भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हो तब अनन्तमूल लेना चाहिये एवं सारिवाद्वय लिखा हो तब अनन्तमूल एवं दुधलत या करण्टा का ग्रहण उचित है । करण्टा की पत्तियाँ कुछ-कुछ जामुन की पत्ती से मिलती-जुलती होने के कारण इसे 'जम्बुपत्रा सारिवा' भी कहते हैं । यहाँ सबका वानस्पतिक वर्णन अलग-अलग किया गया है एवं गुण प्रयोगादि अनन्तमूल के दिये हैं । १२२. कृष्णसारिवा, दुधलत सं०-कृष्णसारिवा । हिं०-कालीसर, काली अनन्तमूल, दुधलत । बं०-कृष्ण, अनन्तमूल, श्यामालता । म०-श्यामलता । क०-करीउंबु । ते०-नलतिग । ले०-Ichnocarpus fruitescens R. Br. (इक्नोकार्पस् फ्रूटेसेन्स) । Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी) । यह हिमालय प्रान्त के नेपाल, गंगा नदी के आस-पास, बंगाल, आसाम, सिलहट, चटगाँव और दक्षिण आदि प्रायः सभी प्रान्तों में उत्पन्न होती है । यह लता जाति की वनौषधि छोटे वृक्षों या गुल्मों पर चढ़ जाती है और सदा हरी- भरी रहती है । शाखाएँ-प्रायः मुरचई रंग की होती हैं । पत्ते-अंडाकार या चौड़ाई लिए हुए आयताकार, तीक्ष्णाग्र या कुछ-कुछ लम्बाग्र, चिकने, २-३ इञ्च लम्बे तथा ३/८ से १ १/२ इञ्च चौड़े एवं १/४ इञ्च लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं । पुष्प-१-३ इञ्च लम्बी पुष्पमञ्जरियाँ पत्रकोण या शाखाग्र से निकलती रहती हैं जिनमें छोटे-छोटे श्वेत सुगन्धित पुष्प रहते हैं । आभ्यन्तर दलों के खण्ड रोमश एवं मरोड़े हुए रहते हैं । फलियाँ-लम्बी एवं दो-दो एक साथ रहती हैं । बीज- नालीदार एवं रोमगुच्छ से युक्त होते हैं । इसकी जड़ अनन्तमूल जैसी ही दिखलाई देती है । इस पर की छाल कृष्णाभ भूरे रंग की एवं काष्ठ से चिपकी रहती है । काष्ठ भाग अनन्तमूल की अपेक्षा अधिक कड़ा रहता है । क्वचित् यह फटी हुई रहती है । इसमें अनन्तमूल जैसी गन्ध नहीं रहती । गुण और प्रयोग-इसमें गुणधर्म अनन्तमूल जैसे ही हैं । सारिवाद्वय कहने पर इसका (कृष्ण) एवं अनन्तमूल (श्वेत) का ग्रहण करते हैं । ज्वर में पत्रयुक्त काण्ड का क्वाथ देते हैं । कृष्ण सारिवा नाम से या अनन्तमूल के स्थान पर कहीं-कहीं निम्नलिखित लता का व्यवहार किया जाता है- १२३. कृष्णसारिवा, जम्बुपत्राकारिका, करण्टा ले०-Cryptolepis buchanani Roem. & Schult. (क्रिप्टोलेपिस् बुचनेनी रो. शु.) । Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी) । इसकी लता भारतवर्ष के सभी भागों में होती है । यह बहुत फैलने वाली एवं काष्ठीय होती है । पत्ते-चिकने, आयताकार, अंडाकार, जामुन के पत्र-सदृश क्षोम लिप्त रहते हैं । पत्रसिराएँ पत्रतट के पहले ही परस्पर मिली हुई रहती हैं । पुष्प-पाण्डुरपीत और फलियाँ-दो-दो एक साथ रहती हैं । काण्डत्वक्-रक्ताभ कृष्ण एवं पतले परतों में छूटने वाली होती है । इस लता से अत्यधिक दूध निकलता है । इसके मूल में कोई गन्ध नहीं होती । १२४. श्वेतसारिवा, अनन्तमूल, कपूरी हिं०-अनन्तमूल, कपूरी, सालसा । बं०-अनन्तमूल । म०-उपलसर, उपलसरी । गु०-उपलससरी, कागड़ियों कुंडेर, कपूरी मधुरी । ते०-पालसुगन्धी । ता०-नन्नारी । क०-नमडबेरू । अं०-Indian Sarsaparilla (इण्डियन् सारसापरिला) । ले०-Hemidesmus indicus R. Br. (हेमीडेस्मस् इण्डिकस्) । Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी) । यह इस देश के सब प्रान्तों में विशेषतः बिहार, बंगाल, सुन्दरबन, पिश्चमी घाट, मध्य प्रदेश, दक्षिण एवं लंका में पाई जाती है । इसकी लता-बहुवर्षायु, पतली, फैलने वाली या लपेट कर चढ़ने वाली गुल्मजातीय होती है ।