भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६६४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका वृक्ष-ऊँचा तथा सुन्दर होता हैं। पत्ते- ६-१५ इञ्च बड़े, खण्डित, अखण्ड या दन्तुर, हृद्वत्, शिराविन्यास पाणिवत् तथा अधर तल पर श्वेत मृदुरोमश होते हैं। पुष्प-बड़े, श्वेत तथा सुगंधित होते हैं। आभ्यंतर दल ३ १/२- ४ १/२ इञ्च लम्बे होते हैं। फल-लंब गोल तथा कड़े होते हैं। इसके पुष्पों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह त्वच्य, वेदनाहर एवं रक्तस्तंभक हैं। (१) इसके फूल कांजी में पीसकर शिरःशूल में बाँधने से लाभ होता है। हिमांशु तैल में यह डाला जाता है। (२) पत्राधः रोम रक्तस्तंभक माने जाते हैं। (३) रक्तार्श में इसका लेप एवं घृत शर्करा के साथ बनाया हलुवा उपयोगी है। (४) चेचक के व्रणों पर इसके पुष्प एवं छाल को जलाकर कबीले के साथ मिलाकर लगाते हैं। अथ तिलकः (तिलाभपुष्पस्तिलकनाम्नैव प्रसिद्धः) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह तिलकः क्षुरकः श्रीमान्युरुषश्छन्नपुष्पकः ।। तिलकः कटुकः पाके रसे चोष्णो रसायनः । कफकुष्ठकिमीन्वस्तिमुखदन्तगदानहरेत् ।।५६।। २९. तिलक¹ हिं०-तिलक, तिलिया, तिलका। संथाल-हुण्डू। ले०-Wendlandia exerta DC. (वेण्डलैण्डिया एक्जर्टा) । Fam. Rubiaceae (रूबिएसी) । यह हिमालय के उष्ण प्रदेशीय शुष्क जंगलों में चेनाव से नेपाल तक, ४००० फीट की ऊँचाई तक एवं उड़ीसा, मध्यभारत कोंकण एवं उत्तरी डेक्कन में पाया जाता है। यह खुली हुई और छोटी-छोटी वनस्पतियों से रहित भूमि जैसे नालों के ढालों पर अधिक होते हैं। इसके वृक्ष-सुन्दर, झुके हुए तथा छोटे होते हैं। पत्ते-चर्मवत्, आयताकार या लट्वाकार-प्रासवत्, लम्बाग्र तथा ४-९ × १-३.५ इञ्च बड़े होते हैं। शिराएँ १०-१० जोड़ी तथा उपपत्र चौड़े, प्रायः लट्वाकार एवं अग्र पर टेढ़े होते हैं। पुष्प-१/६ इञ्च व्यास में, सुगन्धित एवं श्वेत होते हैं। आभ्यंतरदल मुड़े हुए एवं उनके स्वतंत्र खण्ड आभ्यंतरनाल से बड़े होते हैं। पुष्पकाल-मार्च, अप्रैल। उस समय वृक्ष का शिखर सफेद चाँदनी से ढँका मालूम पड़ता है। फल- १/२० इञ्च व्यास के, श्वेत एवं मृदुरोमावृत होते हैं। छाल-रक्ताभ होती है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल रेचक तथा चबाने से लालास्राव वर्धक होती है। अथ बन्धुजीवः (गोजुनिया) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह बन्धूको बन्धुजीवश्च रक्तो माध्याह्निकोऽपि च । बन्धूकः कफकृद् ग्राही वातपित्तहरो लघुः ।।५७।। १. नोट-निघण्टुओं में वर्णित इस तिलक वृक्ष के बारे में अभी तक किसी को पता नहीं था कि यह वृक्ष कैसा होता है तथा इसका लेटिन नाम क्या है। सर्वप्रथम श्री ठा. बलवन्तसिंह जी ने अपनी पुस्तक 'बिहार की वनस्पतियाँ' (पृ. ६८) में अनेक प्रमाणों के आधार पर तिलक को Wendlandia exerta DC. (वेण्डलैण्डिया एक्जर्टा) सिद्ध किया है तथा इसका वैज्ञानिक वर्णन किया है। इसके जंगलों में प्रचलित स्थानिक नाम, शास्त्रीय परिचयात्मक पर्याय तथा प्रचलित गुणकर्म सभी आधारों से यह तिलक सिद्ध होता है।