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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

५९६ भावप्रकाशनिघण्टुः पहले कुटकी के साथ जेन्शियाना कुर्रों का वर्णन (पृष्ठ-७१) किया जा चुका है। यहाँ अन्य द्रव्यों का वर्णन किया जा रहा है। १२७. त्रायमाण (१) ले०-Delphinium Zalil Aitch. & Hemsl (डेल्फिनिअम् जलील ऐ., हे.) । Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्युलेसी) । हिं०-असव्र् । बं०-गुड़जलील । पं०-असवर्ग, गाफिस् । इरा०-झलिल् असफ्रक् । अ०- झरिर । अफगानिस्तान, फारस आदि देशों में यह होता है। इसका क्षुप-बहुवर्षायु होता है। पत्र-छोटे तथा पीताभ होते हैं। पुष्प-चमकीले, पीले रंग के मृदुरोमश तथा उनके नीचे कोमल काँटे रहते हैं। फल-छोटे, शिराओं से युक्त, नोकदार, डंठलदार एवं तीन कोष्ठयुक्त होता है। बीज-कोणयुक्त, हल्के भूरे या कपिल रंग के होते हैं। जड़-लम्बी होती है। इसके पुष्पयुक्त पंचांग का आयात होता है जो वस्त्र रँगने के काम आता है। यह हल्के हरिताभ पीले रंग का एवं ताजी अवस्था में मधु जैसा सुगंधित रहता है। रासायनिक संगठन-इसमें आइसोहॅम्नेटिन् (Isorhamnetin, C₁₆ H₁₂ O₇), क्वेर्सेंटिन् (Quercetin) तथा संभवतः केम्फेरोल (Kaempferol) नामक तत्त्व पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह तिक्त, पौष्टिक, मूत्रजनन, कोष्ठवातप्रशमन, आनुलोमिक, दीपन, वेदनाहर एवं अपक्षालक (Detergent) है। इससे पित्तस्राव होता है, जिससे पाचन उत्तेजित होता है। भूख लगती है तथा शौच साफ होता है। इसका क्वाथ बनाकर दिया जाता है। अधिक मात्रा से हानि होती है। इसका प्रयोग कुपचन, आध्मान, अग्निमांद्य, उदरशूल, अर्श, कामला, प्लीहावृद्धि, शोथ, सभी प्रकार के उदर, जीर्णज्वर एवं पित्तज्वर में किया जाता है। पित्तज्वर में इसका अधिक उपयोग करते हैं। इसकी राख नींबू के रस के साथ मिलाकर या घृत के साथ खुजली आदि त्वचा के रोगों में लगाई जाती है। जव के आटे के साथ इसके पञ्चांग का चूर्ण पकाकर उसकी लुगदी सूजन या फोड़े पर बाँधते हैं। मात्रा-१/८-१/४ तो० क्वाथ बनाकर। १२८. त्रायमाण (२) ले०-Thalictrum foliolosum DC. (थॅलिक्ट्रम् फोलिओलोसम् डीसी.) । Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्युलेसी) । हिं०-ममीरा, पीली जड़ी, शुद्रक, चवन्नीगाछ । बं०-गुरवियानि । वंब०-ममीरी, पीआरंग । अ०- ममीरा चीनी । त्रायमाण सदृश कुछ गुण इसमें मिलने के कारण इसको कुछ लोग त्रायमाण मानते हैं। यह नेत्र्य होने के कारण वास्तविक ममीरी Coptis teeta Wall (कॉप्टिस् टीटा वाल) का प्रतिनिधि भी इसे मानते हैं। पिआरंग नाम से बजार में बिकनेवाला द्रव्य इसी की जड़ है, ऐसा मानते हैं, किन्तु इसमें सन्देह है। यह हिमालय में सर्वत्र ५००० से ८००० फीट तक एवं खासिआ पहाड़ों पर ४००० से ६००० फीट की ऊँचाई तक होता है। इसका क्षुप-३-४ फीट ऊँचा, बहुवर्षायु तथा दृढ़ होता है। पत्ते-पक्षाकार संयुक्त एवं पत्राधार कोषमय होता है। पत्रक-४-६ मि० मि०, बड़ी चवन्नी की तरह गोलाई लिये हुए तथा धार पर प्रायः गोल दन्तुर होते हैं। पुष्प- श्वेत या हलके हरे रंग के गुच्छे में आते हैं। फल-छोटे, आयताकार, दोनों तरफ नोकीले तथा धारीदार होते हैं। मूलस्तम्भ-गाँठदार, पतले उपमूलों से युक्त एवं तोड़ने पर पीला होता है। इसका स्वाद कडुवा होता है। इसके मूल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ५९७ रासायनिक संगठन—इसमें ८ १/२% बर्बेरीन (Berberine) एवं थॉलिक्ट्राइन् (Thalictrine) नामक तत्त्व होते हैं। मूल में का यह भाग जल में आसानी से घुल जाता है किन्तु मद्यसार में कम घुलता है। गुण और प्रयोग—यह तिक्त-पौष्टिक, विषमज्वरनाशक, सारक एवं मूत्रल है। इसका प्रयोग विषमज्वर, अग्निमांद्य, कुपचन एवं रोगनिवृत्ति के पश्चात् की दुर्बलता में करते हैं। नेत्ररोग में इसको घिसकर पलकों पर लेप करते हैं। मात्रा—२-५ रत्ती। १२९. त्रायमाण (३) ले०—Ficus heterophylla Linn. f. (फिकस् हेटेरोफाइला लिन.); Fam. Moraceae (मोरेंसी)। बं०—भुइझमूर, बालाडुमूर। इसे वंगीय वैद्य त्रायमाण नाम से प्रयोग में लाते हैं। यह भारत के सभी उष्ण स्थानों में होता है। इसका गुल्म— झाड़दार या कभी-कभी जमीन या चट्टानों पर फैला हुआ होता है। शाखाएँ—मृदुरोमश होती हैं। पत्ते—सनाल, आकार में छोटे-बड़े, अंडाकार या कुछ मालाकार खुरदरे एवं कटे किनारेवाले होते हैं। फल—का अग्र भाग मोटा तथा गोलाकार होता है। बीज—गोलाकार होते हैं। गुण और प्रयोग—इसके मूल का रस शूल में देते हैं। इसके पत्तों का रस दूध के साथ अतिसार में दिया जाता है। कास, श्वास में इसके मूल की छाल धनिया के साथ चूर्ण रूप में दी जाती है। अथ मूर्वा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह मूर्वा मधुरसा देवी मोरटा तेजनी स्रुवा। मधुलिका मधुश्रेणी गोकर्णी पीलुपर्ण्यपि ।। २४४ ।। मूर्वा सरा गुरुः स्वादुस्तिक्ता पित्तास्रमेहनुत्। त्रिदोषतृष्णाहृद्रोगकण्डुकुष्ठज्वरापहा ।। २४५ ।। मूर्वा के नाम तथा गुण—मूर्वा, मधुरसा, देवी, मोरटा, तेजनी, स्रुवा, मधुलिका, मधुश्रेणी, गोकर्णी और पीलुपर्णी ये सब नाम मूर्वा के हैं। मूर्वा स्वादिष्ट, तिक्त रसयुक्त, सारक, गुरु एवं तित्तरक्त, प्रमेह, त्रिदोष, तृषा, हृद्रोग, कण्डू (खुजली), कुष्ठ तथा ज्वर को दूर करने वाली होती है। [२४४-२४५] मूर्वा एक संदिग्ध द्रव्य है। अनेक स्थानों पर विभिन्न प्रयोगों में मूर्वा का उल्लेख मिलता है। सुश्रुत के टीकाकार डल्हण के समय ही यह द्रव्य संदिग्ध रहा है ऐसा उनकी टीका से मालूम होता है। क्योंकि उन्होंने उसके परिचय में निम्नलिखित तीन प्रकार के मतों का विभिन्न स्थानों पर वर्णन किया है। (१) मूर्वा चोरस्नायुः, यया पूर्वदेशे गुणान् कुर्वन्ति धनुषाम् (सु० सू० अ० २२); मूर्वा कन्दलीसद्दशः स्वल्पविटपः 'हगौड़' इति लोके। (सु० सू० अ० २९)। (२) मूर्वा धनुर्गुणोपयोग्या 'दुधऊ' इति लोके। (३) अन्ये कोविदारयुग्मपत्रां लताविशेषां मूर्वामाचक्षते। इन वचनों से ऐसा मालूम पड़ता है कि प्रथम एवं द्वितीय मत उन्हें कुछ मान्य थे और तृतीय मत स्वीकार्य नहीं था। इसी प्रकार श्रीकण्ठ (सन् १२००-१२५०) ने 'मूर्वा स्वनामख्याता तदभावे जिललमूलम्' लिखा है जिससे यह अनुभव होता है कि उनके समय में भी यह द्रव्य सन्दिग्ध रहा है। विभिन्न निघण्टुओं के अनुसार मूर्वा मधुर, तिक्त, सर, गुरु, त्रिदोषशामक एवं ज्वर, प्रमेह, हृद्रोग, कुष्ठ, वमन एवं पाण्डु रोग में लाभदायक है। सुश्रुत में आरग्वधादिगण, पटोलादिगण। पित्तसंशमन वर्ग एवं विरेचन विकल्प अध्याय

५९८ भावप्रकाशनिघण्टुः में इसका उल्लेख है। चरक में तृप्तिघ्न, स्तन्यशोधन, दशोमानि में एवं तिक्तस्कन्ध में इसका पाठ है। क्षीरशोधन एवं वमनोपग द्रव्य के रूप में भी इसका उल्लेख है। इसके स्वरूप-वर्णन से ऐसा मालूम होता है कि यह कोई मजबूत रेशेवाली लता विशेष होगी जिसका मौर्वी आदि बनाने में उपयोग किया जाता रहा है। विभिन्न निघण्टुओं ने इसके रूपपरिचयात्मक जो नाम दिये हैं वे सम्भवतः एक ही वनस्पति के लिये नहीं हैं। आज मूर्वा नाम से ली जानेवाली वनस्पतियों में से किसी में एक तो दूसरी में दूसरा नाम सार्थक मालूम पड़ता है। सम्भव है कि प्रत्यक्षतः न देखने के कारण विभिन्न आचार्यों द्वारा प्रयुक्त सभी नामों को एक साथ पर्याय में लिख दिया गया है। इसी प्रकार मोरटा को कुछ निघण्टुकारों ने इसके पर्याय में लिखा है और कुछ ने मूर्वा-विशेष कहकर दूसरे द्रव्य के रूप में भी उल्लेख किया है। निम्नलिखित द्रव्यों का मूर्वा नाम से प्रयोग हो रहा है- (१) मरुआबेल, चिन्हार-सम्भवतः डल्हण ने इसे ही-धनुर्गुणोपयोग्या 'दुधऊ' इति लोके कहा है। अतिरसा, गोकर्णी, स्रुवा आदि पर्याय इसके लिये उचित मालूम पड़ते हैं। यह क्षीर बहुल लता होती है। रॉक्सवर्ग के मतानुसार वनस्पति सृष्टि में अत्यन्त मजबूत रेशों में इसके काण्डत्वक् के निकाले हुये रेशों की गणना की जानी चाहिये। इसके स्थानिक थारू नाम मारवो या मरुआबेल मूर्वा से मिलते-जुलते मालूम पड़ते हैं। इसमें मूर्वा के गुण भी मिलते हैं। इन्हीं आधारों से श्री ठा० बलवन्तसिंहजी ने इसे मूर्वा माना है। (२) वंगीय मूर्वा-यह डल्हणोक्त प्रथम द्रव्य चोरस्नायु या हगौड़ मालूम पड़ता है। इसे बंगाल के वैद्य मूर्वा मानते हैं। (३) मालझन, मालुआ बेल-सम्भवतः यही डल्हणोक्त कोविदारयुग्मपत्रा वा अन्योक्त पृथक्पर्णी है जिसकी बड़ी विस्तृत लतायें होती हैं तथा पत्ते कचनार जैसे द्विविभक्त होते हैं। (४) मोरबेल, रानजाई-बम्बई के तरफ इसको मूर्वा मानते हैं। इसके लिये त्रिपर्णी नाम सार्थक मालूम पड़ता है। (५) मुरहरी, मोरहरी-चित्रकूट में यह मुरहरी नाम से प्रसिद्ध है। मधुरस', पीलुपर्णी, तेजनी आदि पर्याय इसके लिये उपयुक्त प्रतीत होते हैं। सम्भवतः डल्हण-निर्णीत मोरटा यह हो। (६) मरोडफली-इसके ऐंठे हुये फलों को उत्तर प्रदेश में मूर्वा नाम से लिया जाता है जो वास्तव में 'आवर्तनी' है न कि मूर्वा। संक्षेप में प्रत्येक का स्वतन्त्र वर्णन यहाँ किया जा रहा है। इनमें से चिन्हार की मूर्वा होने की अधिक सम्भावना है। १३०. मूर्वा (१) मिर्जापुर-जरतोर, चिन्हार। थारू-मारवी, मरुआवेल। खर-सिटी, चिटी। संथा-कोंगा, सिटकी। ले०- Marsdenia tenacissima. W. & A. (मार्सडेनिया टेनॅसिस्सिमा)। Fam. Asclepiadaceae (एस्कलेपिएडेसी)। यह दून के खैर के जंगल, हिमालय के नीचे का भाग तथा बिहार में प्रायः शुष्क पर्वतमालाओं एवं झाड़ीदार जंगलों में पाई जाती है। इसकी लता-मोटी, मजबूत काण्ड की, दुग्धयुक्त एवं चक्रारोही होती है। इसका नवीन भाग रोमश एवं काण्डत्वक् धूसर, कार्कयुक्त एवं नालीदार होता है। पत्ते-४-६ इञ्च लम्बे, ३-४ इञ्च चौड़े-स्पर्श में मखमली तलवाले, चौड़ाई लिये हुये लट्वाकार, लम्बाग्र एवं आधार की तरफ फलकमूल यकायक बहुत फटा हुआ हृद्‍वत् होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ५९९ पत्रनाल- २.५ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प-हरित-पीत प्रायः दुर्गन्धयुक्त एवं गुच्छों में आते हैं। फली-४.५-५ इञ्च लम्बी एवं व्यास में १.२-१.४ इञ्च, रोमश और आधार से एक तिहाई दूरी पर सबसे अधिक मोटी होती है। नवीन शाखाओं की त्वचा से सफेद रेशम जैसे रेशे निकलते हैं जिनसे मछली मारने की रस्सी एवं धनुष की डोरी (मौर्वी) बनाई जाती है। यह विषमज्वर में बहुत उपयोगी बतलायी जाती है। इसका मूल तथा काण्ड सफेद निसोध (श्वेत त्रिवृत) के नाम से बाजार में बिकता है। (ठा० बलवन्तसिंह) इसकी एक दूसरी उपजाति M. hamiltonii, Wight (मॉ० हमिल्टोनाई) भी मिलती है जिसे मोरन अडा भी कहीं-कहीं कहते हैं। इसमें पुष्प छोटे और आभ्यन्तर कोश बाहर से सफेद होते हैं। लाखन-नामक एक और इसी वर्ग की बड़ी लता होती है जिसे लकवा में बहुत लाभदायक समझा जाता है। इसका ले० नाम Dregia volubilis Benth. ex Hook. f. (ड्रेगिया हॉल्यूबिलिस्) है। १३१. मूर्वा (२) सं०-चोरस्नायु ? बं०, म०-घणरूप। बं०-गोराचक्र, मूर्वा। उ० प्र०-नागदमन। ले०-Sansevieria roxburghiana Schult. (सॅन्सेवेरिया रॉक्सबर्घियाना शु०); Fam. Haemodoraceae (हिमोडोरेॅसी)। यह कारोमंडल तट पर पाया जाता है। बगीचों में गमलों में यह लगाया हुआ मिलता है। इसमें जमीन के नीचे दिगन्तसम फैला हुआ अन्तर्भूमिशायी काण्ड होता है, जिससे जगह-जगह पत्रगुच्छ ऊपर निकले रहते हैं। पत्ते-खड़े, १२-१८" लम्बे, १-१.३" चौड़े, अधरतल पर उन्नतोदर, बीच में सबसे अधिक चौड़े, दोनों तटों पर श्वेताभ पट्टियों से युक्त होने के कारण चित्रित एवं इनका अग्र तीक्ष्ण, कठोर एवं १ इञ्च लम्बा होता है। पत्तों के बीच से पुष्पध्वज-निकलता है। व्यूह सवृन्त काण्डज, घना १२" × २" बड़ा एवं पुष्प २-३ एक साथ उन्नत स्थानों से निकलते हैं। इससे भी मजबूत रेशे निकलते हैं, जिनका मौर्वी बनाने में उपयोग होता है। पूर्वी भारत, बंगाल एवं उड़ीसा में इसका मूर्वा के नाम से प्रयोग कहीं-कहीं होता है। इसके पत्र एवं मूल का चिकित्सा में उपयोग होता है। गुण और प्रयोग-पुरानी खाँसी में इसकी जड़ का रस मधु के साथ देते हैं। इसके कोमल पत्तों का रस बच्चों को गले का कफ ढीला होकर निकालने के लिये देते हैं। १३२.-मूर्वा (३) सं०-कोविदार युग्मपत्रा, पृथक्पर्णी। हिं०-मालझनं, माहुल, मालो, महुलाइन। बं०-चेहुर। ते०-अड्डा। था०-महुलन। खर०-महुलान। संथा०-लमकलर, गोमलर। उ०-सियालपत्ता। ले०-Bauhinia vahlii W. & A. (बौहिनिया वाहली)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह हिमालय के निम्न भागों में ३००० फीट तक एवं आसाम, मध्य प्रदेश तथा बिहार में नम एवं छायादार स्थानों में वृक्षों पर फैली हुई पाई जाती है। इसकी लता-बहुत बड़ी तथा आरोहणशील होती है। शाखाओं के अग्र पर प्रायः दो-दो सूत्र रहते हैं। नवीन शाखाओं, पत्रनालों एवं पत्तों के अधः पृष्ठों पर रक्ताभ या मखमली रोमावरण होता है। पत्ते-१ से १ १/२ फीट तक चौड़े, चौड़ाई में कभी-कभी अधिक नहीं तो लम्बाई-चौड़ाई में बराबर, द्विखण्डित, खण्ड गहराई तक कटे हुये एवं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

६०० भावप्रकाशनिघण्टुः

फलकमूल गहरा, हृद्वत् होता है। पुष्प—श्वेत तथा मलाई के रंग के, समस्थ काण्डज व्यूह में आते हैं। फली—कठोर, ६-१२ इञ्च लम्बी, १ १/२-२ इञ्च चौड़ी एवं रोमश होती है। इसके पत्तों के पत्तल आदि बनाये जाते हैं। छाल के रेशों से रस्सियाँ बनाई जाती हैं। इसकी फलियों को आग में चिटका कर बीज निकाले जाते हैं, जिन्हें खाते हैं। देहरादून के व्यापारियों द्वारा इसके मूल मूर्वा—नाम से बेचे जाते हैं। डल्हण ने इसका माल नाम से उल्लेख किया है एवं इसे कोविदार सदृश पर्ण वाला कहा है। डल्हण के समय से ही कुछ लोग इसे मूर्वा नाम से प्रयोग करते रहे हैं। किन्तु वह मत डल्हण को मान्य नहीं था क्योंकि अश्मंतक के परिचय में उसके लिये 'मालुया-सदृशपत्रः' लिखा है न कि 'मूर्वासदृशपत्रः'। इसमें एक गोंद होता है। बाह्यत्वक् में टैनिन की मात्रा १७% एवं काण्ड में ७% होती है। इसका मूल ज्वरघ्न, फल अतिसारघ्न एवं मूल-स्वरस क्षय में पिलाने के लिये लाभदायक माना जाता है। बीज बल्य माने जाते हैं। १३३. मूर्वा (४) हिं०—चरनहार। उ०—गोलरंग। देह०—बेलकंगु, बेलकम्। म०—रानजाई। गु०—मोरबेल। ले०—Clematis gouriana Roxb. (क्लेमॅटिस ग्योरियाना राक्स.)। Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्युलेसी)। यह पश्चिम हिमालय में ५०००' फीट तक एवं भारत के सभी प्रान्तों में १ से ३ हजार फीट तक होती है। यह लता जाति का एक विस्तृत क्षुप है, जिसकी कई उपजातियाँ इस प्रान्त में पाई जाती हैं। नवीन भाग मृदु रोमश होता है। पत्ते—संयुक्त पक्षवत् होते हैं। पत्रनाल सूत्रसदृश होता है, जिससे ये लताएँ दूसरे वृक्षों पर चढ़ती हैं। पत्रक—अंडाकार, आयताकार, हृद्वत् तीक्ष्णाग्र एवं ऊपर से चमकीले होते हैं। पुष्प—प्रायः श्वेत वर्ण के एवं त्रिविभक्त मञ्जरियों में होते हैं। फल—रोमश एवं पंखवद् पुच्छदार होते हैं। महाराष्ट्र के कुछ लोगों ने इसे मूर्वा माना है, किन्तु इसके किसी भाग से रेशे नहीं निकलते; इसलिये इसे मूर्वा मानना उचित नहीं है। मूर्वा को 'धनुर्गुणोपयोग्या' होना आवश्यक है। रासायनिक संगठन—इसमें एक तिक्त विषैला तत्त्व पाया जाता है। गुण और प्रयोग—यह संसन, कुष्ठघ्न एवं स्वेदजनन है। इसके पत्ते तथा ताजे काण्ड को पीसकर चर्म पर लगाने से छाले पड़ते हैं। उपदंश, गण्डमाला, रक्तपित्त, कुष्ठ एवं खुजली में इसके पञ्चांग का फांट देते हैं। इससे त्वचा की विनिमय- क्रिया ठीक होती है। ज्वर एवं नये सन्धिवात में इससे लाभ होता है। १३४. मूर्वा (५) सं०—पीलुपर्णी, मधुरसा, तेजनी, मोरटा। चित्रकूट—मुरहरी। ता०—भूमि चक्करे। ते०—मोरिनिका। गु०— विका। ले०—Maerua arenaria Hook f. & Th. (मेरुआ एरेनेरिया हुक.)। Fam. Capparidaceae (कॅपेरिडेसी)। यह पंजाब, सिंधु, गुजरात, दक्षिण एवं मध्यभारत में होती है।

गुडूच्यादिवर्गः ६०१ इसकी आरोही झाड़ीदार लता होती है। पत्र-१ से २ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च चौड़े, अंडाकार-आयताकार, कुण्ठिताग्र एवं चिकने होते हैं। पुष्प-हरिताभ श्वेत, समशिख (कोरिम्ब) गुच्छों में आते हैं। फल-हलके भूरे रंग के तथा प्रत्येक बीजों के बीच में संकुचित होते हैं। बीज-भूरे, गोल तथा काँटेदार होते हैं। इसको जड़ रसायन, बल्य एवं उत्तेजक मानी जाती है। १३५. मूर्वा (६) सं०-मूर्वा, आवर्तनी, आवर्तमाला। हिं०-मरोडफली, मरोरफली, ऐंठनी, गोमठी। म०-केवण, मुरडशेंग। बं०-आरमोरा। गु०-मरडासिंग, मरडासिंगी। ता०-बलंबुरी। ते०-आडामति। ले०-Helicteres isora Linn. (हेलिक्टेरीज आइसोरा लिन.); Fam. Sterculiaceae (स्टर्क्यूलिएसी)। यह पश्चिम एवं मध भारत के शुष्क जंगलों में, बिहार से लेकर जम्मू तक तथा पश्चिमी पेनिनसुला में पाई जाती है। इसका गुल्म या छोटा वृक्ष होता है। पत्ते-फालसे की तरह तथा ऊपर से खुरदरे होते हैं, मध्यनाड़ी के भाग असमान होते हैं। शिराएँ-५-७ होती हैं। पुष्प-टेढ़े, अनियताकार तथा लालरंग के होते हैं। फल-१-२ इञ्च लम्बे ऐंठे हुये तथा पाँच खण्ड युक्त होते हैं। यह पाँच स्त्री-केशरों से बने हुए होते हैं। इनका मूर्वा नाम गलती से प्रयोग किया जा रहा है। इसकी, छाल से सफेद दृढ़ रेशे भी निकाले जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह शीतल, कषाय, त्रिदोषघ्न एवं कृमिनाशक है। इसके फल स्नेहन एवं ग्राही होते हैं तथा बच्चों के मरोड़ एवं आनाह में लाभदायक हैं। इसकी छाल या फल अतिसार तथा प्रवाहिका में लाभदायक है। शूल में मूल, छाल या फल दिया जाता है। पेट की बीमारियों में इसका चूर्ण भूनकर २ १/२-३ माशे की मात्रा में घृत एवं शर्करा के साथ दिया जाता है। इसके मूल की छाल का क्वाथ मधुमेह में दिया जाता है। खुजली में इसके फल को घिस कर लेप करने से लाभ होता है। मात्रा-१ १/२-३ माशा। अथ काकमाची (मकोय)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह काकमाची ध्वाङ्क्षमाची काकाह्वा चैव वायसी। काकमाची त्रिदोषघ्नी स्निग्धोष्णा स्वरशुक्रदा ।। २४६।। तिक्ता रसायनी शोथकुष्ठार्शोज्वरमेहजित्। कटुर्नेत्रहिता हिक्काच्छर्दिहद्रोगनाशिनी ।। २४७।। १३६. मकोय हिं०-मकोय, छोटी मकोय। बं०-काकमाची, गुडकामाई। म०-कानोणी। गु०-पीलुडी। फा०-रूबाहतुर्बुक। अ०-इनबुस्सालव। अं०-Garden Nightshade (गार्डेन नाइटशेड)। ले०-Solanum nigrum Linn. (सोलैनम् नाइग्रम् लिन.)। Fam. Solanaceae (सोलेर्नेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में एवं ८००० फीट तक पश्चिम हिमालय में उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-१-१॥ हाथ तक ऊँचा होता है और शाखायें-सघन होती हैं। यह गर्मी में नष्ट हो जाता है और वर्षा के अन्त में उत्पन्न हो जाड़े में खूब हरा-भरा दिखलाई पड़ता है। इसके पत्ते-अखण्ड, लहरदार या कभी-कभी दन्तुर या खण्डित, लट्वाकार, प्रासवत् लट्वाकार या आयताकार, ४ x १.७ इञ्च तक बड़े और उनका फलक-प्रायः वृन्त CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

६०२ भावप्रकाशनिघण्टुः पर नीचे तक फैला रहता है। पुष्प-छोटे, सफेद और पत्रकोण से हट कर निकले हुए पुष्पदंड पर समस्थ मूर्धज क्रम में निकले रहते हैं। फल-गोल और पकने पर काले हो जाते हैं। कभी-कभी लाल या पीले भी होते हैं। इसके फल एवं पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। चरक में तिक्तस्कन्ध में इसका पाठ है। इसके शाक का प्रयोग चरक ने वातरक्त, अर्श, ऊरुस्तम्भ आदि में किया है। रासायनिक संगठन-इसमें सोलेनिन् (Solanin) नामक एक क्षाराभ पाया जाता है। इसके अतिरिक्त सॅपोनिन् भी इसमें होता है। इसमें का विषैला द्रव्य बहुत अल्प मात्रा में इसमें होता है। इसकी विषाक्तता की परीक्षा करने के लिए भेड़ को खिला कर देखा गया है। गुण और प्रयोग-यह त्रिदोषशामक, अनुष्णशीत, तिक्त, कटु, रसायन, कुष्ठघ्न, भेदन (सारक), मूत्रजनन, वृष्य, स्वेदजनन एवं वेदनाहर है। इसके ताजे पत्तों का स्वरस गरम करके दिया जाता है। इसके फल ज्वर, अतिसार, नेत्ररोग एवं हृद्रोग में लाभदायक हैं। इसका प्रयोग शोथ, कुष्ठ, नेत्र रोग, हृद्रोग, जीर्णयकृत्-वृद्धि, रक्तष्ठीवन, अर्श, ज्वर एवं कंडू में किया जाता है। (१) इसका प्रधान कार्य यकृत् पर होता है। जीर्ण यकृतवृद्धि, अर्श, उदर, रक्तष्ठीवन, चर्मरोग तथा आँव आदि यकृत् विकार के कारण होने वाले रोगों से इससे लाभ होता है। इससे शौच साफ होता है तथा मूत्र द्वारा भी दोष निकलते हैं। (२) जीर्ण चर्म रोग विशेषकर कंडू, सोराइसिस् (Psoriasis) तथा दाद में इसके कोमल कांड तथा पत्तों का शाक खिलाते हैं एवं पत्रलेप भी करते हैं। (३) किसी भी प्रकार के शोथ में इसका बाह्यान्तर प्रयोग लाभदायक है। इसका शाक शोथ में खिलाते हैं। जलशोथ में इसका स्वरस अधिक मात्रा में दिया जाता है। मात्रा-स्वरस १-२ तोला। अथ काकनासा । तस्या नामगुणानाह काकनासा तु काकाङ्गी काकतुण्डफला च सा ।। २४८ ।। काकनासा कषायोष्णा कटुका रसपाकयोः । कफघ्नी वामनी तिक्ता शोथार्शःश्वित्रकुष्ठहृत् ।। २४९ ।। काकनासा के नाम तथा गुण-काकनासा, काकाङ्गी और कांकतुण्डफला ये नाम काकनासा के हैं। काकनासा- कषाय, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, उष्णवीर्य, विपाक में कटु रसयुक्त, कफनाशक, वमन कराने वाली एवं शोथ, अर्श, सफेद कुष्ठ को दूर करने वाली होती है। [२४८-२४९] काकनासा संदिग्ध द्रव्य है। कई वनस्पतियों के फलों को जो काक तुण्ड सदृश दिखलाई देते हैं, काकनासा नाम से ग्रहण किया जाता है। चरक में मधुर स्कन्ध में तथा च्यवनप्राश में इसका उल्लेख है। कासचिकित्सा के त्र्यूषणादि घृत में एवं अपस्मार, योनिरोग आदि की चिकित्सा में उल्लेख है। सुश्रुत में अनुवासनवस्ति-द्रव्यों में इसका उल्लेख है। चक्रपाणि एवं डल्हण की टीकाओं में इसे 'वायसफला' लिखा हुआ है। अन्य टीकाकारों ने इसका प्रादेशिक नाम कौवाटोटा, कौवाठोडी, कौवाडोडी आदि दिया है। कहीं-कहीं काकनासा एवं काकजंघा ये एक दूसरे के पर्याय दिये हैं, जो उचित नहीं मालूम होता। इस वनस्पति के निर्णय में काकतुण्डवत् फल का होना आवश्यक है। साथ ही इसमें उष्ण, कटु, कफनाशक, वामक एवं चर्मरोगनाशक गुण भी होना आवश्यक है। अर्वाचीन निघण्टुकारों एवं टीकाकारों ने जिन विभिन्न वनस्पतियों का उल्लेख कौवाटोडी या काकनासा नाम से किया है उनमें अधिकांश विदेशी वनस्पतियाँ हैं जो कुछ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

