भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ५९५ अथ त्रायमाणा । तस्या नामानि गुणांश्चाह बलभद्रा त्रायमाणा त्रायन्ती गिरिजाऽनुजा । त्रायन्ती तुवरा तिक्ता सरा पित्तकफापहा । ज्वरहृद्रोगगुल्मार्शोभ्रमशूलविषप्रणुत् ।।२४३।। त्रायमाणा के नाम तथा गुण-बलभद्रा, त्रायमाणा, त्रायन्ती, गिरिजा तथा अनुजा ये नाम 'त्रायमाण' के हैं । त्रायमाणा-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, सारक, पित्त कफनाशक एवम् ज्वर, हृद्रोग, गुल्म, अर्श, भ्रम, शूल और विष को दूर करने वाली होती है । [२४३] नोट-त्रायमाण एक संदिग्ध द्रव्य हो गया है । विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न द्रव्यों का त्रायमाण नाम से उल्लेख किया है किन्तु आजकल अधिकांश विद्वान् जेन्शियाना कुर्रों (Gentiana kurroo Royle) को त्रायमाण मानते हैं । इसका वर्णन पहले कुटकी के वर्णन के पश्चात् किया जा चुका है (पृष्ठ-७१) क्योंकि कुटकी में प्रायः इसकी मिलावट रहती है । जिन गुणों के लिये आचार्यों ने त्रायमाण का प्रयोग किया है वे इसमें मिलते हैं तथा इसका प्रादेशिक पर्वतीय नाम त्रायमाण भी कहीं-कहीं मिलता है । तिक्त, सारक आदि गुण तथा ज्वर, गुल्म आदि में लाभ करने के कारण एवं पर्वतीय स्थानों में होने वाले (गिरिजा) इस अत्यन्त उपयोगी द्रव्य की त्रायमाणा होने की अधिक संभावना है । चरक में तिक्त स्कंध में (वि० अ० ८), रक्तपित्त के लिये (चि० अ० ४), ज्वर में (चि० अ० ३), गुल्म की चिकित्सा में (चि० अ० ५), पैत्तिक अतिसार में (चि० अ० १०) एवं विसर्प में (चि० अ० ११) तथा सुश्रुत में लाक्षादिगण (सू० अ० ३८) में इसका उल्लेख है । इसके संबंध में अन्य मतों का संक्षेप में उल्लेख अप्रासंगिक न होगा । (१) श्री डा० वा० ग० देसाई ने ओषधि-संग्रह नामक ग्रन्थ में त्रायमाण नाम से डेल्फिनिअम् झलिल् (Delphinium zalil) का वर्णन किया है जिसका पंचांग ईरान से आता है । इसका पंजाबी नाम उन्होंने 'गाफिज़', ईरानी नाम झलिल् अद्फ्रक् (अस्परग) दिया है । मुहीते आजम नामक ग्रंथ में गाफिस का संस्कृत नाम त्रायमाण दिया है । इसी पुस्तक में डॉ० देसाई ने 'घाफिथ्', गाफिस् नाम से ईरान में होने वाला जेन्शियाना का भेद जेन्शियाना डेहुरिका (Gentiana dehurica) का उल्लेख किया है । इससे मालूम होता है कि ईरान से आनेवाले इन दोनों द्रव्यों को गाफिस् के नाम से प्रयोग करते हैं । (२) श्री यादवजी ने 'द्रव्यगुणविज्ञान' में श्री वैद्यराज विद्याधर जी विद्यालंकार, पो० सोलन, जि० शिमला के मत का उल्लेख करते हुए एक वनस्पति का वर्णन किया है, किन्तु उसके लेटिन नाम को नहीं लिखा है । श्री प्रियव्रतजी शर्मा ने 'द्रव्यगुणविज्ञान' में त्रायमाणानाम से जेन्शियाना कुर्रों का वर्णन किया है जो उपर्युक्त श्री यादवजी की पुस्तक में वर्णित वनस्पति से मिलता है । इससे ऐसा मालूम होता है कि श्री यादव जी की पुस्तक में की वनस्पति जेन्शियाना कुर्रों ही है किन्तु इन्होंने इसमें श्री देसाई के जिस नव्यमत का उल्लेख किया है वह श्री देसाई ने अपनी पुस्तक में डेल्फिनिअम् के अन्तर्गत किया है न कि जेन्शियाना के वर्णन में । (३) श्री ठाकुर दलजीत सिंहजी 'यूनानी द्रव्यगुणविज्ञान' में गाफिस नाम से जे० डेहुरिका का वर्णन करते हैं जिसका भारतीय भेद जे० कुर्रों मानते हैं । इसका स्थानीय नाम त्रायमाण होने का उल्लेख है । (४) कुछ वंगीय वैद्य, त्रायमाण नाम से शुष्क उदुम्बर जातीय अन्यफल 'बलाडूमूर', 'भुईडूमूर' Ficus heterophylla (फिकस् हेटेरोफाइला) या उसके भेद का प्रयोग करते हैं जिसमें सारक गुण न होकर कुछ स्तंभन गुण ही होता है । (५) कुछ लोग बनफसा को, कुछ पियारांगा या कहीं-कहीं ममीरी नाम से भी बिकने वाली थैलिक्ट्रम् फोलियोलोसम् (Thalictrum foliolosum) की जड़ को त्रायमाणा मानते हैं । ममीरी का नेत्र रोगों में अधिक उपयोग होता है किन्तु त्रायमाणा के गुणों में उसके नेत्र्य होने के संबंध में कुछ भी उल्लेख नहीं है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu, Digitized by S3 Foundation USA