन, हृद्य, मस्तिष्क को बल देने वाला, दुर्गन्ध हर एवं कफनाशक है। (१) इसका अर्क ज्वर में देने से पसीना आकर ताजगी मालूम पड़ती है। (२) इसके तेल की मालिश से शिरःशूल, कटिशूल एवं आमवातादि में लाभ होता है। (३) चर्मरोगों में पत्तों का उपयोग किया जाता है। (४) गुल्म में इसके क्षार का प्रयोग किया जाता है। (सुश्रुत) मात्रा-अर्क ४-६ तोला; शर्बत २-४ तोला। अथ किङ्किरातः (गौडादौ प्रसिद्धः) तस्य नामानि गुणाँश्चाह किङ्किरातो हेमगौरः पीतकः पीतभद्रकः ।।४४।। किङ्किरातो हिमस्तिक्तः कषायश्च हरेदसौ। कफपित्तपिपासाऽस्रदाहशोषवमिक्रिमीन् ।।४५।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
किङ्किरात (यह गौड़ आदि देशों में प्रसिद्ध है) के संस्कृत-नाम-किङ्किरात, हेमगौर, पीतक, पीतभद्रक ये सब हैं। किङ्किरात-तिक्त तथा कषाय रस युक्त, शीतल तथा कफ, पित्त, प्यास, रक्तविकार, दाह, शोष, वमन तथा क्रिमि को दूर करता है। [४४-४५] २१. किंकिरात आगे वटादिवर्ग में बब्बूल (किंकिरात) का वर्णन आया है। या तो इसके फूलों के महत्त्व को बतलाने के लिए इसका यहाँ स्वतंत्र वर्णन किया गया हो या यह बब्बूल का कोई भेद हो। पीले पुष्प की कटसरैया को भी कुछ विद्वान् किंकिरात मानते हैं। दक्षिण की तरफ एक बब्बूल की जाति का छोटा वृक्ष म०-देववाभूल, ले०-Acacia latromun Willd. (अकेसिया लेट़्रोमन); Fam. Leguminosae (लेग्यु-मिनोसी) पाया जाता है। यदि बब्बूल से भिन्न किंकिरात हो तो इसके होने की संभावना है। यह छोटा सा वृक्ष होता है जिसका ऊपर का भाग पुराने वृक्षों में छत्र की तरह फैल जाता है। इसमें पुष्प सफेद आते हैं जो बाद में पीले हो जाते हैं। पागल कुत्ते के काटने पर इसकी ताजी जड़, ४ तोले की मात्रा में ठंडे जल में पीस कर ७ दिन पिलाते हैं। अथ कर्णिकारः ("पांगारा" इति महाराष्ट्रे प्रसिद्धः) तस्य नामानि गुणाँश्चाह कर्णिकारः कटुस्तिक्तस्तुवरो शोधनो लघुः । रञ्जनः सुखदः शोथश्लेष्मास्रव्रणकुष्ठजित् ।।४६।। कर्णिकार (यह "पांगारा" इस नाम से महाराष्ट्र में प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-कर्णिकार, परिव्याध, पादपोत्पल ये सब हैं। कर्णिकार-कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, कोष्ठशोधक, लघु रंग देने वाला, सुख पहुँचाने वाला, एवम्-शोथ, कफ, रक्तविकार, व्रण और कुष्ठ को दूर करने वाला है। [४६] २२. कर्णिकार कर्णिकार क्या है इस संबन्ध में कुछ मतभेद हैं। हरीतक्यादि वर्ग में (पृ० ६८) आरग्वध के पर्याय में कर्णिकार शब्द आया है। जैसे बब्बूल का पर्याय किंकिरात होते हुए भी उसके पुष्पों के महत्त्व की दृष्टि से उसका दो स्थानों पर स्वतंत्र वर्णन किया है वैसे ही संभवतः इसका यहाँ फिर से वर्णन किया गया है। ध० नि० ने कर्णिकार को आरग्वध भेद माना है। 'पांगारा', इति महाराष्ट्रे प्रसिद्धः' यह जो प्रारंभ में दिया हुआ है वह उचित नहीं मालूम पड़ता। मराठी में पांगारा यह पारिभद्र, Erythrina indica (एरिश्रिना इण्डिका) का नाम है जिसका पहले वर्णन (पृ० ३३४) किया जा चुका है। कुछ विद्वानों ने उलटकंबल, Abroma augusta (एब्रोमा ऑगस्टा) को कर्णिकार माना है। कुछ ने बं०- कनकचम्पा, Pterospermum acerifolium (टेरोस्पर्मम् एसेरिफोलियम्) को कर्णिकार माना है किन्तु यह तो मुचकुंद है। मुचकुंद के लिये गलती से लोगों ने Pterospermum suberifolium (टे० सुबेरिफोलियम्) नाम लिखा है।¹ मुचकुंद का आगे स्वतंत्र वर्णन आया हुआ है। अथाशोकः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह अशोको हेमपुष्पश्च वञ्जुलस्ताम्रपल्लवः । कङ्केलिः पिण्डपुष्पश्च गन्धपुष्पो नटस्तथा ।।४७।। १. श्री ठा० बलवन्तसिंह-बिहार की वनस्पतियाँ, पृ. १७
६६० भावप्रकाशनिघण्टुः अशोकः शीतलस्तिक्तो ग्राही वर्ण्यः कषायकः । दोषापचीत्पादाहकृमिशोषविषास्रजित् १ ॥४८॥ अशोक के संस्कृत नाम-अशोक, हेमपुष्प, वञ्जुल, ताम्रपल्लव, कङ्केलि, पिण्डपुष्प, गन्धपुष्प, नट ये सब हैं । अशोक-तिक्त तथा कषाय रस युक्त, शीतल, ग्राही, शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला एवम् वातादिदोष, अपची, तृषा, दाह, क्रिमि, शोष, विष और रक्तविकार को दूर करने वाला है । [४७-४८] नोट-यद्यपि अशोक वृक्ष, Saraca indica Linn. (साराका इण्डिका) है तथापि कहीं-कहीं Polyalthia longifolia (पॉलिएल्थिया लौंगिफोलिया) को गलती से लोग अशोक मानते हैं । असली अशोक का उपयोग रक्तप्रदर आदि गर्भाशय के विकारों में बहुत प्रचलित हैं किन्तु इस गुण का उल्लेख चरक, सुश्रुत, भा० प्र०, रा० नि०, ध० नि०, में देखने में नहीं आता । सुश्रुत में लोध्रादिगण में इसका पाठ है जिसमें ये द्रव्य योनिदोषों में उपयोगी बतलाये गये हैं । चरक में वेदनास्थापनगण एवं कषायस्कंध में उल्लेख है । वृन्द ने प्रथम रक्तप्रदर में इसका उपयोग किया है । यहाँ प्रथम असली अशोक का तथा बाद में दूसरे अशोक का संक्षेप में वर्णन किया है । २३. अशोक (१), असली अशोक हि०-अशोक । बं०-असोक । म०, गु०-अशोक । क०-अशोक । ता०-अचोकम् । ले०-Saraca indica Linn. (सराका इण्डिका) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह मध्य और पूर्वी हिमालय, पूर्व बंगाल और दक्षिण भारत में पाया जाता है तथा अनेक प्रकार