काल से यहाँ भी प्रचुर होने लग गई हैं। काकनासा तो चरक-सुश्रुत के समय से चली आ रही है ऐसी अवस्था में इन्हें काकनासा मानना कहाँ तक उचित होगा ? काकनासा के स्थान पर ली आने वाली कुछ वनस्पतियों का संक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। पटोलभेद, कौआरोटी, ले०-Trichosanthes cucumerina Linn. (ट्राइकोसॅन्थिस् क्युकुमेरिना लिन.) के फल पकने पर कौवे खाते हैं इसलिये कुछ लोग इसके काकनासा होने का अनुमान करते हैं । इसका वर्णन पटोल के साथ किया गया है। कुछ लोगों ने Pentatropis microphylla W. & A. (पेण्टाट्रोपिस माइक्रोफाइला); Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी) को तथा कुछ ने बृहती (Solanum indicum Linn. (सोलेनम् इण्डिकम्) को काकनासा माना है। १३७. काकनासा (१) ले०-Asclepias curassavica Linn. (एस्क्लेपिअस् कुरेसॅविका लिन.); Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी) । सं०-काकतुण्डी, रक्तपुष्पा। बं०-कुरकी, कुर्की । पं०-काकतुण्डी । अं०-Bastard Ipecacuanha (बॅस्टर्ड इपेकॅक्यूआन्हा) । यह वेस्ट इण्डिज का विदेशी पौधा है किन्तु अब बागों में तथा गावों के आस-पास मिलता है। इसका क्षुप-स्वावलम्बी तथा २ फीट ऊँचा होता है। पत्र-आमने-सामने, २-३ इञ्च लम्बे, भालाकार या आयताकार-भालाकार होते हैं। पुष्प-नारङ्ग या (स्कारलेट) रक्त रंग के गुच्छों में आते हैं। फली-दो-दो एक साथ, ३ इञ्च लम्बी तथा काकतुण्ड सदृश होती है। जड़-बहुत, पतली, हल्के पीले रंग की तथा भीतर से श्वेत रहती है । स्वाद कडुवा तथा तीता होता है । इसमें दुग्ध होता है। इसकी जड़, पञ्चांग एवं पत्र का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पञ्चांग में एस्क्लेपिऑडिन् (Asclepiadin) नामक एक ग्लूकोसाइड होता है। इसकी जड़ में विंसेटॉक्सिन (Vincetoxin) नामक द्रव्य होता है जिसकी क्रिया इमेटीन (Emetine) सदृश होती है। गुण और प्रयोग-इसके कार्यकारी तत्त्व की क्रिया इमेटीन सदृश होती है। अर्क से भी इसका सादृश्य है। इससे रक्तवाहिनियों का संकोच एवं बड़ी धमनियों का विस्फार होता है। हृदय के लिये यह अवसादक है। अल्प मात्रा में यह आमाशय उत्तेजक, यकृत के लिये उत्तेजक, पित्तस्त्रावक, स्वेदजनन एवं कफघ्न है। अधिक मात्रा में यह वामक एवं विरेचक है। इसका प्रयोग कृमि, रक्तस्राव, राजयक्ष्मा, सोजाक, आमातिसार तथा अर्श में किया जाता है। (१) इसके पत्तों या पुष्पों का लेप रक्तस्राव रोकने के लिये करते हैं। (२) कफविकारों में इसको देने से कफ पतला होकर निकलता है। (३) सोजाक में इसका क्वाथ ताजा बनाकर देते हैं। १३८. काकनासा (२) हिं०-बिछुआ । म०-विंचु । बं०-बाघनोकी । ले०-Martynia diandra Glox. (मार्टिनिआ डाइएण्ड्रा ग्लोक्स.) Fam. Pedaliaceae (पेडॅलिएसी) । यह मेक्सिको (Mexico) का आदिवासी होते हुये भी भारत में काफी फैल गया है तथा कूड़े आदि के स्थानों पर होता है। इसका क्षुप-३, ४ फीट ऊँचा, मोटा, स्पर्श में मृदुरोमश, चिपचिपा तथा भींगा हुआ सा होता है। पत्ते-६- ९ इञ्च लम्बे, विपरीत, तांबूलाकार, दूर-दूर पर दन्तुर एवं तट पर लहरदार होते हैं एवं इनका पृष्ठ प्रायः ओसकणों के CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

६०४ भावप्रकाशनिघण्टुः

समान एक चिपचिपे पदार्थ के सूक्ष्म बिन्दुओं से ढँका रहता है। फूल-३-४ इञ्च लम्बी और अग्र्य मंजरियों में नीचे की ओर लटके हुये, गुलाबी या गहरे बैंगनी रंग के एवं आकार में तिलपुष्प के समान होते हैं। फल-काले रंग का, बहुत कठोर, अग्र पर दो तीक्ष्ण एवं टेढ़े काँटों से युक्त होता है। इन फलों का भ्रमवश काकनासा या वृश्चिकाली नाम से प्रयोग चल रहा है, जो गलत है। फल का स्वरूप कुछ-कुछ बिच्छू के समान होने से तथा बिच्छू के काटने पर इसका लेप उपयोग में आने से इसे बिछुआ कहते हैं। गुण और प्रयोग-बिच्छू के काटने पर इसके फल को घिस कर लेप करते हैं। भपके से फल का निकाला हुआ तैल पामा आदि चर्म रोगों में उपयोगी बतलाया गया है। इसके पत्तों को अपस्मार में प्रयोग करते हैं तथा अपची में लेप करते हैं। १३९. काकनासा (३) ले०-Thunbergia alata Boj. (थन्बर्जिया एलेटा); Fam. Acanthaceae (एकेन्थेसी)। यह लता संभवतः अफ्रीका की आदिवासी है। अपने यहाँ उद्यानों में लगाई हुई पाई जाती है। इसकी लता पतली तथा आरोही होती है। पत्ते-मृदुरोमश, लट्वाकार, हृदयाकार एवं वृन्त प्रायः सपक्ष रहता है। पुष्प-पीत या श्वेताभ एवं भूरे या बैंगनी रंग की आँख से युक्त होते हैं। फल-काकतुण्ड सदृश होते हैं। कुछ लोग इसे काकनासा मानते हैं। अथ काकजङ्घा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह काकजङ्घा नदीकान्ता काकतिक्ता सुलोमशा। पारावतपदी दासी काका चापि प्रकीर्त्तिता ।।२५०।। काकजङ्घा हिमा तिक्ता कषाया कफपित्तजित्। निहन्ति ज्वरपित्तास्रव्रणकण्डूविषक्रिमीन् ।। २५१ ।। काकजङ्घा के नाम तथा गुण-काकजङ्घा, नदीकान्ता, काकतिक्ता, सुलोमशा, पारावतपदी, दासी और काका ये सब नाम काकजङ्घा के हैं। काकजङ्घा-शीतवीर्य, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त एवं कफ, पित्त, ज्वर, रक्तपित्त, व्रण (घाव), कण्डू (खुजली), विष और क्रिमि को दूर करनेवाली होती हैं। [२५०-२५१] नोट-काकजङ्घा के स्थान पर उत्तर प्रदेश में मसी का ग्रहण किया जाता है किन्तु यह निःसंदिग्ध रूप से काकजङ्घा नहीं माना जा सकता। डॉ० देसाई ने Leea hirta (लीआ हिर्टा) को काकजङ्घा माना है। श्री डॉ० बलवन्तसिंह जी ने 'सिमजंगा' नामक वृक्ष की तरफ ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि उसके स्थानिक नाम तथा गुण काकजङ्घा से मिलते- जुलते हैं। शास्त्रीय गुणों की दृष्टि से काकंजङ्घा विषमज्वरनाशक, कफ-पित्तशामक, तिक्त, चर्मरोगनाशक एवं रक्तपित्त, बाधिर्य, क्षत, विष एवं कृमि में लाभदायक होनी चाहिये। रा० नि० एवं ध० नि० इसे उष्ण मानते हैं। काकनासा, काकजङ्घा, काकमाची आदि काकसम्बन्धी वनस्पतियों का उल्लेख ग्रन्थों में आया है और टीकाकारों ने कहीं-कहीं एक को दूसरे का पर्याय बतलाया है। १४०. काकजङ्घा (१) हिं०-काकजङ्घा, मसी। बं०-नासकागा। म०-रान किरायता। ले०-Peristrophe bicalyculata Nees (पेरिस्ट्रोफ बाइकेलीक्युलेटा नीस्)। Fam. Acanthaceae (एकेन्थेसी)। यह सर्वत्र पाया जाता है। इसका क्षुप-३-६ फीट ऊँचा एवं शाखायें-प्रसरणशील होती हैं। काण्ड-षट्कोण एवं सन्धियाँ फूली हुई रहती हैं। पत्ते-रोमश, नोक वाले तथा नीचे बड़े एवं ऊपर छोटे होते हैं। नीचे के पत्ते ४.२५" x २.७५" होते हैं। पुष्पवाहक शाखाएँ अत्यन्त शाखाओं से युक्त और अन्तिम छोटी-छोटी शाखाएँ केवल दो- दो पुष्पों वाली होती हैं जिनमें प्रायः एक पुष्प अर्ध विकसित रहता है। पुष्प-छोटे, गुलाबी या जामुनी रंग के आते हैं।

गुडूच्यादिवर्गः ६०५ गुण और प्रयोग-काकजङ्घा के स्थान पर उत्तर प्रदेश में इसी का व्यवहार किया जा रहा है। किन्तु इसके काकजङ्घा होने में सन्देह है। इसको सर्पविष में उपयोगी बतलाया जाता है। १४१. काकजङ्घा (२) सं०-काकजङ्घा। हिं०-चिरईगोड़ा, मिजुरगोरवा। असा०-ओसाई। बं०-बोरूना गोडा। ले०-Vitex peduncularis Wall. (वाइटेक्स पेडन्क्युलेरिस् वाल.)। Fam. Verbenaceae (वर्बिनेसी)। यह बिहार, मध्य प्रदेश, आसाम तथा पूर्वी बंगाल से तेनासरिम् तक होता है। इसके वृक्ष-छोटे २०, २५ फीट ऊँचे एवं शाखाएँ मृदुरोमश होती हैं। पत्ते-संयुक्त एवं त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक-लम्बे, भालाकार, ४.५" × १" बड़े, नोकीले, अधरतल पर सूक्ष्म पीतवर्ण की ग्रन्थियों से युक्त होते हैं। वृन्त प्रायः सपक्ष होते हैं। पुष्प-६-११ इञ्च लम्बी मञ्जरियों में श्वेतवर्ण के तथा कण्ठ में पीले पुष्प आते हैं। फल-मांसल, गुठलीदार एवं .३५-.४ इञ्च बड़ा होता है। इसके पत्तों का व्यवहार किया जाता है। इसका एक अन्य जाति V. lencoxylon Linn. (वा. ल्यूकोक्साइलोन् लिन.) पायी जाती है। इनके स्थानिक नाम सिमजङ्घा, मुरगी-गोडा, चिरई गोडा आदि काकजङ्घा के समानार्थक मालूम पड़ते हैं तथा इसका जंगली लोग विशिष्ट विषमज्वर Blackwater Fever (ब्लॅक वाटर फीवर) में प्रयोग भी करते हैं। काकजङ्घा को शास्त्रकारों ने विषमज्वर में उपयोगी बतलाया है। वरुण वृक्ष के पत्तों की तरह इसकी त्रिपत्रक पत्तियाँ होने के कारण इसे कहीं-कहीं वरुना भी कहते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में एक उड़नशील तैल, अधिक मात्रा में टॅनिन, गोंददार पदार्थ एवं कुछ ग्लूकोसाइड सदृश पदार्थ होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्तों का फांट मलेरिया जैसे ज्वरों में विशेषकर Blackwater fever (ब्लॅक वाटर फीवर) में प्रयोग किया जाता है। दो औंस ताजे या छाया में सुखाये पत्तों को ४० औंस जल में ५।१० मिनट उबाल कर १ घंटा सीझने देते हैं। चाय की तरह बना यह फांट कुछ चीनी मिला कर दिन भर में ८ से १० औंस की मात्रा में दिया जाता है। १४२. काकजङ्घा (३) सं०, हिं०, बं०, म०-काकजङ्घा। ले०-Leea hirta Roxb. (लीआ हिर्टा राक्स.)। Fam. Vitaceae (वेटेसी)। यह सिक्किम हिमालय, आसाम, पूर्व बंगाल, सिलहट एवं अण्डमान में होती है। इसकी १.२-३ मी० ऊँची झाड़ी होती है। नये काण्ड मृदुरोमश; पत्ते-संयुक्त; पत्रक-७.५-१८ × २.५-४.५ से० मी०, आयताकार या अण्डाकार-आयताकार, लम्बाग्र, असम दन्तुर, रोमश, अधोपृष्ठ गोल, चिपटे, चकत्तों से युक्त एवं पत्रदण्ड कोणदार; पुष्प-श्वेत मंजरियों में; फल-६ मि० मि० व्यास के, दबे हुये गोल एवं पकने पर काले होते हैं। इसकी जड़ का चिकित्सा में व्यवहार करते हैं। गुण और प्रयोग-यह स्नेहन तथा संग्राहक है। इसके पंचांग में क्षयनाशक गुण भी पाया गया है। अथ नागपुष्पी । तस्या नामानि गुणाँश्चाह नागपुष्पी श्वेत पुष्पा नागिनी रामदूतिका। नागिनी रोचनी तिक्ता तीक्ष्णोष्णा कफपित्तनुत् । विनिहन्ति विषं शूलं योनिदोषवमिक्रिमीन् ।।२५२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

६०६ भावप्रकाशनिघण्टुः नागपुष्पी के नाम तथा गुण-नागपुष्पी, श्वेतपुष्पा, नागिनी और रामदूतिका ये नाम नागपुष्पी के हैं। नागपुष्पी-तिक्त, रसयुक्त, रोचक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य एवं कफ, पित्त, विष, शूल, योनिसम्बन्धी दोष, वमन तथा क्रिमि को नष्ट करने वाली होती है। [२५२] १४३. नागपुष्पी हिं०-नागपुष्पी। म०-नागाली। नागपुष्पी लता जाति की वनौषधि जङ्गल में वृक्षों पर फैली हुई रहती है। एक-एक शाखा में एक-एक पत्ता होता है। फूल-सफेद और काले रंग के होते हैं। बेल के नीचे कन्द बैठता है। उपर्युक्त वर्णन सुना जाता है। किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से इसका निर्णय अभी नहीं हो सका है। नागपुष्पों का उल्लेख रा० नि०, ध० नि० में नहीं मिलता। चिकित्सा में भी इसका विशेष प्रयोग नहीं होता। अथ मेषशृंगी (मेढाशिङ्गी) । तस्या नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह मेषशृङ्गी विषाणी स्यान्मेषवल्ल्यजशृङ्गिका। मेषशृङ्गी रसे तिक्ता वातला श्वासकासहृत् ।। २५३ ।। रूक्षा पाके कटुः पित्तव्रणश्लेष्माक्षिशूलनुत् ।। २५४ ।। मेषशृङ्गीफलं तिक्तं कुष्ठमेहकफप्रणुत्। दीपनं संसनं कासक्रिमिव्रणविषापहम् ।। २५५ ।। मेढ़ाशिंगी के नाम तथा गुण-मेषशृङ्गी, विषाणी, मेषवल्ली और अजशृङ्गिका ये सब संस्कृत नाम हैं। मेढ़ाशिंगी-तिक्त रसयुक्त, वातकारक, रूक्ष, विपाक में कटु रसयुक्त एवं श्वास, कास, पित्त, व्रण, कफ और नेत्रशूल को दूर करने वाली होती है। मेढ़ाशिंगी का फल-तिक्त रसयुक्त, अग्निदीपक, संस्रनं एवं कुष्ठ, प्रमेह, कफ, कास, कृमि, व्रण और विष को नष्ट करने वाला होता है। [२५३-२५५] नोट-मेषशृङ्गी भी सन्दिग्ध द्रव्य है। अधिकांश विद्वानों ने 'गुडमार' को मेषशृङ्गी माना है। कुछ ने 'मरोडफली' को मेषशृङ्गी माना है। मरोडफली को कुछ मूर्वा के स्थान पर ग्रहण करते हैं जिसका पहले मूर्वा के अन्तर्गत वर्णन किया जा चुका है। मेषशृङ्गी दोनों का एक जगह पाठ किया है इससे ये दो अलग द्रव्य मालूम पड़ते हैं किन्तु भावप्रकाश एवं ध० नि० दोनों का पर्याय के रूप में उल्लेख करते हैं। चरक में तिल्वक कल्प एवं शीतज्वरोक्त अगुर्वादि तैल में उल्लेख है। सुश्रुत ने विष एवं अक्षिविकार में इसका प्रयोग किया है। यहाँ गुडमार का संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है। १४४. मेढ़ाशिंगी सं०-मधुनाशिनी। हिं०-मेढासिंगी, गुडमार। बं०-मेषसिंगी। म०-मेढ़ाशिंगी, कावकी। ता०-शिरुकुरंज। ते०-पोडापत्री। ले०-Gymnema sylvestre R. Br. (जिमनेमा सिल्वेस्ट्रे)। Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी)। यह कोंकण, त्रावणकोर, गोवा, दक्षिण भारत में विशेष रूप से होती है। बिहार एवं उ० प्र० में भी कहीं-कहीं मिलती है तथा बाग़ों में लगाई हुई पाई जाती है। इसकी लता-चक्रारोही, पतले काण्ड की, काष्ठमय, रोमश तथा बहुत फैली हुई होती है। पत्ते-अभिमुख, अंडाकार- आयताकार या लट्वाकार, कभी-कभी हृद्गत, १-२ इञ्च लम्बे, कभी-कभी ३ इञ्च लम्बे, नोकदार एवं मृदुरोमश होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, पीले, समस्थ मूर्धजक्रम में निकले हुए एवं आभ्यन्तर कोश घण्टिकाकार-चक्राकार होते हैं। फली- २-३ इञ्च लम्बी, .२-.३ इञ्च मोटी, कठोर, भालाकार क्रमशः नोकीली होती है। दो में से प्रायः एक फली का विकास

नहीं होता। इसके सर्वांग में दूध होता है। मूल-१-१/४ इञ्च मोटा तथा बाहर से मुलायम एवं उस पर बीच-बीच में सीधी, लम्बाई में गढ़ेदार नालियाँ होती हैं। मूल सूखने पर छाल पतली होकर आड़े बल में फट जाती है। इसका स्वाद साधारण कड़वा होता है। इसकी पत्तियों को चबाने से जीभ की स्वाद ग्रहणशक्ति नष्ट हो जाती है जिससे १-२ घण्टे तक मधुर तथा तिक्तरस का स्वाद नहीं मालूम पड़ता। इसी से इसे गुड़मार या मधुनाशिनी कहते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें Gymnemic acid (जिम्नेमिक एसिड) नामक एक पदार्थ होता है। पत्तों में ॲन्थ्राक्विनोन कम्पाउण्ड (Anthraquinone compound) होता है। गुण और प्रयोग-इसके गुण इपिकाक तथा उतरण जैसे हैं। यह कफघ्न तथा वामक है। इसके पत्तों के सेवन से मधुमेह में लाभ होता है। (१) मधुमेह में इसके पत्तों को चबाने से या इसके पत्र चूर्ण को १-२ माशे की मात्रा में गोदुग्ध वा मधु के साथ सेवन से लाभ होता है। (२) जड़ की छाल से हल्लास, स्वेदोत्पत्ति एवं अधिक मात्रा (१५-३० र०) से वमन होता है। इससे कफ निकलता है एवं शरीर पीड़ा कम होती है। (३) सर्पदंश में मूल का क्वाथ पिलाते हैं तथा लेप करते हैं जिससे वमन, विरेचन होकर विष कम होता है। बाद में उत्तेजक औषधियाँ देते हैं। (४) पत्तों को पीसकर सूजन तथा व्रण पर लेप करते हैं। मात्रा-पत्रचूर्ण १-२ माशा, मूलत्वक् १-२ र० कफघ्न, १५-३० र० वामक।

अथ हंसपदी (हंसराज) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह हंसपादी हंसपदी कीटमाता त्रिपादिका। हंसपादी गुरुः शीता हन्ति रक्तविषव्रणान्। विसर्पदाहातीसारलूताभूताग्निरोहिणीः ॥२५६॥

हंसराज के नाम तथा गुण-हंसपादी, हंसपदी, कीटमाता और त्रिपादिका ये संस्कृत नाम हंसराज के हैं। हंसराज-गुरु, शीतवीर्य एवं रक्तविकार, विष, व्रण, विसर्प, दाह, अतीसार, लूताविष, भूतग्रह और अग्निरोहिणी (कक्षास्फोट) को दूर करती है। [२५६]

१४५. हंसराज हिं०-हंसपदी, समलपत्ती, हंसराज, गोधपदी। बं०-गोयलिया लता, कालीसाह। गु०-हंसराजा। म०- हंसपदी, हंसराजा। फा०-परसा उशां, परस्यां वशां। अ०-शारूजीनां, शारूल अर्ज। अं०-Maiden hair (मैडेन हेयर)। ले०-Adiantum lunulatum Burm. (एडीएण्टम् लुनुलेटम् वर्म.)। Fam. Polypodiaceae (पॉलिपोडिएसी)। यह उत्तरी भारत के आर्द्र स्थानों में एवं दक्षिण के पश्चिमी मैदानों तथा पहाड़ियों के निचले भागों में होती है। यह वनस्पति सुन्दर तथा छोटी होती है। इसमें अन्तर्भूमिशायी कांड होता है। इससे केवल पत्ते बाहर निकले रहते हैं। पत्रदण्ड काला, चमकीला होता है। पत्रक-कुछ-कुछ वृत्ताकार या अंडाकार, आयताकार, .५-१.३ इञ्च लम्बे, अग्र की ओर का किनारा सरल और आधार की ओर का किनारा घुमावदार होता है। इसमें पुष्प नहीं होते। अधर तल के किनारे पर बीजाणु कोष (Sporagia) होते हैं। इसका चरक में कण्ठ्य महाकषाय, मधुर स्कन्ध तथा सुश्रुत में विदारिगन्ध्यादि गण में पाठ है। चिकित्सा में पंचांग का व्यवहार किया जाता है।

६०८ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-यह मधुर, शीत, कण्ठ्य, कुछ ग्राही, कफघ्न एवं कुछ मूत्रजनन है। अधि मात्रा से वमन होता है। इसका प्रयोग ज्वर, रक्तविकार, विसर्प, विषविकार एवं कण्ठ विकार में करते हैं। बच्चों के कास में इससे लाभ होता है। इसके पंचांग का शरबत बना कर १/२-१ तो० की मात्रा में प्रयोग करते हैं। मात्रा-१०-३० रत्ती। अथ सोमलता। तस्या नामगुणानाह सोमवल्ली सोमलता सोमक्षीरी द्विजप्रिया। सोमवल्ली त्रिदोषघ्नी कटुस्तिक्ता रसायनी ॥२५७॥ सोमलता के नाम तथा गुण-सोमवल्ली, सोमलता, सोमक्षीरी और द्विजप्रिया ये सब सोमलता के पर्यायवाची शब्द हैं। सोमलता-कटु तथा तिक्तरसयुक्त, त्रिदोषनाशक एवं रसायन होती है। [२५७] सोमलता सोमलता नामक दिव्य औषधि क्या है ? इस सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने विचार किया है किन्तु अभी तक इसका निर्णय नहीं हो सका है। वास्तव में सुश्रुत में ही इसके संबंध में लिखा है कि अधर्मी, कृतघ्न, भेषजद्वेषी तथा ब्राह्मणद्वेषी लोगों को यह दिखलाई नहीं देती। आधुनिक युग में कौन सा ऐसा व्यक्ति होगा जो किसी न किसी अवगुण से युक्त न हो। उपर्युक्त वचन से ऐसा प्रतीत होता है कि यह वनस्पति उस काल में भी अप्राप्य या दुष्प्राप्य रही हो और उसके स्थान पर उसके प्रतिनिधि द्रव्यों का प्रयोग होता रहा हो। सोम का वर्णन ऋग्वेद तथा पौराणिक साहित्य में भी है। यज्ञ के पूर्व आनन्ददायक पेय के रूप में सोमरस-पान किया जाता रहा। सोम को ओषधिराज लिखा है। इसी प्रकार के एक द्रव्य का उल्लेख प्राचीन पारसी धर्म ग्रंथ 'जन्द अवस्ता' में है, जिसे होम कहते हैं। संभव है होम यह सोम का परिवर्तित रूप हो। इसी आधार पर होम नाम से प्रयुक्त द्रव्यों को कुछ विद्वानों ने सोम माना है। सुश्रुत में इसके संबंध में विशद वर्णन मिलता है। यह हिमालय, विन्ध्य, काश्मीर, मलय आदि स्थानों में होती है। इसके स्थान, नाम, आकृति, वीर्य भेद से २४ प्रकार होते हैं। इस लता में शुक्ल पक्ष में एक-एक पत्र प्रतिदिन बढ़ कर पूर्णिमा को १५ पत्ते हो जाते हैं तथा कृष्ण पक्ष में एक-एक पत्र घट कर अमावस्या को यह बिना पत्र के हो जाता है। इस लता में दुग्ध होता है तथा नीचे कन्द भी होता है। कायाकल्प के लिये कुटी प्रावेशिक विधि से इसके सेवन का वर्णन सुश्रुत में किया है। यह श्रेष्ठ मादक द्रव्य है। इससे बल, वाक्शक्ति, स्फूर्ति, सौमनस्य एवं अमरत्व की प्राप्ति होती है। प्रत्येक रोग को दूर कर यह मन को आनन्द देने वाली लता है। इसमें अन्य मादक द्रव्यों का कोई दोष नहीं होता। सोम के नाम से जिनका उल्लेख किया जाता है उनमें से कुछ का संक्षेप में यहाँ वर्णन दिया गया है, यद्यपि दिव्य गुण वाली सोम इनमें से कोई मालूम नहीं पड़ती। १४६. सोम (१) सं०-सोम। हिं०-टुटगंठा। पं०-अमसानिया, बुदशुर, चेवा। स०-फोत्र। ई०-होम, हुम्। क०-खम, खंड। अं०-Ephedrs; Ma-huang (एफेड्रा, मा-हाँग)। ले०-Ephedra gerardiana (Wall) Stapf; E. nebrodensis (Tineo) Stapf (एफेड्रा जेरार्डिआना; ए. नेब्रोडेन्सिस्)। Fam. Gnetaceae (ग्नेटेंसी)। इनमें से ए. जेरार्डिआना हिमालय के शुष्क एवं ऊँचे स्थानों में ७-१६ हजार फीट तक बहुत होता है। पंगी, लाहौल, कनवार, सिमला जिले के शाली स्थान, कश्मीर एवं लद्दाख में बहुत होता है। ए. नेब्रोडेन्सिस, लाहौल, पश्चिमी तिब्बत, बलूचिस्तान एवं वजीरिस्तान में होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

औषध के लिए इसके काण्ड का संग्रह वसन्त ऋतु में करते हैं। ए. जेरार्डिआना का क्षुप—छोटा, सर्पणशील, कडा तथा गुच्छे के रूप में होता है। शाखाएँ—प्रतिग्रंथि पर दो और अभिमुख या अनेक एक चक्र में निकली रहती हैं। ये सीधी, हरी एवं रेखा युक्त होती हैं। पर्व करीब १/२ इञ्च से १ १/२ इञ्च लम्बे होते हैं तथा दियासलाई की सीक की तरह दिखलाई देते हैं। पुराने काण्ड की त्वचा धूसर हो जाती है। पत्ते—वल्क सदृश होते हैं और प्रत्येक ग्रन्थि पर इन वल्कपत्रों के मिलने से एक पीताभ या भूरा करीब २ मि० मि० लम्बा द्विविभक्त कोष बना होता है। पुष्प—नरपुष्पों की अंडाकार विदण्डिक मंजरियाँ अकेली या २-३ के गुच्छे में रहतीं हैं जिनमें ४-८ नरपुष्प होते हैं। नारीपुष्पों की मंजरी प्रायः अकेली और १-२ पुष्पों से युक्त होती है। फल—७.५-१० मि० मि० लम्बा, लट्वाकार, लाल, मधुर तथा खाने लायक होता है। बीज—१-२ दोनों तरफ फूले हुये होते हैं। काण्ड में तीव्र गन्ध होती है तथा इसका स्वाद

६१० भावप्रकाशनिघण्टुः सौम्या महिषवल्ली च प्रतिसोमाऽन्त्रवल्लिका। अपत्रवल्लिका प्रोक्ता काण्डशाखा षडाह्वया। रसवीर्यविपाके च सोमवल्लीसमा स्मृता।। रा. नि. गुण और प्रयोग-अर्क दुग्ध की तरह इसके दूध का भी उपयोग होता है जो बहुत गुणकारी माना जाता है और इसी लिये इसको बाघ दूध कहते हैं। राक्सवर्ग के मतानुसार इसका दूध खट्टा होता है तथा यात्री तृषा शमन के लिये इसका उपयोग करते हैं। शुष्क काण्ड वामक माना जाता है। अथाकाशवल्ली (अमरवेल)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह आकाशवल्ली तु बुधैः कथिताऽमरवल्लरी ।।२५८।। खवल्ली ग्राहिणी तिक्ता पिच्छिलाऽक्ष्यामयापहा। तुवराऽग्निकरी हृद्या पित्तश्लेष्मामनाशिनी ।।२५९।। अमरबेल के नाम तथा गुण-आकाशवल्ली का ही पर्यायवाचक शब्द अमरवल्लरी है, ऐसा पण्डित लोग कहते हैं, अर्थात्-आकाशवल्ली, खवल्ली, अमरवल्ली ये नाम अमरवेल के हैं। अमरवेल-तिक्त तथा कषाय रस युक्त, मलसंग्राहक, पिच्छिल, नेत्ररोगनाशक, जठराग्निवर्धक, हृदय के लिये हितकर एवं पित्त, कफ तथा आम को नष्ट करनेवाली होती है। [२५८-२५९] नोट-प्राचीन ग्रन्थों में अमरबेल का उल्लेख नहीं है। अमृतवल्ली शब्द आया है, जिसका अर्थ टीकाकारों ने गुडूची किया है। कुछ विद्वानों ने अमरबेल नाम (Cuscuta reflexa) (कस्कुटा रिफ्लेक्सा) को दिया है तथा आकाशबेल (Cassytha filiformis) कॅसिथा फिलिफॉर्मिस् को दिया है। दोनों ही पराश्रयी लताएँ (Parasitic climber) हैं। दोनों एक स्थान पर उगी हुई नहीं पाई जाती। दोनों का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। १४८. अमरवेल (१) हिं०-आकाश वेल, अमर वेल। बं०-आलोक लता। म०-आकाश वेल, अमर वेल। गु०-अमर वेल। अ०-मून, कसूस। पं०-निराधार। फा०-अफतीमून। अं०-Dordar (डॉर्डर)। ले०-Cuscuta reflexa Roxb. (कस्कुटा रिफ्लेक्सा राक्स.)। Fam. Convolvulaceae (कॉन्हॉलहूलेसी)। यह भारत के सभी मैदानी भागों में तथा ८००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। इसकी लता-परोपजीवी होती है तथा जिस किसी वृक्ष पर फैलती है उसे अपने बोझ से झुका तक देती है। कभी- कभी इतनी फैलती है कि सारे वृक्ष को ढक देती है। अधिकतर बेर, बबूल के वृक्षों पर फैली रहती है। इसमें पत्ते नहीं होते, काण्ड-पतले एवं प्रायः पीले रंग के आपस में गुथे हुये होते हैं। पुष्प-१/४-१/३ इञ्च लम्बे, श्वेताभ या गुलाबी, सुगंधित, नलिकाकार, एकाकी या गुच्छों में आते हैं। फल-१/४-१/३ इञ्च व्यास के, दबे हुये, गोल एवं मांसल होते हैं। इसके मूल आधारादि वृक्ष के कांडों से ससक्त रहते हैं, जहाँ से वे अपना आहार ग्रहण करते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें कुस्कुटिन (Cuscutin) नामक एक रवेदार रंजक पदार्थ ०.२% होता है। इसके अतिरिक्त लॅक्टोन (Lactone) के समान गुण वाला कस्कुर्टलिन् (Cuscutalin) १%, बादामी रंग का मोम ०.१% तथा अपचायक शर्करा (Reducing sugar) होती है। इसके बीजों में स्थिर तैल ३%, रंजक द्रव्य अमरबेलिन (Amarbelin), कड़वी राल तथा अपचायक शर्करा (Reducing sugar) पाई जाती हैं। गुण और प्रयोग-यह आनुलोमक, पित्तसारक तथा यकृतोत्तेजक है। आश्रयी वृक्ष के अनुसार इसके गुण धर्म में कुछ परिवर्तन हो सकता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ६११ (१) इसका फाण्ट खुजली तथा व्रण-प्रक्षालन के काम में आता है। (२) यकृत् वृद्धि तथा विबंध हो तो इसका रस देने से दूषित पित्त निकल जाता है तथा विबंध भी दूर होता है। (३) इसके बीजों को उबाल कर उससे पेट सेंकने से वायु का अनुलोमन होता है। (४) कुछ लोगों ने इसका घाघरवेल नाम से उल्लेख किया है तथा लिखा है कि पंजाब में दाइयाँ इसके क्वाथ को गर्भपात कराने के लिये प्रयोग में लाती हैं। १४९. अमर वेल (२) हिं० - अमर वेल। ले० - Cassytha filiformis Linn. (कॅसिथा फिलिफ़ॉर्मिस् लिन.)। Fam. Lauraceae (लॉरेसी)। यह भारत में सभी स्थानों पर विशेषकर समुद्री किनारों पर अधिक होती है। इसकी लता—पराश्रयी, पत्रहीन, उपर्युक्त प्रथम अमरवेल की तरह होती है तथा शाल, करौंदा, कुटज तथा जामुन आदि वृक्षों पर फैली रहती है। इसका रंग पहली की अपेक्षा अधिक हरा होता है। पुष्प—अवृन्त, श्वेत, .५-१.५ इञ्च लम्बी मंजरियों में रहते हैं और उनके आधार पर तीन चौड़े तथा लम्बे और लट्वाकार कोणपुष्पक होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें एक क्षाराम होता है। गुण और प्रयोग—यह बल्य, केश्य, व्रणरोपण एवं वृष्य है। (१) इससे सर के बाल धोने से जूंयें आदि नष्ट होते हैं। इसे पीसकर तेल में मिलाकर केश वृद्धि के लिये काम में लाते हैं। मक्खन तथा सोंठ के साथ इसे व्रणरोपण के लिये काम में लाते हैं। (२) इसका क्वाथ यकृत प्लीहोदर, गण्डमाला, क्षय आदि लक्षणयुक्त व्याधि में प्रयोग करते हैं। अथ पातालगरुडी। तस्या नामगुणानाह छिलिहिण्टो महामूलः पातालगरुडाह्वयः। छिलिहिण्टः परं वृष्यः कफघ्नः पवनापहः॥२६०॥ 'पातालगरुडी' के नाम तथा गुण—छिलिहिण्ट, महामूल, पातालगरुड, ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। पातालगरुडी—अत्यन्त वृष्य (वीर्यवर्धक), कफ तथा वायु को शमन करने वाली होती है। [२६०] १५०. पाताल गरुडी हिं० - पातालगरुड़ी, छिरेटा, फरीदबूटी, चिरहिटा, छिरहटा, जलजमनी। बं० - हयेर। म० - वासनवेल, भुर्युपाडल, तान्हिचावेल। गु० - पातालगलोरी, वेवड़ी। ते० - दूसरैंतिगे। क० - दागुडी। ता० - कातुक कोदी। ले० - Cocculus hirsutus (Linn.) Diels (कॉक्सुलस् हिर्सुटस)। Fam. Menispermaceae (मेनिस्पर्मेसी)। यह इस देश के प्रायः सब गरम और साधारण प्रान्तों में हिमालय से दक्षिण तक पायी जाती है। इसकी आरोही लता—झाड़ियों आदि पर फैली हुई रहती है। शाखायें तथा पत्र मृदु श्वेताभ रोमावरण से ढँके रहते हैं। पत्ते—इनके आकार और कद में बड़ी विभिन्नता रहती है। नीचे के पत्ते प्रायः लट्वाकार, आयताकार, ३" × २" तक बड़े और ऊपर के क्रमशः छोटे और आयताकार होते हैं। पुष्प—एकलिंग, हरिताभ एवं सूक्ष्म होते हैं। फल—काले बैंगनी रंग के, चने के बराबर, एवं चिकने होते हैं तथा इनके भीतर काला रस रहता है। पुष्प वर्षा में एवं फल शीत में लगते हैं। मूल—काफी नीचे चला जाता है तथा मजबूत होता है। इसके पत्तों को जल में मसलने से जल जम जाता है। इसलिये इसे जलजमनी कहते हैं। इसकी जड़ को सर्पविष में बहुत उपयोगी बतलाया गया है इसलिये इसका पातालगरुड़ी नाम सार्थक मालूम पड़ता है। प्राचीन ग्रन्थों में इसका CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

६१२ भावप्रकाशनिघण्टुः वर्णन नहीं पाया जाता। इसकी जड़ एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। पाठामूल के स्थान पर इसकी जड़ ली जाती है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ उष्ण, स्वेदजनन, सौम्य, बलवर्धक, मूत्रजनन, मूत्रमार्ग के लिये शामक एवं ग्राही, ज्वरहर, वायुहर एवं शोधन है। यह सार्सापरिला की तरह उपयोगी है। पत्ते दाहप्रशमन, मूत्रजनन, शोथहर, स्तन्यजनन एवं त्वग्दोष नाशक हैं। (१) इसकी जड़ का बकरी के दूध में तैयार किया हुआ क्वाथ पीपल, सोंठ, आदि सुगन्धि द्रव्यों के साथ जीर्ण आमवात, विशेषकर यदि उपदंश के कारण उत्पन्न हो, सन्धिशोथ तथा त्वचा के रोगों में देते हैं। (२) जमाया हुआ स्वरस शीतवीर्य होने के कारण जीरक एवं मिश्री के साथ नूतन सोजाक में बहुत उपयोगी है। (३) पत्तों को पीसकर शोथ, चोट आदि पर बाँधने से लालिमा एवं पीड़ा कम होती है। शिरःशूल में भी बाँधते हैं। (४) इसकी जड़ का प्रयोग बस्तिशोथ तथा अन्य प्रमेहों में किया जाता है। मात्रा-स्वरस १-२ तोला; मूल-३-६ माशा। अथ वन्दा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह वन्दा वृक्षादनी वृक्षभक्ष्या वृक्षरुहाऽपि च। वन्दाकः स्याद्धिमस्तिक्तः कषायो मधुरो रसे। मङ्गल्यः कफवातास्ररक्षोव्रणविषापहः ।।२६१।। 'बन्दा' के नाम तथा गुण-बन्दा, वृक्षादनी, वृक्षभक्ष्या, वृक्षरुहा और बन्दाक्व ये नाम 'बान्दा' के हैं। बान्दा- तिक्त, कषाय तथा मधुर रसयुक्त, शीतवीर्य, मङ्गलमय एवं कफ, वातरक्त, राक्षसबाधा, व्रण और विष को दूर करता है। [२६१] १५१. बान्दा (१) हिं०-बन्दा, बांदा, बंदाक। बं०-बरमांदा, मान्दा। म०-बांडागुल। गु०-बांदो। ते०-बादनीका। अ०- खरकताना। ले०-Loranthus longiflorus Desr. (लोरेन्थस् लॉगिफ्लोरस् डेस.); Syn. Dendrophthoe falcata (Linn. f.) Etting. (डेण्ड्रोफ्थो. फॅलकेटा)। Fam. Loranthaceae (लोरेन्थेसी)। यह भारत में सर्वत्र पाया जाता है। इस कुल की वनस्पतियाँ अर्धपराश्रयी होती हैं। जिन वृक्षों के ऊपर यह उगती हैं, उनसे अपना भोजन ग्रहण करती है तथा स्वतः हरी होने के कारण स्वयं भी अपने लिये भोजन निर्माण करती है। उपर्युक्त बांदा अनेक प्रकार के वृक्षों पर उगा हुआ पाया जाता है। यह काष्ठीय होता है। शाखायें-चिकनी, चीमड़, कुछ लटकती हुई तथा कुछ सीधी एवं ३-४ फीट लम्बी होती हैं। पत्ते-३-६ इञ्च लम्बे, १-२ इञ्च चौड़े, चिकने, अनेक आकार के तथा मोटे होते हैं। फूल-रक्त, नारङ्ग या गुलाबी रंग के, १-२ इञ्च लम्बे और उनका सवर्ण कोश नालाकार होता है। फल-मांसल एवं बीज चिपचिपे होते हैं। इसके पुष्प एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, कषाय, कफघ्न, वातनाशक, मूत्रविरेचनीय, रक्तविकार नाशक एवं व्रणरोपक है। (१) शोथ पर इसके पत्तों एवं पुष्प को पीस-गरम कर लेप करने से सूजन दूर होती है। (२) इसके पुष्पों का प्रभाव हृदय एवं रक्तवाहिनियों पर होता है। हृदयोद्भूत श्वास, क्षयोद्भूत श्वास, फुप्फुसशोथ, रक्तपित्त, अपस्मार, उन्माद एवं ज्वर में प्रलाप होने पर इसे देते हैं। मात्रा-स्वरस १-२ तोला।

गुडूच्यादिवर्गः ६१३ नोट-उपर्युक्त बांदे की और दो-तीन जातियाँ होती हैं। इनके अतिरिक्त एक अन्य प्रजाति का बांदा होता है। जिसकी भी दो उपजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें किशमिश काबली प्रभावकर द्रव्य है जिसका संक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। १५२. बान्दा (२) ले०-Viscum album Linn. (विस्कम् ॲल्बम् लिन.); Fam. Loranthaceae (लोरेंन्थेसी)। जौ०- चुल्लू का बांदा। यू०-किशमिश काबली। अ०-दिब्क, मबीजजे असली। यह हिमालय में कश्मीर से नेपाल तक ३०००-७००० फीट तक होता है। ये प्रायः क्रम में निकली रहती हैं। पत्ते-२ इञ्च लम्बे, १/२ इञ्च चौड़े, विनाल, आयताकार या ऊपर से भालाकार होते हैं। आधार पर इनमें ३-५ शिराएँ होती हैं। पुष्प-प्रति गुच्छे में ३-५ पुष्प होते हैं। फल-१/४ इञ्च लम्बे, सफेद, चिकने तथा पारदर्शक होते हैं। बाजार में मटर जितने बड़े, नरम, झुर्रीदार और भूरे रंग के सूखे फल मिलते हैं। इनके भीतर एक छोटा बीज तथा चिपचिपा पदार्थ होता है। इन फलों का चिकित्सा में प्रयोग होता है। गुण और प्रयोग-इसकी क्रिया हृदय पर डिजिटॅलिस सदृश होती है, जिससे हृदय को बल मिलता है तथा मूत्र की वृद्धि होती है। गर्भाशय पर इसका प्रभाव अर्गट की तरह होता है, जिससे गर्भाशय का संकोच होता है। (१) हृद्रोग एवं जलोदर में इसे देने से लाभ होता है। (२) अत्यार्तव एवं प्रसवोत्तर रक्तस्राव में पिपरामूल के साथ इसका फाण्ट देने से लाभ होता है। (३) प्लीहावृद्धि, अपस्मार, कटीपीड़ा, गुल्म, अर्श, क्षत, व्रण, कर्णपूय आदि में इसका व्यवहार किया जाता है। मात्रा-फल ५-१५ रत्ती। अथ वटपत्री । तस्या नामगुणानाह वटपत्री तु कथिता मोहिन्त्यैरावती बुधैः । वटपत्री कषायोष्णा योनिमूत्रगदपहा ॥२६१॥ 'वटपत्री' के नाम तथा गुण-वटपत्री की विद्वान् लोग मोहिनी और ऐरावती कहते हैं। वटपत्री-कषाय रसयुक्त, उष्णवीर्य एवम् योनि तथा मूत्रसम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है। [२६२] १५३. वटपत्री इसका निर्णय अभी तक नहीं हो सका है। निम्नलिखित वनस्पति को कुछ विद्वान् वटपत्री मानते हैं। ले०-Saxifraga ligulata Wall. (सॅक्सीफ्रेगा लीगुलेटा वाल.)। Fam. Saxifragaceae (सॅक्सोफ्रेगॅसी)। यह पाषाणभेद का ही भेद है तथा इसका वर्णन हरीतक्यादि वर्ग में पाषाणभेद के अंतर्गत पृष्ठ १०५ पर किया गया है। अथ हिङ्गुपत्री । तस्या नामानि गुणाँश्चाह हिङ्गुपत्री तु कवरी पृथ्वीका पृथुका पृथुः ॥२६३॥ हिङ्गुपत्री भवेद्धृद्या तीक्ष्णोष्णा पाचनी कटुः । हृद्रुस्तिरुग्विबन्ध्यार्शःश्लेष्मगुल्मानिलापहा ॥२६४॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

६१४ भावप्रकाशनिघण्टुः हिङ्गुपत्री के नाम तथा गुण-हिङ्गुपत्री, कवरी, पृथ्विका, पृथुका और पृथु ये सब नाम हिङ्गुपत्री के हैं । हिङ्गुपत्री- कटुरसयुक्त, रुचिजनक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पाचक एवं हृद्रोग, बस्तिरोग, विबन्ध, अर्श, कफ, गुल्म और वायु को दूर करने वाली होती है । [२६३-२६४] १५४. हिङ्गुपत्री हिङ्गुपत्री तथा आगे वर्णन की हुई वंशपत्री के विषय में थोड़ा मतभेद है । चरक में अपस्मार एवं उन्माद की चिकित्सा में क्रमशः हिङ्गुपत्री एवं हिङ्गुशिवाटिका इनका प्रयोग आया है । इसकी टीका में चक्रपाणि ‘वंशपत्री’ लिखते हैं । ‘नाडीहिङ्गु’ या ‘डीकामाली’ जिसका वर्णन पहले हरीतक्यादि वर्ग में किया जा चुका है, उसे ‘हिङ्गुपत्री’ कह सकते हैं, क्योंकि उसकी पत्र-कलिकाओं के ऊपर किसी-किसी ऋतु में पीला गोंद बूँद के रूप में निकला रहता है । इसकी छाल कट जाने पर वहाँ से भी गोंद निकलता है । इसमें उग्र गन्ध होती है । इसे डीकामाली या नाडीहिङ्गु कहते हैं । इस आधार पर नाडीहिङ्गु को हिङ्गुपत्री माना जा सकता है । हरीतक्यादि वर्ग में पृष्ठ ५५ पर नाड़ी हिङ्गु (डिकामाली) का वर्णन देखें । वंशपत्री । तस्या नामानि गुणाँश्चाह वंशपत्री वेणुपत्री पिण्डा हिङ्गुशिवाटिका । हिङ्गुपत्रीगुणा विज्ञैर्वंशपत्री च कीर्त्तिता ।।२६५।। वंशपत्री के नाम तथा गुण-वंशपत्री, वेणुपत्री, पिण्डा और हिङ्गुशिवाटिका ये नाम वंशपत्री के हैं। वंशपत्री- इसे विद्वानों ने गुणों में हिङ्गुपत्री के संमान बताया है । [२६५] १५५. वंशपत्री वंशपत्री भी संदिग्ध है । भावप्रकाशकार इसके गुण हिङ्गुपत्री की तरह ही बतलाते हैं । चक्रपाणि हिङ्गुपत्री की टीका में वंशपत्री लिखते हैं । सम्भव है ये दोनों एक ही हों और डीकामाली या नाडीहिङ्गु के ही पर्याय हों । हींग का पेड़ जिस प्रजाति (Genus) का है उसी प्रजाति (Ferula-फेरूला) के एक अन्य पेड़ के पत्ते देखने में कुछ बाँस के पत्तों की तरह दिखलाई देते हैं । सम्भव है उसी में से किसी का वंशपत्री नाम हो । अथ मत्स्याक्षी । तस्या नामानि गुणाँश्चाह मत्स्याक्षी बाह्लिका मत्स्यगन्धा मत्स्यादनीति च । मत्स्याक्षी ग्राहिणी शीतकुष्ठपित्तकफास्रजित् ।। लघुस्तिक्ता कषाया च स्वाद्वी कटुविपाकिनी ।।२६६।। मत्स्याक्षी के नाम तथा गुण-मत्स्याक्षी, वाह्लिका, मत्स्यगन्धा और मत्स्यादनी ये नाम मत्स्याक्षी के हैं । मत्स्याक्षी-मलसंग्राहक, शीतवीर्य, लघु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्वादिष्ट, विपाक में कटुरस युक्त एवं कुष्ठ, पित्त, कफ और रक्तविकार को दूर करने वाली होती है । [२६६] नोट-यह भी संदिग्ध द्रव्य है । ब्राह्मी के पर्याय में अमरसिंह ने मत्स्याक्षी लिखा है । कुछ गुडरी साग को मत्स्याक्षी कहते हैं । संक्षेप में इसका यहाँ वर्णन किया है । १५६. मत्स्याक्षी ? गुडरी साग ले०-Alternanthera sessilis, (Linn.) R. Br. (आल्टरनेन्थेरा सेसिलिस्); Fam. Amaranthaceae (एमरेन्थेसी) । बं०-शलिञ्च । यह भारत के सभी उष्ण प्रदेशों में नम जगहों में पाया जाता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ६१५ इसका क्षुप-परिप्रसरी अथवा ग्रन्थिमूल प्रसरी होता है। कभी-कभी शाखायें उत्थित प्रसरी होकर आस-पास की झाड़ियों पर फैली रहती हैं। पत्ते-लम्बे, अंडाकार, आयताकार या अन्य प्रकार के भी होते हैं। पुष्प-श्वेत या गुलाबी रंग के मुण्डकाकार गुच्छों में आते हैं। पुष्प खिलने पर आधार भाग में गुलाबी और ऊपर सफेद होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके नूतन भाग पौष्टिक (Nutritious) होते हैं तथा इसमें प्रोटीन (Protein) ५% तथा लौह १६.७ मि० ग्रा० प्रति १०० ग्रा० होता है। गुण और प्रयोग-यह ज्वरहर, पित्त-विरेचक तथा दुग्धवर्धक है। इसके पत्रशाक का उपयोग किया जाता है। अथ सर्पाक्षी ('सरहटी-गण्डिनी'ति च)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह सर्पाक्षी स्यात्तु गण्डाली तथा नाडीकलापकः ॥२६७॥ सर्पाक्षी कटुका तिक्ता सोष्णा कृमिक्रिकृन्तनी । वृश्चिकोन्दुरुसर्पाणां विषघ्नी व्रणरोपिणी ।।२६८।। सर्पाक्षी के नाम तथा गुण-सर्पाक्षी, गण्डाली और नाडीकलापक ये नाम सर्पाक्षी के हैं। सर्पाक्षी-कटु तथा तिक्त रसयुक्त, उष्णवीर्य, व्रण का रोपण करने वाली, कृमिनाशक तथा बिच्छू, मूषक और सर्प के विषों को नष्ट करने वाली है। [२६७-२६८] नोट-सर्पाक्षी भी बिलकुल निःसंदिग्ध द्रव्य नहीं है। रास्ना के नाम से लिये जाने वाले द्रव्यों में से एक ऑफिओराइज्झा मुन्गोस् को कुछ लोगों ने सर्पाक्षी माना है। कुछ ने पॉलिगोनम् प्लेवेजम् को सर्पाक्षी माना है। दूर्वा के पर्याय में सर्पाक्षी, मीनाक्षी ये शब्द आये हैं। डल्हण ने कल्पस्थान अ० ६ में इसे 'रक्तपुष्पा पूर्वदेशे प्रसिद्धा' एवं अ० ८-११७ में 'लोहितपुष्पा शंखपुष्पीभेदा' लिखा है। वंगीय ब्राह्मी के साथ कुछ विद्वानों ने इसका वर्णन किया है। यहाँ संक्षेप में दोनों का वर्णन किया गया है। १५७. सर्पाक्षी (१) ले०-Ophiorrhiza mungos Linn. (ऑफिओराइज्झा मुन्गोस् लिन.)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी) । सं०-सर्पाक्षी । हिं०-सरहटी । बं०-गन्धनाकुली । म०-मुंगसवेल, नागवेली । ता०-कीरिप्पुंडु । कोंक०-गर्डपातालि क०-पाताल गरुड । यह खासिया पहाड़ एवं आसाम में २००० फीट तक एवं पश्चिमीघाट, ट्रावनकोर एवं तिनेवेल्ली के पहाड़ों पर होता है। इसका क्षुप-करीब ४५-६० से० मी० बड़ा होता है। पत्ते-१०-२० से० मी० बड़े, भालाकार, आधार की तरफ संकुचित, लम्बाग्र एवं ऊपर से चमकीले हरे रंग के होते हैं। पुष्प-श्वेत; फली-छोटी एवं बीज-अनेक तथा भूरे रंग के होते हैं। मूल-बहुत मजबूत, टेढ़े-मेढ़े, ६ इञ्च लम्बे, स्वाद में कड़वे तथा उसकी छाल पतली एवं कपिशवर्ण की होती है। कहीं-कहीं मूल का रास्ना के नाम से उपयोग किया जाता है। चिकित्सा में मूल का उपयोग होता है। रासायनिक संगठन-इसमें स्टार्च, राल, स्नेह तथा एक क्षाराम रहता है। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक, दीपन एवं पाचन है। इसकी जड़ का क्वाथ कुपचन, अतिसार आदि में दिया जाता है। लंका में सर्पदंश, वृश्चिक दंश, कुत्ते का विष आदि के लिये इसकी बहुत प्रशंसा है। १५८. सर्पाक्षी ? (२) मुनियारा ले०-Polygonum plebejum R. Br. (पॉलिगोनम् प्लेबेजम्); Fam. Polygonaceae (पॉलिगोनेसी) । हिं०-रानी फूल। .CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA