भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९४ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-भृङ्गराज तिक्त, उष्ण, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, रसायन, कफ वातहर, चक्षुष्य, त्वग्दोषहर, केश्य एवं वर्ण्य है । इसका प्रयोग कुपचन, यकृत्विकार, पाण्डु, कास, श्वास, कुष्ठ, चर्म रोग एवं पलित में करते हैं। इसकी अधिक मात्रा से वमन होता है । (१) यकृत पर इसकी विशेष क्रिया होती है जिससे पाचन सुधर कर शरीर की सभी क्रियाएं ठीक होती हैं। यकृत दोष के कारण उत्पन्न यकृत् वृद्धि, प्लीहा वृद्धि, कामला, अर्श, उदर, शिरःशूल, त्वचा के रोग, चक्कर आदि में इससे लाभ होता है। (२) जीर्ण चर्मरोग जैसे कुष्ठ, कण्डू, व्रण, पलित, इन्द्रलुप्त तथा वृश्चिक-दंशपर इसका लेप करते हैं तथा पिलाते हैं। बाल काला करने के लिये तथा बढ़ाने के लिये इसका रस काशीश के साथ लेप करते हैं। अग्निदग्ध व्रण पर मरवा, मेंहदी तथा इसकी पत्ती का लेप करने से जलन दूर होती है तथा व्रण का दाग भी नहीं रहता । इससे सिद्ध तैल का नस्य, केश्य रूप में प्रयोग किया जाता है जिससे शिरःशूल दृष्टिमान्द्य एवं पालित्य आदि में लाभ होता है। (३) रसायन के लिये विशेष कर नील भृङ्गराज के सेवन का विधान है। एक महीने तक इसके स्वरस-पान के साथ दुग्धाहार पर रहने से बल एवं वीर्य की वृद्धि होती है तथा शतायु होता है। (४) छोटे बच्चों की खाँसी में इसका १-२ बूँद स्वरस मधु के साथ देते हैं, जिससे गले की घरघराहट भी कम होती है। (५) इसके बीज वाजीकर होते हैं । मात्रा-स्वरस ½-१ तोला; बीज १-३ माशा । अथ शणपुष्पी । तस्या नामानि गुणाँश्चाह शणपुष्पी स्मृता घण्टा शणपुष्पसमाकृतिः । शणपुष्पी कटुस्तिक्ता वामिनी कफपित्तजित् ।। २४२ ।। शणपुष्पी के नाम तथा गुण-शणपुष्पी, घण्टा तथा शणपुष्पसमाकृति (शणपुष्प के समान आकृति वाली) ये नाम 'शणपुष्पी' के हैं। शणपुष्पी—यह कटु तथा तिक्तरसयुक्त, वमन कराने वाली एवं कफ-पित्तनाशक होती है। [२४२] १२६. शणपुष्पी हिं०-शनपुष्पी, सुनक, सनई, ब्रनसन, पटसन, झुनझुनिया । बं०-वनशण । म०-घागरी, तिरत, खुलखुल । गु०-घुघणे । क०-गिजि गिल । ते०-घेलेपेरिंटा । ता०-वेल्लैनिकलुकिलुप्यै । ले०-Crotalaria verrucosa Linn. (क्रोटेलिरिया वेरुँकोसा लिन.) । Fam. Leguminoceae (लेगुमिनोसी) । शणपुष्पी—प्रायः भारत के गरम प्रान्तों में उत्पन्न होती है और सिलोन में भी पाई जाती है। इसका क्षुप-सीधा, अनेक शाखाओं से युक्त एवं ३-४ फीट ऊँचा होता है। शाखाएँ चार धारीयुक्त होती हैं। पत्ते-चौड़ाई लिये तिर्यगायताकार, १-२ इञ्च बड़े क्वचित् इससे भी बड़े, गोलदन्तुर या कभी-कभी अल्प खण्डित लहरदार, मृदुरोमश एवं छोटे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-पर्ण विपरीत या अग्र्य, ३-७ पुष्प युक्त मंजरियों में, १.५- ३" बड़े नील या पीताभ आते हैं। फली-अल्पवृन्त युक्त, १ इञ्च लम्बी एवं १२ या अधिक बीजों से युक्त होती है। इसके पत्तों का चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह तिक्त, पित्तनाशक, कफघ्न एवं स्नेहन है। पत्तों का लेप शीतल एवं त्वग्दोषहर है। त्वचा के विकारों में इनका बाह्याभ्यंतर प्रयोग करते हैं। पत्तों के स्वरस से लालास्राव कम होता है।