भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६८ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) फुफ्फुसपाक में मूल त्वक पान के साथ या स्वरस १ से २ तोला मात्रा में मधु के साथ देने से कफ निकलता है तथा पसीना आकर ज्वर कम होता है। (२) प्रतिश्याय में शिरःशूल तथा नेत्र विकार में पुष्प एवं पत्र स्वरस का नस्य देते हैं। (३) अनार्तव में पुष्पों का साग देते हैं। (४) मसूरिका में छाल का फांट दिया जाता है। (५) चोट लगने पर पत्तों का लेप एवं संधिशोथ में मूल का लेप किया जाता है। (६) दृष्टिमांद्य में पुष्प रस आँख में डालते हैं। मात्रा-मूल स्वरस १ से २ तोला। अथ तुलसी शुक्ला कृष्णा च। तयोर्नामगुणानाह तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमञ्जरी। अपेतराक्षसी गौरी भूतघ्नी देवदुन्दुभिः ॥६२॥ तुलसी कटुका तिक्ता हृद्योष्णा दाहपित्तकृत्। दीपनी कुष्ठकृच्छ्रास्रपार्श्वरुककफवातजित् ।। शुक्ला कृष्णा च तुलसी गुणैस्तुल्या प्रकीर्त्तिता ।।६३।। तुलसी के संस्कृत नाम-तुलसी, सुरसा, ग्राम्या, सुलभा, बहुमञ्जरी, अपेतराक्षसी, गौरी, भूतघ्नी, देवदुन्दुभि ये सब हैं। तुलसी-कटु तथा तिक्तरस युक्त, हृदय को हितकर, उष्ण, दाह तथा पित्त कारक, अग्निदीपक एवम् कुष्ठ, मूत्रकृच्छ्र, रक्तविकार, पसली की पीड़ा, कफ और वायु को दूर करने वाली है। सफेद तथा काली तुलसी दोनों ही गुणों में समान मानी जाती हैं। [६२-६३] ३४. तुलसी हिं०-तुलसी। बं०-तुलसी। गु०-तुलसी। ते०-गग्गेर चेट्टु। म०-तुलस। ता०-तुलशी। क०-ऐरेड तुलसी। अं०-Holy Basil (होली बेसील)। ले०-Ocimum sanctum Linn. (ओसीमम् सेंक्टम्)। Fam. Labitatae (लेबिटएटी)। यह प्रायः सब गरम और साधारण प्रान्तों के वन उपवनों में आप ही उत्पन्न होती है और पवित्र मानी जाने से घर में भी लगाते हैं। यह क्षुप-जाति की वनस्पति १ से २।। फीट तक ऊँची होती है और समस्त क्षुप से तीव्र गन्ध आती है। शाखायें सीधी और फैली हुई रहती हैं। पत्ते-१ से २ इञ्च तक लम्बे और अंडाकार तथा सुगंधित होते हैं। शाखाओं के अन्त में मञ्जरी लगती है। जिसके पत्ते हरे सफेदी लिये होते हैं उसको सफेद तुलसी और जिसके पत्ते और डंडियाँ कालापन युक्त हरे होते हैं उसको काली तुलसी कहते हैं। तुलसी की अन्य भी कई जातियाँ (Species) पाई जाती हैं जिनमें से ऑ० ग्रेटिस्सिमम् (O. gratissimum Linn.) को रामतुलसी कहते हैं। कृष्णतुलसी अधिक गुणकारी समझी जाती है। इसके पत्ते एवं बीजादि का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में ०.७% उड़नशील तैल पाया जाता है जो कफनिःसारक, प्रतिदूषक तथा कीड़ों को भगाता है। गुण और प्रयोग-तुलसी के पत्र या उसका स्वरस उष्ण, रूक्ष, कफनिःसारक, शीतहर, वातहर, स्वेद जनन, दीपन, कृमिघ्न, दुर्गन्धनाशक एवं प्रतिदूषक हैं। इसका उपयोग कास, श्वास, पार्श्वशूल, विषमज्वर, बाल्यकृत् वृद्धि, विषविकार एवं पाचन के विकारों में करते हैं। इसका विशेष प्रयोग इन व्याधियों में अन्य औषधि के अनुपान के रूप में किया जाता है।