भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५९७ रासायनिक संगठन—इसमें ८ १/२% बर्बेरीन (Berberine) एवं थॉलिक्ट्राइन् (Thalictrine) नामक तत्त्व होते हैं। मूल में का यह भाग जल में आसानी से घुल जाता है किन्तु मद्यसार में कम घुलता है। गुण और प्रयोग—यह तिक्त-पौष्टिक, विषमज्वरनाशक, सारक एवं मूत्रल है। इसका प्रयोग विषमज्वर, अग्निमांद्य, कुपचन एवं रोगनिवृत्ति के पश्चात् की दुर्बलता में करते हैं। नेत्ररोग में इसको घिसकर पलकों पर लेप करते हैं। मात्रा—२-५ रत्ती। १२९. त्रायमाण (३) ले०—Ficus heterophylla Linn. f. (फिकस् हेटेरोफाइला लिन.); Fam. Moraceae (मोरेंसी)। बं०—भुइझमूर, बालाडुमूर। इसे वंगीय वैद्य त्रायमाण नाम से प्रयोग में लाते हैं। यह भारत के सभी उष्ण स्थानों में होता है। इसका गुल्म— झाड़दार या कभी-कभी जमीन या चट्टानों पर फैला हुआ होता है। शाखाएँ—मृदुरोमश होती हैं। पत्ते—सनाल, आकार में छोटे-बड़े, अंडाकार या कुछ मालाकार खुरदरे एवं कटे किनारेवाले होते हैं। फल—का अग्र भाग मोटा तथा गोलाकार होता है। बीज—गोलाकार होते हैं। गुण और प्रयोग—इसके मूल का रस शूल में देते हैं। इसके पत्तों का रस दूध के साथ अतिसार में दिया जाता है। कास, श्वास में इसके मूल की छाल धनिया के साथ चूर्ण रूप में दी जाती है। अथ मूर्वा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह मूर्वा मधुरसा देवी मोरटा तेजनी स्रुवा। मधुलिका मधुश्रेणी गोकर्णी पीलुपर्ण्यपि ।। २४४ ।। मूर्वा सरा गुरुः स्वादुस्तिक्ता पित्तास्रमेहनुत्। त्रिदोषतृष्णाहृद्रोगकण्डुकुष्ठज्वरापहा ।। २४५ ।। मूर्वा के नाम तथा गुण—मूर्वा, मधुरसा, देवी, मोरटा, तेजनी, स्रुवा, मधुलिका, मधुश्रेणी, गोकर्णी और पीलुपर्णी ये सब नाम मूर्वा के हैं। मूर्वा स्वादिष्ट, तिक्त रसयुक्त, सारक, गुरु एवं तित्तरक्त, प्रमेह, त्रिदोष, तृषा, हृद्रोग, कण्डू (खुजली), कुष्ठ तथा ज्वर को दूर करने वाली होती है। [२४४-२४५] मूर्वा एक संदिग्ध द्रव्य है। अनेक स्थानों पर विभिन्न प्रयोगों में मूर्वा का उल्लेख मिलता है। सुश्रुत के टीकाकार डल्हण के समय ही यह द्रव्य संदिग्ध रहा है ऐसा उनकी टीका से मालूम होता है। क्योंकि उन्होंने उसके परिचय में निम्नलिखित तीन प्रकार के मतों का विभिन्न स्थानों पर वर्णन किया है। (१) मूर्वा चोरस्नायुः, यया पूर्वदेशे गुणान् कुर्वन्ति धनुषाम् (सु० सू० अ० २२); मूर्वा कन्दलीसद्दशः स्वल्पविटपः 'हगौड़' इति लोके। (सु० सू० अ० २९)। (२) मूर्वा धनुर्गुणोपयोग्या 'दुधऊ' इति लोके। (३) अन्ये कोविदारयुग्मपत्रां लताविशेषां मूर्वामाचक्षते। इन वचनों से ऐसा मालूम पड़ता है कि प्रथम एवं द्वितीय मत उन्हें कुछ मान्य थे और तृतीय मत स्वीकार्य नहीं था। इसी प्रकार श्रीकण्ठ (सन् १२००-१२५०) ने 'मूर्वा स्वनामख्याता तदभावे जिललमूलम्' लिखा है जिससे यह अनुभव होता है कि उनके समय में भी यह द्रव्य सन्दिग्ध रहा है। विभिन्न निघण्टुओं के अनुसार मूर्वा मधुर, तिक्त, सर, गुरु, त्रिदोषशामक एवं ज्वर, प्रमेह, हृद्रोग, कुष्ठ, वमन एवं पाण्डु रोग में लाभदायक है। सुश्रुत में आरग्वधादिगण, पटोलादिगण। पित्तसंशमन वर्ग एवं विरेचन विकल्प अध्याय