की वाटिकाओं में भी देखने में आता है । बंगाल में इसका अधिक आदर है और प्रायः वहाँ के सब वाटिकाओं में देखा जाता है । इसका वृक्ष-बड़ा, सीधा और झोपड़ाकार होता है तथा यह बारहो मास हरा-भरा दिखाई पड़ता है । लकड़ी- हलकी, किंचित् लाली युक्त भूरे रंग की होती है । पत्ते-सम-पक्षवत् एवं पत्रक-पतली-पतली टहनियों पर ३ से ६ जोड़े रहते हैं और वे ३ से ९ इञ्च तक लम्बे, आयताकार या आयताकार प्रासवत्, चिकने, तीक्ष्ण या लम्बाग्र एवं चर्मल होते हैं । नई-नई टहनियाँ नीचे की ओर झुकी हुई रहती है और उनके पत्ते अत्यन्त कोमल, एक दूसरे से सटे हुए, तांबे के रंग के लाल मनोहर दिखाई पड़ते हैं । इसीलिए इसको ताम्रपल्लव कहते हैं । वसन्त ऋतु में इस पर फूल तथा शरद् में फल आते हैं । पुष्प-सघन गुच्छों में आते हैं और वे नारंगी रंग से लेकर अत्यन्त रक्तवर्ण तक परम सुहावने होते हैं । इसमें कोण पुष्पक एवं बाह्यदल रंगीन होते हैं । बाह्यदल ४ तथा आयताकार होते हैं । आभ्यंतरदल नहीं रहते । पुंकेशर ७-८, करीब १ इञ्च लम्बे एवं गहरे लाल रंग के होते हैं । फलियाँ-६ से १० इञ्च तक लम्बी, चिपटी, १ से १।। इञ्च चौड़ी तथा दोनों सिरों पर कुछ-कुछ टेढ़ी होती हैं । प्रत्येक फली में ४ से ८ तक बीज रहते हैं । बीज-१
पुष्पवर्गः ६६१ इसका उपयोग रक्तप्रदर-कष्टार्तव, श्वेतप्रदर, रक्तार्श, रक्तातिसार एवं गर्भाशय के विकारो में किया जाता है। अर्गट की तरह सभी प्रकार के रक्तप्रदर में इसका प्रयोग किया जा सकता है। (१) रक्तप्रदर में इसकी छाल का क्षीरपाक करके सुबह पिलाते हैं। (चक्रदत्त) मात्रा-१ से २ तोला (क्षीरपाक करके)। २४. अशोक (२) हिं०-अशोक असोक, देवदारु। बं०-देव दारु। म०-अशोक। ते०-असोकमु। क०-पुत्रजीवी। ले०- Polyalthia longifolia Benth. & Hook. f. (पॉलीएलथिया लौंगी फोलिया)। Fam. Annonaceae (अन्नोनेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है, विशेष कर सड़कों के किनारे देखने में आता है। इसे वाटिकाओं में भी लगाते हैं। इसका वृक्ष-सीधा खड़ा होता है। शाखाएँ-सघन नहीं होतीं। पतली-पतली टहनियों पर पत्ते विषमवर्ती रहते हैं। छाल-पतली और लकड़ी-किंचित् पीलापन युक्त सफेद होती है। पत्ते-६ से ९ इञ्च तक लम्बे, किंचित् अंडाकार, मालाकार, लहरदार धारवाले और चमकीले होते हैं। फूल-हरापन युक्त पीले रंग के अथवा पीलापन युक्त सफेद रंग के आते हैं। फल-जामुन के समान गोल होते हैं। कच्ची अवस्था में नीले रंग के और पकने पर लाल हो जाते हैं। गुण और प्रयोग-गलती से इसकी छाल का कहीं-कहीं असली अशोक के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। यह ज्वरनाशक होती है। अथाम्लाटनः (बाणपुष्प इति गौडादौ प्रसिद्धः) तस्य नामानि गुणाँश्चाह अम्लातोऽम्लाटनः प्रोक्तस्तथाऽम्लातक इत्यपि ।।४९।। कुरण्टको वर्णपुष्पः स एवोक्तो महासहः। अम्लाटनः कषायोष्णः स्निग्धः स्वादुश्च तिक्तकः ।।५०।। अम्लाटन (यह "बाणपुष्प" के नाम से गौड़ आदि देशों में प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-अम्लात, अम्लाटन, अम्लातक, कुरण्टक, वर्णपुष्प, महासह ये सब हैं। अम्लाटन-कषाय तथा तिक्तरस युक्त, उष्ण, स्निग्ध एवम् स्वादिष्ट है। [४९-५०] २५. बाणपुष्प इसके संस्कृत पर्याय-अम्लात, अम्लाटन, अम्लातक, कुरण्टक आदि कटसरैया के बोधक हैं। इसलिये बाणपुष्प, कटसरैये का ही कोई भेद मालूम पड़ता है। [२५] अथ सैरेयकः (कटसरैया) तस्य नामानि भेदान् गुणाँश्चाह सैरेयकः श्वेतपुष्पः सैरेयः कटसारिका। सहाचरः सहचरः स च भिन्द्यापि कथ्यते ।।५१।। कुरण्टकोऽन्नपीते स्याद्रक्त कुरबकः स्मृतः। नीले बाणा द्वयोरोक्तो दासी चार्त्तगलश्च सः ।।५२।। सैरेयः कुष्ठवातास्रकफकण्डूविषापहः। तिक्तोष्णो मधुरोऽनम्लः १सुस्निग्धः केशरञ्जनः ।।५३।। सफेद फूलवाली कटसरैया के संस्कृत नाम-सैरेयक, श्वेतपुष्पसैरेयक, सैरेय, कटसारिका, सहाचर, सहचर, भिन्दी ये सब हैं। पीले फूल वाली कटसरैया का संस्कृत नाम-कुरण्टक है। लाल फूलवाली का संस्कृत १. दन्त्यः इति पाठा०।
६६२ भावप्रकाशनिघण्टुः नाम—कुरबक है। नीले फूलवाली कटसरैया के संस्कृत नाम—बाणा, बाण, (बाण शब्द पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग दोनों में है), दासी, आर्तगल ये सब हैं। कटसरैया—तिक्त, मधुर तथा किञ्चित् अम्लरस युक्त, उष्ण, अतिस्निग्ध, केशों को रंगनेवाली होती है तथा कुष्ठ, वातरक्त, कफ, खुजली एवं विष का नाश करती है। नोट—सैरेयक के पुष्पों के आधार पर विभिन्न भेद किये हुए हैं। ये सब Barleria (बार्लेरिया) की विभिन्न जातियाँ हैं जिनके साधारण स्वरूप में साम्यता रहती है। यहाँ वानस्पतिक वर्णन केवल पीत का किया गया है। गुणकर्म भी सब के प्रायः समान ही होने से एक साथ ही सबका वर्णन किया गया है। निम्नलिखित भेदों का उल्लेख निघण्टुओं ने किया है। (१) श्वेत पुष्प—सहचर, Barleria cristata Linn. (बार्लेरिया क्रिस्टेटा) । (२) पीत " —कुरंटक, " prionitis " ( " प्रियोनाइटिस्) । (३) रक्त " —कुरबक, " cristata " ( " क्रिस्टेटा) । (४) नील " —दासी, आर्तगल, बाण, B. strigosa Willd. (बार्लेरिया स्ट्राइगोसा) । B. cristata (बा. क्रिस्टेटा) में स्थानभेद से पुष्प वर्ण तथा पत्रादि में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती हैं। इसमें श्वेत तथा गुलाबी दोनों प्रकार के फूल पाये जाते हैं। हिमालय पर होने वाले पौधों में जामुनी नील वर्ण के पुष्प होते हैं। बार्लेरिया की अन्य अनेक जातियाँ भी पाई जाती हैं जिन्हें बागों में शोभा के लिए भी लगाते हैं। २६. कटसरैया हिं०-कटसरैया, पियाबाँसा। बं०-कांट्राजाती। म०-कोरांटी। गु०-पीलो कांटारीयो। ले०-Barleria prionitis Linn. (बार्लेरिया प्रियोनाइटिस्) । Fam. Acanthaceae (अॅकेन्थेसी) । कटसरैया सभी उष्ण प्रान्तों में पाई जाती है तथा बागों में भी लगाई जाती है। इसका क्षुप-झाड़दार, काँटेदार तथा २ से ५ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते—१.५ से ४ इञ्च लम्बे, कण्टकित अग्रयुक्त, अंडाकार (शाखाओं में आयताकार-प्रासवत), विपरीत तथा अखण्डतट वाले हैं। डोडी—१ इञ्च लम्बी होती है जिनमें दो चिपटे बीज पाये जाते हैं। कटसरैया के पत्र एवं मूल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-पीत सैरेयक में एक क्षाराभ पाया गया है तथा इसमें पोटेशियम् (Potassium) काफी रहता है। गुण और प्रयोग-सैरेयक, तिक्त, अम्ल, उष्ण, कफनिःसारक, कुछ स्वेदजनक, शोथहर, व्रणरोपण, विषघ्न एवं केशरंजक है। इसका उपयोग कास, शोथ, दंतशोथ, चर्मरोग एवं चूहे के विष में किया जाता है। (१) बच्चों के कफयुक्त खाँसी में इसके पत्तों का स्वरस मधु या शर्करा मिलाकर देते हैं। शुष्क कास में सूखी हुई छाल का चूर्ण चटाते हैं। (२) जलशोथ (Anasarca) में मूल की ताजी छाल या पंचांग की राख खांड के साथ देते हैं। (३) चूहे के विष में मूल को मधु तथा चावल को धोवन के साथ देते हैं। (वाग्भट उ० ३८)। (४) दाँत हिलते हों तो नील सैरेयक के पत्तों के कषाय से गण्डूष कराते हैं (चक्र); दंतशूल में नमक के साथ पत्तों का लेप मसूड़ों पर करते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA
पुष्पवर्गः ६६३ (५) ग्रन्थि, शोथ आदि में मूल का लेप, व्रण पर पंचांग सिद्ध तैल एवं बरसात में पैर न फटे इसलिये तलवे पर पत्तों का लेप किया जाता है। कुष्ठादि चर्मरोगों में इसका लेप एवं आन्तरिक प्रयोग किया जाता है। मात्रा-स्वरस १/२-१ तोला; क्वाथ ५-१० तो०। अथ कुन्दम्। तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुन्दं तु कथितं माथ्यं सदापुष्पञ्च तत्स्मृतम्। कुन्दं शीतं लघु श्लेष्मशिरोरुग्विषपित्तहृत् ।।५४।। कुन्द के संस्कृत नाम-कुन्द, माथ्य, सदापुष्प ये सब हैं। कुन्द-शीतल, लघु तथा कफ, शिरोरोग, विष और पित्त को दूर करने वाला है। [५४] २७. कुन्द हिं०-कुन्द, कुन्दे का वृक्ष, कुन्द फूल। बं०-कुन्द। म०-कस्तूरी मोगरा। गु०-मोगरो। ता०-मल्लिगै। ते०-कुंदमु। ले०-Jasminum pubescens Willd. (जसमीनम् प्युबेसेन्स) । Fam. Oleaceae (ओलिएसी)। यह सब स्थानों पर होता है। बागों में शोभा के लिये भी लगाते हैं। इसका गुल्म-बड़ा, रोमश, लतासदृश आरोहणशील होता है। पत्ते-विपरीत, ३.८-७ x १.६-३.८ से० मी०, अंडाकार एवं लम्बाग्र तथा वृन्त ६-१० मि० मी० घन रोमश होता है। पुष्प-बेला के समान या उससे कुछ लम्बे, गुच्छों में, श्वेत, सुगन्धित एवं दल पत्र आयताकार तथा मालाकार होते हैं। यद्यपि यह वर्ष भर फूलता है किन्तु शीत ऋतु में बहुत अधिक फूलता है। इसके पुष्प, पत्र एवं मूल का प्रयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसके पत्तों का पुल्टिस बनाकर पुराने व्रणों पर बाँधने से व्रणरोपण होने लगता है। इसकी जड़ सर्पविष में उपयोगी बतलाई गई है। पुष्प एवं पिप्पली को तण्डुलांबु के साथ श्वास में पिलाने से लाभ होता है। (सु० उ० अ० ५१-३७) अथ मुचुकुन्दः । (नाम्नैव प्रसिद्धः)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह मुचुकुन्दः क्षत्रवृक्षश्चित्रकः प्रतिविष्णुकः । मुचुकुन्दः शिरःपीडापित्तास्रविषनाशनः ।। ५५ ।। मुचुकुन्द (यह इसी नाम से प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-मुचुकुन्द, क्षत्रवृक्ष, चित्रक, प्रतिविष्णुक, ये सब हैं। मुचुकुन्द-शिर की पीड़ा, पित्त, रक्तविकार एवम् विष का नाशक है। [५५] २८. मुचुकुन्द हिं०, म०, बं०, गु०-मुचुकुन्द। ले०-Pterospermum acerifolium Willd. १ (टेरोस्पर्मम् एसेरिफोलियम्) । Fam. Sterculiaceae (स्टर्क्यूलिएसी)। यह हिमालय में ४००० फीट तक तथा बंगाल, चटगाँव, खासिया पहाड़, मणिपुर में तथा दक्षिण में विशेष रूप से बम्बई प्रान्त में लगाया हुआ मिलता है। १. "ग्रन्थों में भूल से एक दूसरी जाति P. suberifolium को मुचकुंद नाम दिया हुआ मिलता है।"-ठा. बलवन्तसिंह, बिहार की वनस्पतियाँ, पृष्ठ १७। कुछ विद्वानों ने P. acerifolium को कर्णिकार माना है। कर्णिकार संभवतः आरग्वध है। चरक में मुचकुंद का उल्लेख नहीं मिलता। सुश्रुत में विद्रधि अध्याय (चि. १८-१०) में है।
६६४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका वृक्ष-ऊँचा तथा सुन्दर होता हैं। पत्ते- ६-१५ इञ्च बड़े, खण्डित, अखण्ड या दन्तुर, हृद्वत्, शिराविन्यास पाणिवत् तथा अधर तल पर श्वेत मृदुरोमश होते हैं। पुष्प-बड़े, श्वेत तथा सुगंधित होते हैं। आभ्यंतर दल ३ १/२- ४ १/२ इञ्च लम्बे होते हैं। फल-लंब गोल तथा कड़े होते हैं। इसके पुष्पों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह त्वच्य, वेदनाहर एवं रक्तस्तंभक हैं। (१) इसके फूल कांजी में पीसकर शिरःशूल में बाँधने से लाभ होता है। हिमांशु तैल में यह डाला जाता है। (२) पत्राधः रोम रक्तस्तंभक माने जाते हैं। (३) रक्तार्श में इसका लेप एवं घृत शर्करा के साथ बनाया हलुवा उपयोगी है। (४) चेचक के व्रणों पर इसके पुष्प एवं छाल को जलाकर कबीले के साथ मिलाकर लगाते हैं। अथ तिलकः (तिलाभपुष्पस्तिलकनाम्नैव प्रसिद्धः) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह तिलकः क्षुरकः श्रीमान्युरुषश्छन्नपुष्पकः ।। तिलकः कटुकः पाके रसे चोष्णो रसायनः । कफकुष्ठकिमीन्वस्तिमुखदन्तगदानहरेत् ।।५६।। २९. तिलक¹ हिं०-तिलक, तिलिया, तिलका। संथाल-हुण्डू। ले०-Wendlandia exerta DC. (वेण्डलैण्डिया एक्जर्टा) । Fam. Rubiaceae (रूबिएसी) । यह हिमालय के उष्ण प्रदेशीय शुष्क जंगलों में चेनाव से नेपाल तक, ४००० फीट की ऊँचाई तक एवं उड़ीसा, मध्यभारत कोंकण एवं उत्तरी डेक्कन में पाया जाता है। यह खुली हुई और छोटी-छोटी वनस्पतियों से रहित भूमि जैसे नालों के ढालों पर अधिक होते हैं। इसके वृक्ष-सुन्दर, झुके हुए तथा छोटे होते हैं। पत्ते-चर्मवत्, आयताकार या लट्वाकार-प्रासवत्, लम्बाग्र तथा ४-९ × १-३.५ इञ्च बड़े होते हैं। शिराएँ १०-१० जोड़ी तथा उपपत्र चौड़े, प्रायः लट्वाकार एवं अग्र पर टेढ़े होते हैं। पुष्प-१/६ इञ्च व्यास में, सुगन्धित एवं श्वेत होते हैं। आभ्यंतरदल मुड़े हुए एवं उनके स्वतंत्र खण्ड आभ्यंतरनाल से बड़े होते हैं। पुष्पकाल-मार्च, अप्रैल। उस समय वृक्ष का शिखर सफेद चाँदनी से ढँका मालूम पड़ता है। फल- १/२० इञ्च व्यास के, श्वेत एवं मृदुरोमावृत होते हैं। छाल-रक्ताभ होती है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल रेचक तथा चबाने से लालास्राव वर्धक होती है। अथ बन्धुजीवः (गोजुनिया) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह बन्धूको बन्धुजीवश्च रक्तो माध्याह्निकोऽपि च । बन्धूकः कफकृद् ग्राही वातपित्तहरो लघुः ।।५७।। १. नोट-निघण्टुओं में वर्णित इस तिलक वृक्ष के बारे में अभी तक किसी को पता नहीं था कि यह वृक्ष कैसा होता है तथा इसका लेटिन नाम क्या है। सर्वप्रथम श्री ठा. बलवन्तसिंह जी ने अपनी पुस्तक 'बिहार की वनस्पतियाँ' (पृ. ६८) में अनेक प्रमाणों के आधार पर तिलक को Wendlandia exerta DC. (वेण्डलैण्डिया एक्जर्टा) सिद्ध किया है तथा इसका वैज्ञानिक वर्णन किया है। इसके जंगलों में प्रचलित स्थानिक नाम, शास्त्रीय परिचयात्मक पर्याय तथा प्रचलित गुणकर्म सभी आधारों से यह तिलक सिद्ध होता है।
पुष्पवर्गः ६६५ दुपहरिया के संस्कृत नाम-बन्धूक, बन्धुजीव, रक्त, माध्याह्निक ये सब हैं। दुपहरिया-कफकारक, ग्राही, वात-पित्तनाशक और लघु है। [५७] ३० दुपहरिया हिं०-गुल दुपहरिया। बं०-बान्धुली। म०-तांबडी दुपारी। गु०-बपोरियो। ता०-नागपू। पं०-गुल दुपहरिया। ले०-Pentapetes phoenicea Linn. (पेण्टापेटिस् फीनीसिया)। Fam. Sterculiaceae (स्टर्क्युलिएसी)। यह उत्तर पश्चिम भारत, बंगाल तथा गुजरात में पाया जाता है। सभी भागों में बागों में लगाया भी जाता है। यह प्रायः जलाशयों में तथा चावल के खेतों में होता है। इसका क्षुप-२-५ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-३-५ इञ्च लम्बे, प्रासवत्, तीक्ष्ण दन्तुर अथवा गोल-अभ्यारावत् तथा केवल एक शिरावाले होते हैं। पुष्प-लाल रंग के, बड़े तथा दण्ड पर दो-दो एक साथ नीचे की तरफ लटके रहते हैं। दोपहर के समय खिलने से इसे गुल दुपहरिया कहते हैं। फल-कुछ लम्ब गोल, खुरदरा तथा पाँच विभागों से युक्त, जिनमें प्रत्येक में ८-१२ बीज रहते हैं। पुष्प काल-जुलाई में बीज बोने से सितम्बर, अक्तूबर तक फूलता है। इसके मूल, पुष्प तथा फल का उपयोग किया जाता है। वक्तव्य-यद्यपि राजनिघंटु ने इसके कृष्ण, श्वेत, पीत तथा रक्त चार भेद लिखे हैं तथापि केवल श्वेत भेद पाया जाता है। चरक दशोमानि में इसका उल्लेख नहीं है। विषचिकित्सा (चि० अ० २५-१७९) में इसके मूल से नस्य के लिए लिखा है। सुश्रुत इसकी जड़ ऊर्ध्वभाग हर गण में उल्लेख करते हैं। कुछ विद्वानों ने Ixora (आइक्जोरा) की जाति तथा कुछ ने Hibiscus (हिबिस्कस्) की जाति को बन्धूक लिखा है। गुण और प्रयोग-यह विषघ्न एवं स्नेहन है। फल में स्नेहन धर्म है। मूल ऊर्ध्वभाग दोषहर है। अथ जपापुष्पम् (गुड़हर, अढ़ौल) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह ओड्रपुष्पं जपा चाथ त्रिसन्ध्या साऽरुणा सिता। जपा संग्राहिणी केश्या त्रिसन्ध्या कफवातजित् ।।५८।। अढ़ौल के नाम-ओड्रपुष्प और जपा हैं। लाल तथा सफेद फूल वाली अढ़ौल का नाम-त्रिसन्ध्या है। जपा- संग्राही और केशों का उत्तम बनाने वाला होता है। त्रिसन्ध्या-कफ तथा वायु को नाश करने वाली होती है। [५८] ३१. गुड़हर हिं०-ओड़हुल, ओ(अ)ड़हुल, अढ़ौल, गुड़हल, जवाकुसुम। बं०-जबाफुल। म०-जास्वन्द। गु०-जासुद, जासुस। ते०-दासनमु। ता०-शष्पात्तुप्पु। क०-दासणिगे। फा०-अंगिरा हिन्दी। अं०-Shoe Flower (शू फ्लावर)। ले०-Hibiscus rosa-sinensis Linn. (हिबिस्कस् रोजा साइनेन्सिस्)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। यह प्रायः सब प्रान्त के बागों में रोपण किया जाता है! इसका गुल्म-छोटा, सदाहरित, काष्ठीय, सुन्दर एवं ५-८ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-चमकीले हरे, अंडाकार, दन्तुर तथा शहतूत के जैसे होते हैं। पुष्प-प्रायः लाल, घंटाकार, बड़े, ४-६ इञ्च व्यास में एवं जननांग बीच से बाहर निकले हुए रहते हैं। फली-गोलाकार तथा अनेक बीजों से युक्त होती है। विविध प्रकार के फूलों जैसे इकहरे, दोहरे तथा लाल, पीले, सफेद रंग के भेदों से यह कई प्रकार का पाया जाता है तथा हमेशा फूलता रहता है। इसके पुष्प, कलिका तथा मूलत्वक् का उपयोग किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
६६६ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन-इसके पुष्प के खाने योग्य भाग (६१.६%) में प्रति १०० ग्राम में कैल्शियम् (Calcium, 4.04), फास्फोरस् (Phosphorus, 26. 68) एवं लोह (Iron, 1.69) मिलीग्राम पाया गया है। इनके अतिरिक्त थियामिन (Thiamine, 0-031 mg. %), राइबोफ्लेविन (Riboflavin, 0.058 mg. %), नियासिन (Niacin, 0-61 mg. %) एवं विटामिन सी (Ascorbic acid 4.16 mg.%) पाये जाते हैं। फूलों को पीसकर उससे एक रंग प्राप्त किया जाता है जिसका उपयोग बाल, भौं तथा मदिरा आदि रंगने के काम में करते हैं। पत्तों में केरोटीन (Carotene, 7-34 mg. per. 100 g. of fresh material) पाया जाता है जिनका चारे के लिए उपयोग करते हैं। गुण और प्रयोग-जपा ग्राही, रक्तसंग्राहक, केश्य, हृद्य एवं मस्तिष्क के लिये बलप्रद है। इसका प्रयोग प्रदर, प्रमेह एवं ज्वर में किया जाता है। (१) काली गाय के मूत्र में फलों को पीसकर लगाने से गंजापन दूर होकर बाल बढ़ते हैं। ताजे फूलों को पीसकर लगाने से बालों का रंग सुन्दर हो जाता है। (२) फूल की १०-१२ कलियाँ दूध में पीसकर पिलाने से तथा पथ्य में दूध देने से प्रदर अच्छा होता है। (३) यूनानी वाले इसका शर्बत हृदय तथा मस्तिष्क की दुर्बलता, उन्माद तथा पैत्तिक ज्वर में देते हैं। (४) इसकी जड़ अल्थिया (Althaea) के स्थान पर खांसी के लिए काम में लाई जाती है। (५) मुँह के छाले में इसे चबाने से लाभ होता है। मात्रा-पुष्प ३-६ माशा। अथ सिन्दूरी (सेन्दुरिया)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह सिन्दूरी रक्तबीजा च रक्तपुष्पा सुकोमला। सिन्दूरी विषपित्तास्रतृष्णावान्तिहरी हिमा ।।५९।। सेन्दुरिया के संस्कृत नाम-सिन्दूरी, रक्तबीजा, रक्तपुष्पा और सुकोमला ये सब हैं। सेन्दुरिया-शीतल तथा विष, पित्त, रक्तविकार, तृषा और वमन को दूर करने वाली है। [५९] ३२. सिन्दुरिया हिं०-सें (सिं) दुरिया, लटकन, सदा सुहागन। बं०-लटकन। म०-शेन्द्री। ता०, ते०-जाफर। ले०- Bixa orellana Linn. (बिक्सा ओरिलाना)। Fam. Bixaceae (बिक्सेसी)। सेंन्दुरिया-एक प्रसिद्ध फूल है जिसके वृक्ष को बागों में लगाते हैं तथा दक्षिण, बंगाल तथा आसाम में भी कहीं- कहीं पाया जाता है। मैसूर में इसकी खेती भी की जाती है। इसका वृक्ष-छोटा, शाखा प्रशाखाओं करके सघन, झाड़दार एवं सुन्दर होता है। पत्ते-हृद्वत्, लम्बाग्र, चिकने, चमकीले एवं ४-६ इञ्च होते हैं। पुष्प-छोटे, गुलाबी, पाँच अन्तर्दलवाले एवं बीच से स्त्री केशर बाहर निकला रहता है। फल-धतूरा की तरह मृदु कंटकित होता है। बीज-करीब ५०, छोटे एवं सिन्दूरवर्ण स्तर से ढँके हुए होते हैं जिनसे एक रंग तैयार किया जाता है। इसका एक अन्य प्रकार होता है जिसमें पुष्प श्वेत एवं फल हरा रहता है। इसमें के रंग को निकालने के लिये बीजों को कूटकर गरम जल में मसलकर लकड़ी के पात्रों में कई दिन रखते हैं। फिर छानकर १ सप्ताह और रखते हैं। फिर नीचे बैठे हुए रंग को अलग कर सुखा लेते हैं। बीजों में यह रंग अॅन्नाटो CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
पुष्पवर्गः ६६७ (Annatto) ४.८-६% होता है जिसका उपयोग अहितकर न होने के कारण खाद्यपदार्थों जैसे मक्खन, दूध तथा तेलों के रँगने में किया जाता है। यह तैल विलेय होता है। चिकित्सा में पंचांग का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—बीजों में प्रधान रंजक द्रव्य बिक्सिन (Bixin, C₂₅ H₃₀ O₄) तथा स्नेह, राल तथा तिक्त पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—इसका फल मज्जा ग्राही है किन्तु अधिक मात्रा में संसन है। बीज एवं मूल रोचक, ज्वरघ्न एवं ग्राही हैं। (१) मूल की छाल ज्वर में दी जाती है। (२) बीज सोजाक में देते हैं। (३) पत्तों का फांट कामला में दिया जाता है। मात्रा—छाल ३ से ६ माशे। अथ मुनिवृक्षः (अगस्तिया) । तस्य नामानि गुणांश्चाह अथागस्त्यो वङ्गसेनो मुनिपुष्पो मुनिद्रुमः ।।६०।। अगस्तिः पित्तकफजिच्चातुर्थिकहरो हिमः । रूक्षो वातकरस्तिक्तः प्रतिश्यायनिवारणः ।।६१।। अगस्तिया के संस्कृत नाम—अगस्त्य, वङ्गसेन, मुनिपुष्प, अगस्ति और मुनिद्रुम ये सब हैं। अगस्तिया— तिक्तरसयुक्त, शीतल, रूक्ष, वातकारक एवम् पित्त, कफ, चातुर्थिक (चौथिया) ज्वर और प्रतिश्याय (जुखाम) को दूर करने वाला है। [६०-६१] इसके पुष्प के गुण आगे शाकवर्ग में दिये हुये हैं। ३३. अगस्त हिं०—अगस्त, हथिया, अगथिया, अगस्तिया। बं०—बक। म०—हदगा, अगस्ता। क०—अगचे। गु०— अगथियो। ते०—अविसी। ता०—अगति। ले०—Sesbania grandiflora Linn. (सेस्बेनिया ग्रॅण्डीफ्लोरा)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। इसको बागों में लगाते हैं तथा दक्षिण एवं बंगाल में विशेष रूप से होता है। इसका वृक्ष—१५-२० फीट ऊँचा, सीधा तथा शीघ्र बढ़ने वाला होता है। पत्ते—संयुक्त, एकान्तर, ६-१२ इञ्च लम्बे, शिरीष जैसे होते हैं। पत्रक—१६ से ३० युग्म, आयताकार एवं कुंठिताग्र होते हैं। पुष्प—२ से ४ इञ्च लम्बे, श्वेत एवं लाल तिरछे तथ नौकाकार आते हैं। फली—लटकती हुई, १२-१५ इञ्च लम्बी, पतली एवं चारधार वाली होती है। अगस्ततारा के उदय काल (प्रायः सितम्बर) में पुष्प लगते हैं और पौष में फली पक जाती है। पुष्प एवं कोमल पत्तों का शाक एवं आचार बनाते हैं। इसकी छाल, पत्र, पुष्प एवं मूल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके पुष्प वातकर एवं क्षय, कासनाशक तथा रतौंधी में लाभकर हैं। (सु० सू० अ० ४६)। मूल उष्ण, वातहर, कफघ्न एवे शोथघ्न है। पत्र आनुलोमिक एवं शिरोविरेचन हैं। छाल ग्राही है। इसका उपयोग कास, प्रतिश्याय, ज्वर एवं नेत्ररोगों में किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
६६८ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) फुफ्फुसपाक में मूल त्वक पान के साथ या स्वरस १ से २ तोला मात्रा में मधु के साथ देने से कफ निकलता है तथा पसीना आकर ज्वर कम होता है। (२) प्रतिश्याय में शिरःशूल तथा नेत्र विकार में पुष्प एवं पत्र स्वरस का नस्य देते हैं। (३) अनार्तव में पुष्पों का साग देते हैं। (४) मसूरिका में छाल का फांट दिया जाता है। (५) चोट लगने पर पत्तों का लेप एवं संधिशोथ में मूल का लेप किया जाता है। (६) दृष्टिमांद्य में पुष्प रस आँख में डालते हैं। मात्रा-मूल स्वरस १ से २ तोला। अथ तुलसी शुक्ला कृष्णा च। तयोर्नामगुणानाह तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमञ्जरी। अपेतराक्षसी गौरी भूतघ्नी देवदुन्दुभिः ॥६२॥ तुलसी कटुका तिक्ता हृद्योष्णा दाहपित्तकृत्। दीपनी कुष्ठकृच्छ्रास्रपार्श्वरुककफवातजित् ।। शुक्ला कृष्णा च तुलसी गुणैस्तुल्या प्रकीर्त्तिता ।।६३।। तुलसी के संस्कृत नाम-तुलसी, सुरसा, ग्राम्या, सुलभा, बहुमञ्जरी, अपेतराक्षसी, गौरी, भूतघ्नी, देवदुन्दुभि ये सब हैं। तुलसी-कटु तथा तिक्तरस युक्त, हृदय को हितकर, उष्ण, दाह तथा पित्त कारक, अग्निदीपक एवम् कुष्ठ, मूत्रकृच्छ्र, रक्तविकार, पसली की पीड़ा, कफ और वायु को दूर करने वाली है। सफेद तथा काली तुलसी दोनों ही गुणों में समान मानी जाती हैं। [६२-६३] ३४. तुलसी हिं०-तुलसी। बं०-तुलसी। गु०-तुलसी। ते०-गग्गेर चेट्टु। म०-तुलस। ता०-तुलशी। क०-ऐरेड तुलसी। अं०-Holy Basil (होली बेसील)। ले०-Ocimum sanctum Linn. (ओसीमम् सेंक्टम्)। Fam. Labitatae (लेबिटएटी)। यह प्रायः सब गरम और साधारण प्रान्तों के वन उपवनों में आप ही उत्पन्न होती है और पवित्र मानी जाने से घर में भी लगाते हैं। यह क्षुप-जाति की वनस्पति १ से २।। फीट तक ऊँची होती है और समस्त क्षुप से तीव्र गन्ध आती है। शाखायें सीधी और फैली हुई रहती हैं। पत्ते-१ से २ इञ्च तक लम्बे और अंडाकार तथा सुगंधित होते हैं। शाखाओं के अन्त में मञ्जरी लगती है। जिसके पत्ते हरे सफेदी लिये होते हैं उसको सफेद तुलसी और जिसके पत्ते और डंडियाँ कालापन युक्त हरे होते हैं उसको काली तुलसी कहते हैं। तुलसी की अन्य भी कई जातियाँ (Species) पाई जाती हैं जिनमें से ऑ० ग्रेटिस्सिमम् (O. gratissimum Linn.) को रामतुलसी कहते हैं। कृष्णतुलसी अधिक गुणकारी समझी जाती है। इसके पत्ते एवं बीजादि का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में ०.७% उड़नशील तैल पाया जाता है जो कफनिःसारक, प्रतिदूषक तथा कीड़ों को भगाता है। गुण और प्रयोग-तुलसी के पत्र या उसका स्वरस उष्ण, रूक्ष, कफनिःसारक, शीतहर, वातहर, स्वेद जनन, दीपन, कृमिघ्न, दुर्गन्धनाशक एवं प्रतिदूषक हैं। इसका उपयोग कास, श्वास, पार्श्वशूल, विषमज्वर, बाल्यकृत् वृद्धि, विषविकार एवं पाचन के विकारों में करते हैं। इसका विशेष प्रयोग इन व्याधियों में अन्य औषधि के अनुपान के रूप में किया जाता है।
इसके बीज मधुर, स्निग्ध, शीत एवं मूत्र जनन होते हैं जिनका उपयोग मूत्रकृच्छ्रादि विकारों में किया जाता है। पत्तों के स्वरस का बाह्य उपयोग कर्णशूल, व्रण, प्रक्षालन, कृमि-कीट-दंश एवं चर्मरोगों में किया जाता है। मात्रा-स्वरस १ से २ तोला; बीज १ से २ माशा। अथ मरुबकः (मरूआ)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह मारुतोऽसौ मरुबको मरुन्मरुरपि स्मृतः। फणी फणिज्जकश्चापि प्रस्थपुष्पः समीरणः।।६४।। मरुदग्निप्रदो हृद्यस्तीक्ष्णोष्णः पित्तलो लघुः।।६५।। वृश्चिकादिविषश्लेष्मवातकुष्ठक्रिमिप्रणुत्। कटुपाकरसो रुच्यपाकरसो रूक्षः सुगन्धिकः।।६६।। मरूआ के संस्कृत नाम-मारुत, मरुबक, मरुत्, मरु, फणी, फणिज्जक, प्रस्थपुष्प, समीरण ये सब हैं। मरूआ-पाक तथा रस में कटु, रुचिकारक, तिक्त रसयुक्त, रूक्ष, सुगन्धयुक्त, अग्निवर्धक, हृदय को हितकर, तीक्ष्ण, उष्ण, पित्तजनक, लघु एवम् बिच्छु आदि के विष, कफ, वात, कुष्ठ और क्रिमी का नाशक है।[६४-६६] ३५. मरूआ हिं०-मरूआ, मरुवा। बं०-मुर्रु। म०-मरवा। गु०-मरवो। ते०-मरवमु। फा०-मरजन, जोस। अं०- (स्वीट मारजोरम्)। ले०-Origanum majorana Linn. (ऑरीगेनम मँजोराना)। Fam. Labiatae (लेबिएटी)। मरूआ प्रायः सब प्रान्तों की वाटिकाओं में रोपण किया जाता है। यह क्षुपजाति की वनस्पति १-२ फीट ऊंची होती है और इससे सुगन्धि आती है। पत्ते-लम्बे अंडाकार किञ्चित् लालिमायुक्त सफेदी मायल एवं सुगन्धित होते हैं। उस पर तुलसी के समान मञ्जरी लगती है। सफेद और काले रंगों के भेद से यह दो प्रकार का होता है। इनमें सफेद, औषधि और काला शिव-पूजन के काम में आता है।।३९।। इसके पंचांग एवं उसकी राख का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें सुगन्धित्तैल तथा कुछ तिक्त पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसमें सुगन्धि, वातानुलोमक, स्वेदजनन, आर्तवजनन, कफनिःसारक, यकृतबल्य एवं कुष्ठघ्न है। इसका उपयोग आधमान, शूलादि पाचन विकार, प्रतिश्याय, अनार्तव एवं व्रण के लिये करते हैं। (१) उदरशूल में पत्तों को सफेद हरहुर के पत्तों के साथ देते हैं। अतिसार में फांट देते हैं। (२) इसका स्वरस या पंचांग की राख व्रण रोपण एवं वेदनास्थापन होने से पुराने व्रण में लाभ करती है। मात्रा- स्वरस ५-१० बूँद; तैल २-६ बूँद; पंचांग ५-३० रत्ती। अथ दमनकः (दवना)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह उक्तो दमनको दान्तो मुनिपुत्रस्तपोधनः। गन्धोत्कटो ब्रह्मजटो विनीतः कलपत्रकः।।६७।। दमनस्तुवरस्तिक्तो हृद्यो वृष्यः सुगन्धिकः। ग्रहणाद् विषकुष्ठास्रक्लेदकण्डूत्रिदोषजित्।।६८।। दवना के संस्कृत नाम-दमनक, दान्त, मुनिपुत्र, तपोधन, गन्धोत्कट, ब्रह्मजट, विनीत, कलपत्रक और दमन ये सब हैं। दवना-कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, हृदय को हितकर, वृष्य (वीर्य वर्धक), सुगन्धित एवम् विष, कुष्ठ, रक्तविकार, क्लेद, खुजली तथा त्रिदोष का नाशक है।[६७-६८] नोट-अनेक विद्वानों ने दमनक का ले. ना. आ. सिवरसियाना (A. siversiana) दिया है।
६७० भावप्रकाशनिघण्टुः ३६. दवना हिं०-दौना, दवना। बं०-दोना। म०-दवणा। गु०-डमरो। अ०-अफसंतीन। ले०-Artemisia vulgaris Linn. (आर्टिमिसिया वर्ल्गेरिस्) । Fam. Compositae (कम्पोजिटी) । इसको वाटिकाओं में लगाते हैं। पश्चिम हिमालय, खासिया पहाड़, आबू, पश्चिम घाट, कोंकण, लंका आदि जगहों में यह आप ही आप जङ्गली उत्पन्न होता है। इसके क्षुप-४ से ८ फीट ऊँचे एवं गंध युक्त होते हैं। पत्ते-नीचे के २-४ इञ्च लम्बे, १-२ इञ्च चौड़े, सनाल, लट्वाकार, एक या दो बार पक्षाकार क्रम से विच्छिन्न, दोनों पृष्ठों पर रोमश एवं नीचे के पृष्ठ पर राख या श्वेत वर्ण के होते हैं। ऊपर के पत्ते प्रायः विनाल, रेखाकार मालाकार, सरल धार वाले तथा तीन विच्छेदों से युक्त होते हैं। इसको डॉ० देसाई ने सुरपर्ण नाम दिया है तथा दमनक, आ० सिवरसियाना को माना है। इसके पंचांग का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें ०.२% उड़नशील तैल पाया जाता है। इसमें यवक्षार पर्याप्त मात्रा में रहता है। गुण और प्रयोग-यह तिक्त, दीपन, पाचन, उद्वेष्ठनरोधी, आर्तवजनन, आनुलोमिक, वामक एवं व्रणरोपण है। इसका फांट वातरोग, उद्वेष्ठनयुक्त रोग, श्वास एवं भूतोन्माद में देते हैं। बालकों की उदर सम्बन्धी व्याधियों, आध्मान, कृमि आदि में यह बहुत उपयोगी है। इसके क्वाथ से दुष्ट व्रण प्रक्षालन किया जाता है तथा कर्णशूल में इसके स्वरस को डालते हैं। मात्रा-स्वरस ५-१० बूँद। अथ बर्बरी (वनतुलसी)। तस्या भेदसहितं नामानि गुणाँश्चाह बर्बरी तुवरी तुङ्गी खरपुष्पाऽजगन्धिका। पर्णाशस्तत्र कृष्णो कठिल्लककुठेरकौ ।।६९।। तत्र शुक्लेऽर्जकः प्रोक्तो वटपत्रस्ततोऽपरः। बर्बरीत्रितयं रूक्षं शीतं कटु विदाहि च ।।७०।। तीक्ष्णं रुचिकरं हृद्यं दीपनं लघुपाकि च। पित्तलं कफवातास्रकण्डूकृमिविषापहम् ।।७१।। वन तुलसी के संस्कृत नाम-बर्बरी, तुवरी, तुङ्गी, खरपुष्पा, अजगन्धिका, पर्णाश ये सब हैं। काली वन तुलसी का संस्कृत नाम-कठिल्लक और कुठेरक है। सफेद वन तुलसी का संस्कृत नाम अर्जक है। तीसरी जाति की वन तुलसी का संस्कृत नाम-वटपत्र है। तीनों बर्बरी-रूक्ष, शीतल, कटुरसयुक्त विदाही, तीक्ष्ण, रुचिकारक, हृदय को हितकर, अग्निदीपक, पाक में लघु, पित्तजनक तथा कफ, वात, रक्तविकार, खुजली, कृमि और विष का नाशक होती है। [६९-७१] नोट-भावप्रकाशकार बर्बरी के ३ भेद लिखते हैं। (१) कठिल्लक, कुठेरक (कृष्णपुष्प)। (२) अर्जक (श्वेतपुष्प)। (३) वटपत्र। अन्य निघण्टुओं ने भी इसी प्रकार या तो इन्हें स्वतंत्र या एक दूसरे का भेद बतलाया है। ये सभी तुलसी वर्ग के ही द्रव्य मालूम पड़ते हैं। बर्बरी यह ऑ० बेसिलिकम् (O. basilicum Linn.) है। ऑर्थोसिफॉन् ग्रेण्डिफ्लोरस् (Orthosiphon grandiflorus Boldingh) के अर्जक होने की संभावना पर विचार करने के लिये श्री ठा० बलवन्त सिंह जी ने 'बिहार की वनस्पतियाँ' में लिखा है क्योंकि इसको बनारस के आसपास अजगुर कहा भी जाता है तथा डल्हणोक्त 'अर्जकः बर्बरिकाकारो लघुमंजरीकः सूक्ष्मपत्रो निर्गंधः श्वेतकुठेरकः (सु० सू० अ० ३८-१८) वचन भी इसके लिये ठीक बैठता है।
पुष्पवर्गः ६७१ ३७. बर्बरी (सबजा) हिं०- बर्बरी, बर्बरी, वन तुलसी, बर्बर, सबजा। बं. - बाबुई तुलसी। म०-सबजा। गु० - डमरो, रान तुलसी। ते० - भू तुलसी। ता०-तिरतुत्पतची। प० - बबरि। अं० - Common-Sweet-Basil (कामन स्वीट् बेसिल्)। ले०-Ocimum basili-cum Linn. (ऑसीमम् बेसिलीकम्)। Fam. Labiatae (लेबिएटी)। यह भारत के गरम तथा साधारण प्रान्तों में विशेष कर पंजाब में अधिक पाई जाती है। सभी प्रान्तों में बागों में लगाई हुई भी पाई जाती है। इसका क्षुप-सीधा, १-२ फीट तक ऊँचा होता है। शाखायें-हरे रंग की अथवा फीकी पीलापन युक्त हरे रंग की होती हैं। पत्ते - १-२ इञ्च लम्बे, अंडाकार और नोकीले होते हैं। शाखाओं के अन्त में फूलों की मञ्जरी लगती है। उसी में बीजकोष लगते हैं। बीज - नन्हें-नन्हें काले रंग के किंचित् लम्बे, एक ओर महराब का चिह्न और दूसरी ओर चिपटे तथा मोटी नोकवाले होते हैं। वे गन्धहीन होते हैं परन्तु उनका स्वाद तेलिया और कुछ चरपरा होता है। इनको पानी में भिगोने से लुबाबदार से दीख पड़ते हैं। इन्हें तुख्म शर्बती कहते हैं। किसी ने इसे तुख्म रेंहाँ भी लिखा है। इसके पंचांग तथा बीज का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक सुगंधित तैल पाया जाता है। यह पीताभ हरा एवं जल से हलका होता है। रखने से यह जमकर इसके रवे बनते हैं जिन्हें बेसिल केंफर (Basil camphor) कहते हैं। गुण और प्रयोग-इसका स्वरस तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष, वात प्रशमन, वातनाड़ी संस्थान उत्तेजक, स्वेदजनन एवं कृमिघ्न हैं। इसके बीज मधुर, स्निग्ध, शीतल, मूत्रजनन एवं स्तंभन हैं। इसका प्रयोग उन्माद, संन्यास, जीर्णवातिक ज्वर, कास, अजीर्ण, अतिसार, सर्प एवं वृश्चिक विष, दद्रु एवं व्रण में किया जाता है। (१) कास में इसका स्वरस मधु के साथ पिलाते हैं। इसमें बीज का फांट भी लाभदायक है। (२) बीज का फांट ग्राही होने के कारण आमातिसार में देते हैं। (३) सर्पविष में इसका स्वरस ४-५ तोला, चार-चार घंटे पर पिलाते हैं। बिच्छू काटने पर पत्तों को पीसकर लेप करते हैं। (४) कर्णपीड़ा, दंतशूल आदि में स्वरस का बाह्य प्रयोग किया जाता है। सर की रूसी, दाद आदि में स्वरस लगाने से लाभ होता है। बीजों को धोकर व्रण पर बाँधते हैं। (५) सोजाक में बीजों का फांट दिया जाता है। (६) वाजीकरण के लिये बीज १ से २ ड्राम की मात्रा में देते हैं। मात्रा-स्वरस १/२-१ चाय का चम्मच; बीज १/४ से १/२ तोला, दुग्ध एवं शर्करा के साथ फांट बनाकर। इति श्रीमिश्रलट्कनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे पुष्पवर्गः समाप्तः। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ वटादिवर्गः तत्रादौ वटः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह वटो रक्तफलः शृङ्गी न्यग्रोधः स्कन्धजो ध्रुवः । क्षीरी वैश्रवणो वासो बहुपादो वनस्पतिः ॥१॥ वटः शीतो गुरुर्ग्राही कफपित्तव्रणापहः । वर्ण्यो विसर्पदाहघ्नः कषायो योनिदोषहृत् ॥२॥ बरगद के संस्कृत नाम-वट, रक्तफल, शृङ्गी, न्यग्रोध, स्कन्धज, ध्रुव, क्षीरी, वैश्रवण, वास, बहुपाद, वनस्पति ये सब हैं। बरगद-कषाय रसयुक्त, शीतल, गुरु, ग्राही, शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला एवम् कफ, पित्त, व्रण, विसर्प, दाह और योनिसंबन्धी दोषों को दूर करता है। [१-२] १. बड़ हिं०-बड़, बरगद। बं०-वट, बड़गाछ। म०-वड। क०-आल, आलदमारा। ते०-मारि। गु०-बड़। फा०-दरख्तेरीश। अ०-कविरूल अश्जार। अं०-Banyan Tree (बनियन ट्री)। ले०-Ficus bengalensis Linn. (फाइकस् बेंगालेन्सिस्)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। यह सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। ग्राम के पास लोग इसको पवित्र जान कर लगाते हैं। हिमालय के जङ्गल और दक्खन के पहाड़ियों पर यह जंगली उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष-बहुत विशाल और शाखायें फैली हुई प्रायः भूमि की ओर नत हो जाती हैं। पत्ते-लम्बे-चौड़े और मोटे होते हैं। फल-छोटे-छोटे झरबेर के समान, कच्ची अवस्था में हरे रंग के और पकने पर लाल हो जाते हैं। शाखाओं से लाल तथा पीले रंग के अङ्कुर निकल कर भूमि की ओर बढ़ते हैं। इसको वटजटा, बरोह या बड़ की दाढ़ी कहते हैं। यह जटा बढ़ते-बढ़ते पृथ्वी में घुस जाती हैं और खम्मे के समान दिखाई देती है। इसके पंचांग का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-छाल में ११% टैनिन होता है। गुण और प्रयोग-बड़ शीत, ग्राही, स्तम्भन, मूत्रसंग्रहणीय एवं व्रणरोपण है। (१) इसका क्षीर वेदनास्थापन एवं व्रणरोपण है तथा इसको कटिपीडा, सन्धिपीडा एवं बरसात में होने वाले हाथ- पैर की अंगुलियों के व्रणों पर लगाते हैं। सड़े हुये दाँत में लगाने से पीड़ा दूर होती है। (२) इसकी छाल का क्वाथ बहुमूत्र में एवं मधुमेह में देते हैं। छाल को अतिसार तथा प्रवाहिका में भी देते हैं। (३) वटजटा सोजाक में, वमन रोकने के लिये तथा बाह्य लेप के रूप में चर्मरोग में प्रयोग की जाती है। मात्रा-चूर्ण ३ से ६ माशा; क्वाथ ५ से १० तोला। अथ पिप्पलः (पीपल)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह बोधिद्रुः पिप्पलोऽश्वत्थश्चलपत्रो गजाशनः । पिप्पलो दुर्जरः शीतः पित्तश्लेष्मव्रणास्रजित् । गुरुस्तुवरको रूक्षो वर्ण्यो योनिविशोधनः ॥३॥ पीपल के संस्कृत नाम-बोधिद्रु, पिप्पल, अश्वत्थ, चलपत्र और गजाशन ये सब हैं। पीपल-कषाय रसयुक्त, CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA