भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९२ भावप्रकाशनिघण्टुः मूलस्तम्भ-काष्ठमय होता है। काण्ड-पतला, गोल, चिकना या सूक्ष्म रोमयुक्त, लम्बाई में सूक्ष्म धारियों से युक्त एवं पर्व पर मोटा होता है। पत्र-विपरीत परन्तु प्रायः दूर-दूर, विभिन्न आकार के दीर्घवृत्त आयताकार से लेकर रेखाकार भालाकार, २-४ इञ्च लम्बे तथा विभिन्न चौड़ाई के (.३-१.५ इञ्च), ऊपर से चिकने, गहरे हरे रंग के एवं सफेद चिह्नों से युक्त, नीचे से हलके रंग के या कभी-कभी श्वेत मृदुरोमश, नोकीले किन्तु चौड़े, पत्र के अग्र कुण्ठित, जालिका विन्यास युक्त एवं ३-४ मि० मि० लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-छोटे, बाहर से हरिताभ किन्तु भीतर बैंगनी रंग के पत्र कोणीय गुच्छों में आते हैं। फली-४-६ इञ्च लम्बी, पतली, गोल, दो-दो एक साथ परन्तु अपसारी, अग्र की ओर क्रमशः संकुचित, सीधी या कुछ टेढ़ी-मेढ़ी, सूक्ष्म धारीदार तथा चिकनी होती है। बीज-६-८ मि० मि० लम्बे, अंडाकार, आयताकार, चिपटे, काले रंग के एवं श्वेत रोमगुच्छ से युक्त होते हैं। मूल-इसके मूल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। यह करीब १२ इञ्च लम्बा, ३-६ मि० मि० मोटा, गोल, कठोर, मुड़ा हुआ कुछ पतले उपमूलों से युक्त, बाहर से गहरे बादामी रंग का तथा कभी-कभी कुछ भूरे रंग का होता है। मध्य भाग पीत एवं काष्ठमय रहता है जिसके चारों ओर का भाग श्वेत रहता है। इसकी छाल भूरे रंग की, कार्क युक्त, चौड़ाई में फटी हुई एवं लम्बाई में धारीदार एवं आसानी से मध्य भाग से अलग की जा सकती है। इसमें कुछ कपूर जैसी मधुर गन्ध आती है तथा इसका स्वाद कुछ कडुवा, तिक्त किन्तु रोचक होता है। इसके स्थान पर करण्टा के काण्ड भी बिकते हैं जिसमें गन्ध नहीं होती। पुरानी गन्धहीन हो जाने पर इसका व्यवहार नहीं करना चाहिये। इसमें उड़नशील गन्धयुक्त कार्यकारी तत्त्व होने के कारण इसका क्वाथ न बनाकर फांट बना व्यवहार करना चाहिये। यह तत्त्व विशेषतया इसकी छाल में रहता है इसलिये पतली-पतली जड़ या जड़ की छाल का उपयोग करना चाहिये। रासायनिक संगठन-इसकी ताजी जड़ में ०.२२५% एक उड़नशील तैल होता है जिसका ८०% भाग एक काउमॅरिन (Coumarin) सदृश गन्धयुक्त रवेदार पदार्थ (2-Hydroxy-4-Methoxy benzaldehyde) से युक्त होता है। इसके अतिरिक्त दो स्टेराल् (Sterol-Hemidesterol, Hemidesmol), राल, कषाय द्रव्य, शर्करा, कुछ ठोस पदार्थ एवं कुछ ग्लाइकोसाइड (Glycoside) ये पदार्थ इसमें पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-अनन्तमूल, मूत्रविरेचन, मूत्रविरजन, स्वेदजनन, अग्निवर्धक, त्वग्दोषहर, रक्तशोधक, वर्ण्य, जीवनविनिमय क्रिया के लिए उत्तेजक, रसायन, बल्य, दाहप्रशमन, पुरीषसंग्रहणीय एवं स्तन्यशोधन है। इसका प्रयोग ज्वर, कुष्ठ, कण्डू आदि चर्म रोग, फिरंग, जीर्ण आमवात, प्रदर, अग्निमांद्य, अरुचि, अतिसार, प्रमेह एवं श्वास-कासादि में किया जाता है। इसके फांट से मूत्र की मात्रा दुगनी या चौगुनी बढ़ती है तथापि इससे वृक्क की कोई हानि नहीं होती। इसका स्वेदजनन कार्य साधारण है इसलिये साथ में अन्य ज्वरघ्न ओषधियों का प्रयोग करना चाहिये। इसमें जीवन- विनिमय क्रिया को उत्तेजित करने वाला धर्म बहुत महत्त्व का है। इसके साथ गुडूची एवं सुगन्धित द्रव्य मिलाकर प्रयोग करने से अधिक लाभ होता है। (१) वृक्कशोथ जिसमें मूत्र की मात्रा कम हो, मूत्र गाढ़ा एवं लाल रंग का हो तब इसका फांट गुडुच एवं जीरे के साथ देने से मूत्रमार्ग का शोथ तथा दाह कम होता है। (२) फिरंग की द्वितीयावस्था तथा अन्य चर्म रोगों में इसको गुडुच के साथ देने से अच्छा लाभ होता है। (३) बच्चों की दुर्बलता तथा पाण्डु आदि में वायविडंग के साथ इसको देने से बहुत लाभ होता है। (४) प्रदर में इससे अच्छा लाभ होता है। उपदंश या सोजाक से गर्भस्राव होता हो तो इसका प्रारम्भ से ही उपयोग करते हैं। इससे बच्चा गौर वर्ण का होता है। (५) व्रण पर इसकी मूल का लेप करते हैं। नेत्राभिष्यंद में इसका दुग्ध डालते हैं। मात्रा-फांट ५-१० तोला; कल्क ३-६ माशा।