भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ वटादिवर्गः तत्रादौ वटः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह वटो रक्तफलः शृङ्गी न्यग्रोधः स्कन्धजो ध्रुवः । क्षीरी वैश्रवणो वासो बहुपादो वनस्पतिः ॥१॥ वटः शीतो गुरुर्ग्राही कफपित्तव्रणापहः । वर्ण्यो विसर्पदाहघ्नः कषायो योनिदोषहृत् ॥२॥ बरगद के संस्कृत नाम-वट, रक्तफल, शृङ्गी, न्यग्रोध, स्कन्धज, ध्रुव, क्षीरी, वैश्रवण, वास, बहुपाद, वनस्पति ये सब हैं। बरगद-कषाय रसयुक्त, शीतल, गुरु, ग्राही, शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला एवम् कफ, पित्त, व्रण, विसर्प, दाह और योनिसंबन्धी दोषों को दूर करता है। [१-२] १. बड़ हिं०-बड़, बरगद। बं०-वट, बड़गाछ। म०-वड। क०-आल, आलदमारा। ते०-मारि। गु०-बड़। फा०-दरख्तेरीश। अ०-कविरूल अश्जार। अं०-Banyan Tree (बनियन ट्री)। ले०-Ficus bengalensis Linn. (फाइकस् बेंगालेन्सिस्)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। यह सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। ग्राम के पास लोग इसको पवित्र जान कर लगाते हैं। हिमालय के जङ्गल और दक्खन के पहाड़ियों पर यह जंगली उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष-बहुत विशाल और शाखायें फैली हुई प्रायः भूमि की ओर नत हो जाती हैं। पत्ते-लम्बे-चौड़े और मोटे होते हैं। फल-छोटे-छोटे झरबेर के समान, कच्ची अवस्था में हरे रंग के और पकने पर लाल हो जाते हैं। शाखाओं से लाल तथा पीले रंग के अङ्कुर निकल कर भूमि की ओर बढ़ते हैं। इसको वटजटा, बरोह या बड़ की दाढ़ी कहते हैं। यह जटा बढ़ते-बढ़ते पृथ्वी में घुस जाती हैं और खम्मे के समान दिखाई देती है। इसके पंचांग का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-छाल में ११% टैनिन होता है। गुण और प्रयोग-बड़ शीत, ग्राही, स्तम्भन, मूत्रसंग्रहणीय एवं व्रणरोपण है। (१) इसका क्षीर वेदनास्थापन एवं व्रणरोपण है तथा इसको कटिपीडा, सन्धिपीडा एवं बरसात में होने वाले हाथ- पैर की अंगुलियों के व्रणों पर लगाते हैं। सड़े हुये दाँत में लगाने से पीड़ा दूर होती है। (२) इसकी छाल का क्वाथ बहुमूत्र में एवं मधुमेह में देते हैं। छाल को अतिसार तथा प्रवाहिका में भी देते हैं। (३) वटजटा सोजाक में, वमन रोकने के लिये तथा बाह्य लेप के रूप में चर्मरोग में प्रयोग की जाती है। मात्रा-चूर्ण ३ से ६ माशा; क्वाथ ५ से १० तोला। अथ पिप्पलः (पीपल)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह बोधिद्रुः पिप्पलोऽश्वत्थश्चलपत्रो गजाशनः । पिप्पलो दुर्जरः शीतः पित्तश्लेष्मव्रणास्रजित् । गुरुस्तुवरको रूक्षो वर्ण्यो योनिविशोधनः ॥३॥ पीपल के संस्कृत नाम-बोधिद्रु, पिप्पल, अश्वत्थ, चलपत्र और गजाशन ये सब हैं। पीपल-कषाय रसयुक्त, CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA