भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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पुष्पवर्गः ६७१ ३७. बर्बरी (सबजा) हिं०- बर्बरी, बर्बरी, वन तुलसी, बर्बर, सबजा। बं. - बाबुई तुलसी। म०-सबजा। गु० - डमरो, रान तुलसी। ते० - भू तुलसी। ता०-तिरतुत्पतची। प० - बबरि। अं० - Common-Sweet-Basil (कामन स्वीट् बेसिल्)। ले०-Ocimum basili-cum Linn. (ऑसीमम् बेसिलीकम्)। Fam. Labiatae (लेबिएटी)। यह भारत के गरम तथा साधारण प्रान्तों में विशेष कर पंजाब में अधिक पाई जाती है। सभी प्रान्तों में बागों में लगाई हुई भी पाई जाती है। इसका क्षुप-सीधा, १-२ फीट तक ऊँचा होता है। शाखायें-हरे रंग की अथवा फीकी पीलापन युक्त हरे रंग की होती हैं। पत्ते - १-२ इञ्च लम्बे, अंडाकार और नोकीले होते हैं। शाखाओं के अन्त में फूलों की मञ्जरी लगती है। उसी में बीजकोष लगते हैं। बीज - नन्हें-नन्हें काले रंग के किंचित् लम्बे, एक ओर महराब का चिह्न और दूसरी ओर चिपटे तथा मोटी नोकवाले होते हैं। वे गन्धहीन होते हैं परन्तु उनका स्वाद तेलिया और कुछ चरपरा होता है। इनको पानी में भिगोने से लुबाबदार से दीख पड़ते हैं। इन्हें तुख्म शर्बती कहते हैं। किसी ने इसे तुख्म रेंहाँ भी लिखा है। इसके पंचांग तथा बीज का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक सुगंधित तैल पाया जाता है। यह पीताभ हरा एवं जल से हलका होता है। रखने से यह जमकर इसके रवे बनते हैं जिन्हें बेसिल केंफर (Basil camphor) कहते हैं। गुण और प्रयोग-इसका स्वरस तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष, वात प्रशमन, वातनाड़ी संस्थान उत्तेजक, स्वेदजनन एवं कृमिघ्न हैं। इसके बीज मधुर, स्निग्ध, शीतल, मूत्रजनन एवं स्तंभन हैं। इसका प्रयोग उन्माद, संन्यास, जीर्णवातिक ज्वर, कास, अजीर्ण, अतिसार, सर्प एवं वृश्चिक विष, दद्रु एवं व्रण में किया जाता है। (१) कास में इसका स्वरस मधु के साथ पिलाते हैं। इसमें बीज का फांट भी लाभदायक है। (२) बीज का फांट ग्राही होने के कारण आमातिसार में देते हैं। (३) सर्पविष में इसका स्वरस ४-५ तोला, चार-चार घंटे पर पिलाते हैं। बिच्छू काटने पर पत्तों को पीसकर लेप करते हैं। (४) कर्णपीड़ा, दंतशूल आदि में स्वरस का बाह्य प्रयोग किया जाता है। सर की रूसी, दाद आदि में स्वरस लगाने से लाभ होता है। बीजों को धोकर व्रण पर बाँधते हैं। (५) सोजाक में बीजों का फांट दिया जाता है। (६) वाजीकरण के लिये बीज १ से २ ड्राम की मात्रा में देते हैं। मात्रा-स्वरस १/२-१ चाय का चम्मच; बीज १/४ से १/२ तोला, दुग्ध एवं शर्करा के साथ फांट बनाकर। इति श्रीमिश्रलट्‍कनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे पुष्पवर्गः समाप्तः। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA