भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्पवर्गः ६६५ दुपहरिया के संस्कृत नाम-बन्धूक, बन्धुजीव, रक्त, माध्याह्निक ये सब हैं। दुपहरिया-कफकारक, ग्राही, वात-पित्तनाशक और लघु है। [५७] ३० दुपहरिया हिं०-गुल दुपहरिया। बं०-बान्धुली। म०-तांबडी दुपारी। गु०-बपोरियो। ता०-नागपू। पं०-गुल दुपहरिया। ले०-Pentapetes phoenicea Linn. (पेण्टापेटिस् फीनीसिया)। Fam. Sterculiaceae (स्टर्क्युलिएसी)। यह उत्तर पश्चिम भारत, बंगाल तथा गुजरात में पाया जाता है। सभी भागों में बागों में लगाया भी जाता है। यह प्रायः जलाशयों में तथा चावल के खेतों में होता है। इसका क्षुप-२-५ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-३-५ इञ्च लम्बे, प्रासवत्, तीक्ष्ण दन्तुर अथवा गोल-अभ्यारावत् तथा केवल एक शिरावाले होते हैं। पुष्प-लाल रंग के, बड़े तथा दण्ड पर दो-दो एक साथ नीचे की तरफ लटके रहते हैं। दोपहर के समय खिलने से इसे गुल दुपहरिया कहते हैं। फल-कुछ लम्ब गोल, खुरदरा तथा पाँच विभागों से युक्त, जिनमें प्रत्येक में ८-१२ बीज रहते हैं। पुष्प काल-जुलाई में बीज बोने से सितम्बर, अक्तूबर तक फूलता है। इसके मूल, पुष्प तथा फल का उपयोग किया जाता है। वक्तव्य-यद्यपि राजनिघंटु ने इसके कृष्ण, श्वेत, पीत तथा रक्त चार भेद लिखे हैं तथापि केवल श्वेत भेद पाया जाता है। चरक दशोमानि में इसका उल्लेख नहीं है। विषचिकित्सा (चि० अ० २५-१७९) में इसके मूल से नस्य के लिए लिखा है। सुश्रुत इसकी जड़ ऊर्ध्वभाग हर गण में उल्लेख करते हैं। कुछ विद्वानों ने Ixora (आइक्जोरा) की जाति तथा कुछ ने Hibiscus (हिबिस्कस्) की जाति को बन्धूक लिखा है। गुण और प्रयोग-यह विषघ्न एवं स्नेहन है। फल में स्नेहन धर्म है। मूल ऊर्ध्वभाग दोषहर है। अथ जपापुष्पम् (गुड़हर, अढ़ौल) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह ओड्रपुष्पं जपा चाथ त्रिसन्ध्या साऽरुणा सिता। जपा संग्राहिणी केश्या त्रिसन्ध्या कफवातजित् ।।५८।। अढ़ौल के नाम-ओड्रपुष्प और जपा हैं। लाल तथा सफेद फूल वाली अढ़ौल का नाम-त्रिसन्ध्या है। जपा- संग्राही और केशों का उत्तम बनाने वाला होता है। त्रिसन्ध्या-कफ तथा वायु को नाश करने वाली होती है। [५८] ३१. गुड़हर हिं०-ओड़हुल, ओ(अ)ड़हुल, अढ़ौल, गुड़हल, जवाकुसुम। बं०-जबाफुल। म०-जास्वन्द। गु०-जासुद, जासुस। ते०-दासनमु। ता०-शष्पात्तुप्पु। क०-दासणिगे। फा०-अंगिरा हिन्दी। अं०-Shoe Flower (शू फ्लावर)। ले०-Hibiscus rosa-sinensis Linn. (हिबिस्कस् रोजा साइनेन्सिस्)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। यह प्रायः सब प्रान्त के बागों में रोपण किया जाता है! इसका गुल्म-छोटा, सदाहरित, काष्ठीय, सुन्दर एवं ५-८ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-चमकीले हरे, अंडाकार, दन्तुर तथा शहतूत के जैसे होते हैं। पुष्प-प्रायः लाल, घंटाकार, बड़े, ४-६ इञ्च व्यास में एवं जननांग बीच से बाहर निकले हुए रहते हैं। फली-गोलाकार तथा अनेक बीजों से युक्त होती है। विविध प्रकार के फूलों जैसे इकहरे, दोहरे तथा लाल, पीले, सफेद रंग के भेदों से यह कई प्रकार का पाया जाता है तथा हमेशा फूलता रहता है। इसके पुष्प, कलिका तथा मूलत्वक् का उपयोग किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA