भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्पवर्गः ६६७ (Annatto) ४.८-६% होता है जिसका उपयोग अहितकर न होने के कारण खाद्यपदार्थों जैसे मक्खन, दूध तथा तेलों के रँगने में किया जाता है। यह तैल विलेय होता है। चिकित्सा में पंचांग का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—बीजों में प्रधान रंजक द्रव्य बिक्सिन (Bixin, C₂₅ H₃₀ O₄) तथा स्नेह, राल तथा तिक्त पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—इसका फल मज्जा ग्राही है किन्तु अधिक मात्रा में संसन है। बीज एवं मूल रोचक, ज्वरघ्न एवं ग्राही हैं। (१) मूल की छाल ज्वर में दी जाती है। (२) बीज सोजाक में देते हैं। (३) पत्तों का फांट कामला में दिया जाता है। मात्रा—छाल ३ से ६ माशे। अथ मुनिवृक्षः (अगस्तिया) । तस्य नामानि गुणांश्चाह अथागस्त्यो वङ्गसेनो मुनिपुष्पो मुनिद्रुमः ।।६०।। अगस्तिः पित्तकफजिच्चातुर्थिकहरो हिमः । रूक्षो वातकरस्तिक्तः प्रतिश्यायनिवारणः ।।६१।। अगस्तिया के संस्कृत नाम—अगस्त्य, वङ्गसेन, मुनिपुष्प, अगस्ति और मुनिद्रुम ये सब हैं। अगस्तिया— तिक्तरसयुक्त, शीतल, रूक्ष, वातकारक एवम् पित्त, कफ, चातुर्थिक (चौथिया) ज्वर और प्रतिश्याय (जुखाम) को दूर करने वाला है। [६०-६१] इसके पुष्प के गुण आगे शाकवर्ग में दिये हुये हैं। ३३. अगस्त हिं०—अगस्त, हथिया, अगथिया, अगस्तिया। बं०—बक। म०—हदगा, अगस्ता। क०—अगचे। गु०— अगथियो। ते०—अविसी। ता०—अगति। ले०—Sesbania grandiflora Linn. (सेस्बेनिया ग्रॅण्डीफ्लोरा)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। इसको बागों में लगाते हैं तथा दक्षिण एवं बंगाल में विशेष रूप से होता है। इसका वृक्ष—१५-२० फीट ऊँचा, सीधा तथा शीघ्र बढ़ने वाला होता है। पत्ते—संयुक्त, एकान्तर, ६-१२ इञ्च लम्बे, शिरीष जैसे होते हैं। पत्रक—१६ से ३० युग्म, आयताकार एवं कुंठिताग्र होते हैं। पुष्प—२ से ४ इञ्च लम्बे, श्वेत एवं लाल तिरछे तथ नौकाकार आते हैं। फली—लटकती हुई, १२-१५ इञ्च लम्बी, पतली एवं चारधार वाली होती है। अगस्ततारा के उदय काल (प्रायः सितम्बर) में पुष्प लगते हैं और पौष में फली पक जाती है। पुष्प एवं कोमल पत्तों का शाक एवं आचार बनाते हैं। इसकी छाल, पत्र, पुष्प एवं मूल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके पुष्प वातकर एवं क्षय, कासनाशक तथा रतौंधी में लाभकर हैं। (सु० सू० अ० ४६)। मूल उष्ण, वातहर, कफघ्न एवे शोथघ्न है। पत्र आनुलोमिक एवं शिरोविरेचन हैं। छाल ग्राही है। इसका उपयोग कास, प्रतिश्याय, ज्वर एवं नेत्ररोगों में किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA