भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 720, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 720

इसके बीज मधुर, स्निग्ध, शीत एवं मूत्र जनन होते हैं जिनका उपयोग मूत्रकृच्छ्रादि विकारों में किया जाता है। पत्तों के स्वरस का बाह्य उपयोग कर्णशूल, व्रण, प्रक्षालन, कृमि-कीट-दंश एवं चर्मरोगों में किया जाता है। मात्रा-स्वरस १ से २ तोला; बीज १ से २ माशा। अथ मरुबकः (मरूआ)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह मारुतोऽसौ मरुबको मरुन्मरुरपि स्मृतः। फणी फणिज्जकश्चापि प्रस्थपुष्पः समीरणः।।६४।। मरुदग्निप्रदो हृद्यस्तीक्ष्णोष्णः पित्तलो लघुः।।६५।। वृश्चिकादिविषश्लेष्मवातकुष्ठक्रिमिप्रणुत्। कटुपाकरसो रुच्यपाकरसो रूक्षः सुगन्धिकः।।६६।। मरूआ के संस्कृत नाम-मारुत, मरुबक, मरुत्, मरु, फणी, फणिज्जक, प्रस्थपुष्प, समीरण ये सब हैं। मरूआ-पाक तथा रस में कटु, रुचिकारक, तिक्त रसयुक्त, रूक्ष, सुगन्धयुक्त, अग्निवर्धक, हृदय को हितकर, तीक्ष्ण, उष्ण, पित्तजनक, लघु एवम् बिच्छु आदि के विष, कफ, वात, कुष्ठ और क्रिमी का नाशक है।[६४-६६] ३५. मरूआ हिं०-मरूआ, मरुवा। बं०-मुर्रु। म०-मरवा। गु०-मरवो। ते०-मरवमु। फा०-मरजन, जोस। अं०- (स्वीट मारजोरम्)। ले०-Origanum majorana Linn. (ऑरीगेनम मँजोराना)। Fam. Labiatae (लेबिएटी)। मरूआ प्रायः सब प्रान्तों की वाटिकाओं में रोपण किया जाता है। यह क्षुपजाति की वनस्पति १-२ फीट ऊंची होती है और इससे सुगन्धि आती है। पत्ते-लम्बे अंडाकार किञ्चित् लालिमायुक्त सफेदी मायल एवं सुगन्धित होते हैं। उस पर तुलसी के समान मञ्जरी लगती है। सफेद और काले रंगों के भेद से यह दो प्रकार का होता है। इनमें सफेद, औषधि और काला शिव-पूजन के काम में आता है।।३९।। इसके पंचांग एवं उसकी राख का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें सुगन्धित्तैल तथा कुछ तिक्त पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसमें सुगन्धि, वातानुलोमक, स्वेदजनन, आर्तवजनन, कफनिःसारक, यकृतबल्य एवं कुष्ठघ्न है। इसका उपयोग आधमान, शूलादि पाचन विकार, प्रतिश्याय, अनार्तव एवं व्रण के लिये करते हैं। (१) उदरशूल में पत्तों को सफेद हरहुर के पत्तों के साथ देते हैं। अतिसार में फांट देते हैं। (२) इसका स्वरस या पंचांग की राख व्रण रोपण एवं वेदनास्थापन होने से पुराने व्रण में लाभ करती है। मात्रा- स्वरस ५-१० बूँद; तैल २-६ बूँद; पंचांग ५-३० रत्ती। अथ दमनकः (दवना)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह उक्तो दमनको दान्तो मुनिपुत्रस्तपोधनः। गन्धोत्कटो ब्रह्मजटो विनीतः कलपत्रकः।।६७।। दमनस्तुवरस्तिक्तो हृद्यो वृष्यः सुगन्धिकः। ग्रहणाद् विषकुष्ठास्रक्लेदकण्डूत्रिदोषजित्।।६८।। दवना के संस्कृत नाम-दमनक, दान्त, मुनिपुत्र, तपोधन, गन्धोत्कट, ब्रह्मजट, विनीत, कलपत्रक और दमन ये सब हैं। दवना-कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, हृदय को हितकर, वृष्य (वीर्य वर्धक), सुगन्धित एवम् विष, कुष्ठ, रक्तविकार, क्लेद, खुजली तथा त्रिदोष का नाशक है।[६७-६८] नोट-अनेक विद्वानों ने दमनक का ले. ना. आ. सिवरसियाना (A. siversiana) दिया है।

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा) · पृष्ठ 720, कुल 1167 में से · BharatKosha