भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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गुडूच्यादिवर्गः ५९३ अथ भृङ्गराज (भाँगरा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह भृङ्गराजो भृङ्गरजो मार्कवो भृङ्ग एव च । अङ्गारकः केशराजो भृङ्गारः केशरञ्जनः ।।२३९।। भृङ्गारः कटुकस्तीक्ष्णो रूक्षोष्णः कफवातनुत् ।।२४०।। कश्यस्त्वच्यः कृमिश्वसकासशोथामपाण्डुनुत् । दन्त्यो रसायनो बल्यः कुष्ठनेत्रशिरोऽर्त्तिनुत् ।।२४१।। भाङ्गरा के नाम तथा गुण-भाङ्गरा के संस्कृत नाम-भृङ्गराज, भृङ्गरज, मार्कव, भृङ्ग, अङ्गारक, केशराज, भृङ्गार और केशरञ्जन ये सब हैं। भांगरा-कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण, रूक्ष, गरम, कफ-वातनाशक, केशों के लिये हितकर, त्वचा को साफ करने वाला, दाँतों के लिये हितकर, रसायन, बलकारक एवं कृमि, श्वास, कास, शोथ, आम, पाण्डुरोग, कुष्ठ, नेत्ररोग तथा शिरोरोग को दूर करता है। [२३९-२४१] नोट-अन्य निघंटुओं में इसके श्वेत, पीत एवं कृष्ण (नील) इन तीन भेदों का वर्णन है। कृष्ण भृङ्गराज क्या है, इसका निर्णय नहीं हुआ है। श्वेत पुष्प का भृङ्गराज सर्वत्र पाया जाता है जिसे Eclipta alba (एक्लिप्टा एल्बा) कहते हैं। पीत पुष्प का भृङ्गराज बंगाल, आसाम, कोंकण तथा मद्रास के समतल भागों में होता है जिसे Wedelia calendulacea (वेडेलिआ कैलेण्डुलेसिया) कहते हैं। दोनों एक ही वर्ग के हैं तथा गुणों की दृष्टि से दोनों में विशेष अन्तर नहीं है इसलिये दोनों के गुण तथा प्रयोग एक साथ ही दिये हैं। १२५. भाङ्गरा हिं०-भाङ्गरा, भङ्गरा, भंगरैया । बं०-भीमराज, केसुरिया, केसरी । म०-माका । गु०-भांगरो । क०-गर्ग । ते०-गुंटकल, लगरा । ता०-करीशलकन्त्री । फा०-जमर्दिर । अ०-कर्दामुलबिंत । ले०-Eclipta alba Hassk. (एक्लिप्टा एल्वा हास्क.)। Fam. Compositae (कम्पोज़िटी) । श्वेत भांगरा-इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में आर्द्र स्थानों में उत्पन्न होता है। पहाड़ों पर यह ६००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका क्षुप-प्रसर की तरह भूमि पर फैला हुआ रहता है। शाखायें अनेक, भूमि से उठी हुई, खुरखुरी और ग्रन्थियों पर प्रायः मूलयुक्त रहती हैं। पत्ते-छोटे-बड़े विविध आकार वाले दो इञ्च तक लम्बे, चौथाई इञ्च चौड़े, अंडाकार या आयताकार, नोकीले और विपरीत रहते हैं। पुष्प-छोटे वृन्त से युक्त एवं छोटे-छोटे मुण्डकों में आते हैं जिनमें प्रान्तीय पुष्प स्त्रीलिंग और जिह्वाकार एवं केन्द्रीय पुष्प घंटिकाकार होते हैं। पीले फूल का भाङ्गरा-आसाम, बंगाल, कोंकण तथा मद्रास आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसको लेटिन् में Wedelia calendulacea Less. (वेडेलिआ कॅलेण्डुलेसिया लेस्) कहते हैं। इसका प्रसर १८ इञ्च तक बड़ा होता है। इसके काण्ड जमीन के नीचे प्रायः १-२ फीट लम्बाई में फैले रहते हैं जिनसे स्वावलम्बी शाखायें ऊपर की ओर निकली रहती हैं। पत्ते-आयताकार प्रासवत्, २-३ इञ्च लम्बे, लगभग अखण्ड या दन्तुर होते हैं। अधः पत्रावली के पत्र लगभग दो चक्रों में और बाहर के ३-५ पत्र बड़े एवं पर्णाकार होते हैं। पुष्पों के मुण्डक पीले होते हैं जिसमें प्रान्तीय जिह्वाकार पुष्प संख्या में लगभग आठ होते हैं। भृङ्गराज के स्वरस एवं पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। इसको उबालने से इसका गुण नष्ट होता है इसलिये इसके स्वरस का प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-श्वेत भृङ्गराज में अधिक मात्रा में राल तथा एक्लिप्टाइन (Ecliptine) एवं निकोटीन (Nicotine) नामक क्षाराभ पाये जाते हैं। ४१ भाव.I