भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६६६ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन-इसके पुष्प के खाने योग्य भाग (६१.६%) में प्रति १०० ग्राम में कैल्शियम् (Calcium, 4.04), फास्फोरस् (Phosphorus, 26. 68) एवं लोह (Iron, 1.69) मिलीग्राम पाया गया है। इनके अतिरिक्त थियामिन (Thiamine, 0-031 mg. %), राइबोफ्लेविन (Riboflavin, 0.058 mg. %), नियासिन (Niacin, 0-61 mg. %) एवं विटामिन सी (Ascorbic acid 4.16 mg.%) पाये जाते हैं। फूलों को पीसकर उससे एक रंग प्राप्त किया जाता है जिसका उपयोग बाल, भौं तथा मदिरा आदि रंगने के काम में करते हैं। पत्तों में केरोटीन (Carotene, 7-34 mg. per. 100 g. of fresh material) पाया जाता है जिनका चारे के लिए उपयोग करते हैं। गुण और प्रयोग-जपा ग्राही, रक्तसंग्राहक, केश्य, हृद्य एवं मस्तिष्क के लिये बलप्रद है। इसका प्रयोग प्रदर, प्रमेह एवं ज्वर में किया जाता है। (१) काली गाय के मूत्र में फलों को पीसकर लगाने से गंजापन दूर होकर बाल बढ़ते हैं। ताजे फूलों को पीसकर लगाने से बालों का रंग सुन्दर हो जाता है। (२) फूल की १०-१२ कलियाँ दूध में पीसकर पिलाने से तथा पथ्य में दूध देने से प्रदर अच्छा होता है। (३) यूनानी वाले इसका शर्बत हृदय तथा मस्तिष्क की दुर्बलता, उन्माद तथा पैत्तिक ज्वर में देते हैं। (४) इसकी जड़ अल्थिया (Althaea) के स्थान पर खांसी के लिए काम में लाई जाती है। (५) मुँह के छाले में इसे चबाने से लाभ होता है। मात्रा-पुष्प ३-६ माशा। अथ सिन्दूरी (सेन्दुरिया)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह सिन्दूरी रक्तबीजा च रक्तपुष्पा सुकोमला। सिन्दूरी विषपित्तास्रतृष्णावान्तिहरी हिमा ।।५९।। सेन्दुरिया के संस्कृत नाम-सिन्दूरी, रक्तबीजा, रक्तपुष्पा और सुकोमला ये सब हैं। सेन्दुरिया-शीतल तथा विष, पित्त, रक्तविकार, तृषा और वमन को दूर करने वाली है। [५९] ३२. सिन्दुरिया हिं०-सें (सिं) दुरिया, लटकन, सदा सुहागन। बं०-लटकन। म०-शेन्द्री। ता०, ते०-जाफर। ले०- Bixa orellana Linn. (बिक्सा ओरिलाना)। Fam. Bixaceae (बिक्सेसी)। सेंन्दुरिया-एक प्रसिद्ध फूल है जिसके वृक्ष को बागों में लगाते हैं तथा दक्षिण, बंगाल तथा आसाम में भी कहीं- कहीं पाया जाता है। मैसूर में इसकी खेती भी की जाती है। इसका वृक्ष-छोटा, शाखा प्रशाखाओं करके सघन, झाड़दार एवं सुन्दर होता है। पत्ते-हृद्वत्, लम्बाग्र, चिकने, चमकीले एवं ४-६ इञ्च होते हैं। पुष्प-छोटे, गुलाबी, पाँच अन्तर्दलवाले एवं बीच से स्त्री केशर बाहर निकला रहता है। फल-धतूरा की तरह मृदु कंटकित होता है। बीज-करीब ५०, छोटे एवं सिन्दूरवर्ण स्तर से ढँके हुए होते हैं जिनसे एक रंग तैयार किया जाता है। इसका एक अन्य प्रकार होता है जिसमें पुष्प श्वेत एवं फल हरा रहता है। इसमें के रंग को निकालने के लिये बीजों को कूटकर गरम जल में मसलकर लकड़ी के पात्रों में कई दिन रखते हैं। फिर छानकर १ सप्ताह और रखते हैं। फिर नीचे बैठे हुए रंग को अलग कर सुखा लेते हैं। बीजों में यह रंग अॅन्नाटो CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA