भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९६ भावप्रकाशनिघण्टुः पहले कुटकी के साथ जेन्शियाना कुर्रों का वर्णन (पृष्ठ-७१) किया जा चुका है। यहाँ अन्य द्रव्यों का वर्णन किया जा रहा है। १२७. त्रायमाण (१) ले०-Delphinium Zalil Aitch. & Hemsl (डेल्फिनिअम् जलील ऐ., हे.) । Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्युलेसी) । हिं०-असव्र् । बं०-गुड़जलील । पं०-असवर्ग, गाफिस् । इरा०-झलिल् असफ्रक् । अ०- झरिर । अफगानिस्तान, फारस आदि देशों में यह होता है। इसका क्षुप-बहुवर्षायु होता है। पत्र-छोटे तथा पीताभ होते हैं। पुष्प-चमकीले, पीले रंग के मृदुरोमश तथा उनके नीचे कोमल काँटे रहते हैं। फल-छोटे, शिराओं से युक्त, नोकदार, डंठलदार एवं तीन कोष्ठयुक्त होता है। बीज-कोणयुक्त, हल्के भूरे या कपिल रंग के होते हैं। जड़-लम्बी होती है। इसके पुष्पयुक्त पंचांग का आयात होता है जो वस्त्र रँगने के काम आता है। यह हल्के हरिताभ पीले रंग का एवं ताजी अवस्था में मधु जैसा सुगंधित रहता है। रासायनिक संगठन-इसमें आइसोहॅम्नेटिन् (Isorhamnetin, C₁₆ H₁₂ O₇), क्वेर्सेंटिन् (Quercetin) तथा संभवतः केम्फेरोल (Kaempferol) नामक तत्त्व पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह तिक्त, पौष्टिक, मूत्रजनन, कोष्ठवातप्रशमन, आनुलोमिक, दीपन, वेदनाहर एवं अपक्षालक (Detergent) है। इससे पित्तस्राव होता है, जिससे पाचन उत्तेजित होता है। भूख लगती है तथा शौच साफ होता है। इसका क्वाथ बनाकर दिया जाता है। अधिक मात्रा से हानि होती है। इसका प्रयोग कुपचन, आध्मान, अग्निमांद्य, उदरशूल, अर्श, कामला, प्लीहावृद्धि, शोथ, सभी प्रकार के उदर, जीर्णज्वर एवं पित्तज्वर में किया जाता है। पित्तज्वर में इसका अधिक उपयोग करते हैं। इसकी राख नींबू के रस के साथ मिलाकर या घृत के साथ खुजली आदि त्वचा के रोगों में लगाई जाती है। जव के आटे के साथ इसके पञ्चांग का चूर्ण पकाकर उसकी लुगदी सूजन या फोड़े पर बाँधते हैं। मात्रा-१/८-१/४ तो० क्वाथ बनाकर। १२८. त्रायमाण (२) ले०-Thalictrum foliolosum DC. (थॅलिक्ट्रम् फोलिओलोसम् डीसी.) । Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्युलेसी) । हिं०-ममीरा, पीली जड़ी, शुद्रक, चवन्नीगाछ । बं०-गुरवियानि । वंब०-ममीरी, पीआरंग । अ०- ममीरा चीनी । त्रायमाण सदृश कुछ गुण इसमें मिलने के कारण इसको कुछ लोग त्रायमाण मानते हैं। यह नेत्र्य होने के कारण वास्तविक ममीरी Coptis teeta Wall (कॉप्टिस् टीटा वाल) का प्रतिनिधि भी इसे मानते हैं। पिआरंग नाम से बजार में बिकनेवाला द्रव्य इसी की जड़ है, ऐसा मानते हैं, किन्तु इसमें सन्देह है। यह हिमालय में सर्वत्र ५००० से ८००० फीट तक एवं खासिआ पहाड़ों पर ४००० से ६००० फीट की ऊँचाई तक होता है। इसका क्षुप-३-४ फीट ऊँचा, बहुवर्षायु तथा दृढ़ होता है। पत्ते-पक्षाकार संयुक्त एवं पत्राधार कोषमय होता है। पत्रक-४-६ मि० मि०, बड़ी चवन्नी की तरह गोलाई लिये हुए तथा धार पर प्रायः गोल दन्तुर होते हैं। पुष्प- श्वेत या हलके हरे रंग के गुच्छे में आते हैं। फल-छोटे, आयताकार, दोनों तरफ नोकीले तथा धारीदार होते हैं। मूलस्तम्भ-गाँठदार, पतले उपमूलों से युक्त एवं तोड़ने पर पीला होता है। इसका स्वाद कडुवा होता है। इसके मूल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA