भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 724, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 724

वटादिवर्गः ६७३ कठिनता से पचने वाला, गुरु, रूक्ष, वर्ण को उत्तम बनाने वाला, योनिका शोधन करने वाला एवम् पित्त, कफ, व्रण तथा रक्तविकार को दूर करने वाला है। [३] २. पीपल हिं०-पीपल वृक्ष। बं०-अश्वत्थ। म०-पिपल। क०-अरली। गु०-पीपली। ते०-राविचेट्टु। ता०- अरशमरम्। फा०-दरख्ते लरज़ाँ। अ०-शज्रतुल मुर्त अश। ले०-Ficus religiosa Linn. (फाइकस् रिलिजिओसा)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। पीपल के वृक्ष इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में लगाये हुये पाये जाते हैं और हिमालय पहाड़ के जङ्गलों, बंगाल तथा मध्य भारत में भी पाये जाते हैं। इसका वृक्ष-बहुत ऊँचा होता है और खूब फैलता है। पत्ते-गोलाकार और नोकीले होते हैं। पत्रदण्ड-लम्बा होता है। इसमें भी बड़ के समान छोटे-छोटे गोल फल लगते हैं। इसकी छाया सघन और प्रिय होती है। पीपल वृक्ष पवित्र माना जाता है। इसकी छाल, छाल की राख, पत्र एवं फल उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-छाल में ४% टैनिन होता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, मूत्रसंग्रहणीय, रक्तसंग्राहक, पौष्टिक, स्तम्भन एवं व्रणनाशक है। इसके पत्ते एवं फल आनुलोमिक हैं। छाल का जलीय सत्व स्टेफिलोकोकस ऑरियस ] एवं एस्चेरिचिया कोलाई जीवाणु रोधी हैं। (१) वाजीकरण के लिये इसके फल, मूल, छाल एवं कोपल को दूध में पका, मधु एवं शर्करा मिलाकर पिलाते हैं। (सु० चि० अ० २६) (२) इसकी छाल की राख पानी में डालकर ऊपर का जल पिलाने से हिक्का एवं वमन में लाभ होता है। (३) सोजाक में कोपल दूध में पकाकर पिलाते हैं। छाल का भी प्रयोग सोजाक में किया जाता है। (४) व्रणप्रक्षालन, उत्तरबस्ति, डूश, गण्डूष आदि के लिये इसकी छाल का क्वाथ या पञ्चवल्कल क्वाथ का प्रयोग किया जाता है जो बहुत उपयोगी है। मात्रा-चूर्ण १ से ३ माशा; क्वाथ ५ से १० तो०। अथ पिप्पलभेदः (गजदण्डसहोरा)। इति लोके। तस्य नामानि गुणांश्चाह पारीषोऽन्यः पलाशश्च कपिचूतः कमण्डलुः। गर्दभाण्डः कन्दरालः कपीतनसुपार्श्वकौ ।।४।। पारीषो दुर्जरः स्निग्धः कृमिशुक्रकफप्रदः। फलेऽम्लो मधुरो मूले कषायस्वादुमज्जकः ।।५।। पारीष पीपल (यह पीपल का भेद है, लोक में इसी नाम से प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-पारीष, पलाश, कपिचूत, कमण्डलु, गर्दभाण्ड, कन्दराल, कपीतन और सुपार्श्वक ये सब हैं। पारीष पीपल-दुर्भर (कठिनता से पचने वाला), स्निग्ध (चिकना), कृमि, शुक्र तथा कफ को उत्पन्न करने वाला, फल में अम्ल जड़ में मधुर, मज्जा (मींगी) में कषाय रसयुक्त एवम् स्वादिष्ट होता है। [४-५] ३. पारीष पीपल हिं०-पारिसपीपल, पारस पीपर, गजदन्डसिहारे (सहोरा)। बं०-गज शुण्डी, पराश पिपुल। म०-भेंडी। गु०-पारस पीपलो। क०-हबिरसी। ते०-गङ्गारहवि। ता०-पूवरसु। ले०-Thespesia populnea Soland ex Correa (थेस्पेसिया पोपुलनिया)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। ४६ भाव. I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA